अधूरा सच: एक डीएसपी की जंग

अध्याय 1: वह डरावनी रात और यादों का बोझ

डीएसपी अभय प्रताप सिंह के लिए वर्दी सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि उनकी पहचान थी। लेकिन उस रात, दिल्ली जाने वाली उस ट्रेन में, उनकी बहादुरी और रुतबा दोनों ही फीके पड़ गए थे। रात के 10 बज रहे थे। ट्रेन की पटरियों से आने वाली ‘खड़-खड़’ की आवाज़ अभय के कानों में किसी पुरानी याद की तरह गूँज रही थी।

अभय ने अपनी कलाई घड़ी देखी। हर बीतता पल उन्हें उस हादसे की याद दिला रहा था, जिसने एक साल पहले उनकी दुनिया उजाड़ दी थी। उनकी पत्नी संजना, जो उनकी प्रेरणा थी, एक कार दुर्घटना में उन्हें छोड़कर चली गई थी। पुलिस की फाइलों में वह केस बंद हो चुका था, लेकिन अभय के दिल में वह घाव आज भी हरा था।

तभी, सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज़ आई— “चने ले लो बाबूजी! गरम चने!”

अभय का शरीर सुन्न पड़ गया। वह आवाज़… वह लहजा… वह बिल्कुल संजना जैसा था। जब उन्होंने मुड़कर देखा, तो गलियारे में एक फटे-पुराने कपड़ों में लिपटी औरत खड़ी थी। धुंधली रोशनी में भी अभय उस चेहरे को पहचान सकते थे। वह संजना ही थी! लेकिन यह कैसे मुमकिन था? संजना को तो उन्होंने खुद अग्नि दी थी।

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अध्याय 2: साये का पीछा

अभय अपनी सीट से झटके से उठे। “संजना!” उन्होंने चिल्लाया। औरत ठिठकी, उसकी आँखों में पहचान की एक चमक कौंधी, लेकिन तुरंत ही उसने अपना चेहरा दुपट्टे से ढँक लिया और दूसरे डिब्बे की ओर भागने लगी।

अभय ने भीड़ को चीरते हुए उसका पीछा किया। ट्रेन अगले स्टेशन ‘शिवपुरी जंक्शन’ पर रुकी और वह औरत बिजली की तेजी से नीचे उतर गई। अभय भी पीछे कूदे। स्टेशन के बाहर एक रहस्यमयी आदमी पहले से खड़ा था, जो उसे एक अंधेरी गली की ओर ले गया।

अभय का पुलिसिया दिमाग सक्रिय हो गया। यह सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं था। यह एक सोची-समझी साजिश थी। उन्होंने स्टेशन मास्टर के पास जाकर सीसीटीवी फुटेज चेक की और पाया कि वह औरत अक्सर उस इलाके में देखी जाती है।


अध्याय 3: खंडहरों में छुपा राज

शिवपुरी की तंग गलियों में पीछा करते हुए अभय एक टूटी-फूटी बस्ती में पहुँचे। एक छोटे से मकान के सामने वह आदमी गायब हो गया। अभय ने जैसे ही दरवाजा खटखटाया, अंदर से वही जानी-पहचानी आवाज़ आई।

दरवाजा खुला और संजना सामने खड़ी थी। लेकिन उसकी आँखों में प्यार नहीं, बल्कि खौफ था। “आप कौन हैं? यहाँ क्यों आए हैं?” उसने अजनबी बनकर पूछा।

अभय का दिल टूट गया। “संजना, मैं अभय हूँ। तुम्हारा पति।”

तभी अंदर से एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ आई। वह बच्चा करीब 3 साल का था। उसकी शक्ल बिल्कुल अभय से मिलती थी। अभय ने कमरे के कोने में एक पुराना संदूक देखा, जिसमें उनकी और संजना की शादी की फोटो रखी थी। अब संजना झूठ नहीं बोल सकती थी।


अध्याय 4: विश्वासघात का खुलासा

संजना फूट-फूट कर रोने लगी। उसने जो बताया वह अभय के पैरों तले जमीन खिसकाने वाला था।

“अभय, उस रात एक्सीडेंट हुआ नहीं था, बल्कि करवाया गया था। तुम्हारे बड़े भाई, विक्रम ने गाड़ी के ब्रेक फेल करवा दिए थे।” संजना ने कांपते हुए बताया।

विक्रम, जिसे अभय पिता तुल्य मानते थे, वह प्रॉपर्टी और जायदाद का लालची निकला। उसे पता चला था कि अभय के होने वाले बच्चे के नाम सारी वसीयत होने वाली है। इसलिए उसने संजना और उस अजन्मे बच्चे को रास्ते से हटाने का प्लान बनाया। एक्सीडेंट के बाद विक्रम के गुंडों ने संजना को उठा लिया और एक जली हुई लाश अभय को सौंप दी ताकि वह उसे संजना समझकर अंतिम संस्कार कर दे।

संजना किसी तरह वहाँ से भाग निकली और पिछले एक साल से इस झुग्गी में चने बेचकर अपने और अभय के बेटे का पेट पाल रही थी।


अध्याय 5: भाई बनाम भाई

अभी संजना अपनी कहानी पूरी ही कर पाई थी कि बाहर गाड़ियों के टायर चरमराने की आवाज़ आई। विक्रम अपने गुंडों के साथ वहाँ पहुँच चुका था। उसे खबर मिल गई थी कि अभय ने संजना को ढूँढ लिया है।

“दरवाजा तोड़ दो!” विक्रम की आवाज़ गूँजी।

अभय ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली। “संजना, बच्चे को लेकर खिड़की से बाहर निकलो। मैं इन्हें रोकता हूँ।”

गोलीबारी शुरू हो गई। अभय ने अकेले ही उन गुंडों का सामना किया। विक्रम पागलों की तरह चिल्ला रहा था, “आज कोई नहीं बचेगा! सब कुछ मेरा होगा!”


अध्याय 6: बलिदान और न्याय

अभय, संजना और बच्चे को लेकर रेलवे ट्रैक की ओर भागे। अंधेरे में गोलियाँ चल रही थीं। तभी विक्रम ने निशाना साधा। अभय को बचाने के लिए संजना बीच में आ गई। एक गोली उसके सीने के पार निकल गई।

“नहीं!” अभय की चीख आसमान को चीर गई।

संजना अभय की बाहों में गिर पड़ी। उसकी आँखों में आखिरी बार वही चमक थी। “अभय… हमारे बेटे को… बचा लेना।” और उसकी साँसें थम गईं।

अभय के अंदर का दुख अब विनाशकारी क्रोध में बदल चुका था। उन्होंने विक्रम की ओर देखा, जो हाथ में बंदूक लिए खड़ा था। लेकिन इससे पहले कि विक्रम दोबारा गोली चलाता, पुलिस की दर्जनों गाड़ियाँ वहाँ पहुँच गईं। अभय ने पहले ही बैकअप बुला लिया था।

विक्रम ने भागने की कोशिश की, लेकिन अभय ने उसके पैर में गोली मार दी। “कानून तुम्हें सजा देगा, लेकिन संजना का खून मेरे हाथों पर रहेगा,” अभय ने गरजते हुए कहा। विक्रम को गिरफ्तार कर लिया गया।


अध्याय 7: एक नई शुरुआत

सूरज की पहली किरण जब शिवपुरी जंक्शन पर पड़ी, तो दुनिया बदल चुकी थी। संजना अब इस दुनिया में नहीं थी, लेकिन उसने अभय को जीने की एक वजह दी थी—उनका बेटा।

अभय ने अपने बेटे को सीने से लगाया। उन्होंने कसम खाई कि वह उसे वह सब देंगे जिसकी संजना ने कल्पना की थी। वह अब सिर्फ एक डीएसपी नहीं थे, वह एक पिता थे जो अपने अतीत के अंधेरे से लड़कर अपने बेटे के भविष्य के लिए रोशनी की ओर बढ़ रहे थे।

इंसानियत उस रात रोई थी, लेकिन एक पिता की ममता और एक पुलिसवाले के न्याय ने उस अंधेरे को हरा दिया था।


समाप्त