जब दरोगा ने आर्मी ऑफिसर को भरे बाजार में मारा जोरदार थपड़ फिर जो हुआ सब हैरान।

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इज्जत का हिसाब

सुनैना देवी रोज की तरह सड़क के किनारे गरमा गरम पकोड़े बना रही थी। दोपहर का वक्त था और सड़क पर भीड़भाड़ थी। ग्राहक उसके पकोड़े लेने आए थे। तभी दरोगा अमर सिंह अपनी बाइक पर वहां आया। आते ही उसने कहा, “ए औरत, कौन है बे? तुझे दिखता नहीं है कि तुम्हारी वजह से यहां जाम लग सकता है? और यहां ठेला लगाने के लिए तुझे किसने कहा? यहां मेरा राज चलता है। एक मिनट में अंदर करवा दूंगा। समझी? चल, यहां से जल्दी कर।”

सुनैना ने कहा, “दरोगा साहब, बस थोड़ी देर और। कुछ ही देर में ठेले से भीड़ कम हो जाएगी और मैं अपना ठेला यहां से कहीं और ले जाऊंगी।”

दरोगा ने गुस्से में कहा, “तुझे पता भी है कि मैं कौन हूं? तुझे समझ नहीं आता क्या? एक बार में अभी की?”

सुनैना ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “दरोगा साहब, मैं तो यहां थोड़ी ही देर ठेला लगाती हूं। आपको इससे कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। फिर आप मुझे यहां से जाने के लिए क्यों कह रहे हैं? और यहां पर और भी दुकानें हैं, आप और किसी को तो कुछ नहीं कहते।”

दरोगा ने उसकी बातों को अनसुना करते हुए कहा, “तुझे ऐसे समझ नहीं आएगा। तुझे सबक सिखाना ही पड़ेगा।”

जब दरोगा ने आर्मी ऑफिसर को भरे बाजार में मारा जोरदार थपड़ फिर जो हुआ सब  हैरान। - YouTube

सुनैना कुछ बोल पाती, उससे पहले दरोगा ने उसकी गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और फिर अचानक ठेले को लात मारकर बोला, “कल से यहां तेरा ठेला दिखना नहीं चाहिए। मुझे नहीं तो सीधा अंदर कर दूंगा। समझी?”

इतनी ही देर में पूरा ठेला हिल गया और गर्म तेल गिरते बचा। भीड़ के सामने सुनैना की रोजी-रोटी टूट गई। तभी दरोगा अपना बाइक उठाकर जाने लगा।

दूसरी तरफ, सुनैना का जवान बेटा रोहन बॉर्डर पर तैनात अपनी ड्यूटी कर रहा था। वह आर्मी में ऑफिसर बन चुका था और देश के लिए अपना फर्ज निभा रहा था। अगले दिन उसके पास एक कॉल आया।

“सर, मैं अमित बोल रहा हूं। कल दरोगा अमर सिंह ने आपकी मां के साथ बदतमीजी की, थप्पड़ मारा और ठेले को लात मारकर बोला, ‘कल मुझे यहां तेरा ठेला दिखा तो सीधा अंदर करवा दूंगा।’ सर, आपने देखा आपकी मां की इज्जत भरे बाजार में सबके सामने छीन ली।”

रोहन का दिल जल उठा। उसने कहा, “तुम चिंता मत करो, मैं सब देख लूंगा।”

इतना कहते ही रोहन ने फोन काट दिया। उसने सोचा, “दरोगा अमर सिंह ने सबके सामने मेरी मां की इज्जत और मेहनत को मिट्टी में मिला दिया। अब कुछ भी हो जाए, मैं उसे नहीं छोड़ने वाला।”

रोहन के चेहरे पर गुस्से की आग जल उठी। लेकिन उसने अपनी मां से कुछ नहीं कहा। रोहन ने बॉर्डर से छुट्टी ली और घर के लिए निकल पड़ा। अगले ही दिन वह अपने गांव पहुंच गया।

उसने अपनी मां से कहा, “मां, मैं आ गया।” सुनैना ने अपने बेटे को देखकर कहा, “बेटा, दरोगा से पंगा मत लेना। वह खतरनाक आदमी है।”

लेकिन रोहन के मन में यह बात गहराई तक बैठ चुकी थी कि जिसने उसकी मां को रुलाया है, उससे हिसाब जरूर लेना होगा। अगले दिन रोहन वर्दी में नहीं, बल्कि साधारण कपड़ों में अपनी मां के साथ पकोड़े बेचने लगा।

तभी दरोगा अपने पूरे रब के साथ वहां आया। आते ही उसने सुनैना को कहा, “अरे, कल मैंने क्या कहा था, भूल गई क्या? तू चल, हटा यहां से। तेरे ठेले को बड़ी आई यहां पकोड़े बेचने।”

रोहन सब देख रहा था। उसने दरोगा को शांति से कहा, “दरोगा साहब, आप ऐसे किसी के साथ बदतमीजी नहीं कर सकते। और यहां आपको क्या दिक्कत है ठेला लगाने से?”

दरोगा बहुत गुस्से में था। उसने रोहन की कॉलर जोर से पकड़ ली और बोला, “तुझे तो बहुत दिक्कत हो रही है रे!”

उसी समय दरोगा ने गुस्से में आकर रोहन के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। रोहन ने उस वक्त कुछ नहीं कहा। लेकिन अगले ही दिन रोहन साधारण कपड़ों में एसएओ के थाने पहुंचा।

उसने सीधे जाकर अमर सिंह से बात करनी चाही, लेकिन एसएओ साहब ने रोहन को रोक लिया और पूछने लगे, “किधर जा रहा है? बिना किसी से पूछे कहां जा रहा है?”

रोहन ने कहा, “साहब, मैं तो रिपोर्ट लिखवाने के लिए आया था।”

एसएओ ने उसे अपने कमरे में ले जाकर सामने की कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। रोहन के बैठते ही एसएओ ने कहा, “रिपोर्ट लिखवाने के पूरे ₹5000 लगेंगे। है क्या तुम्हारे पास?”

रोहन ने कहा, “₹5000 किस चीज के? साहब, रिपोर्ट तो फ्री में लिखी जाती है।”

एसएओ ने कहा, “तेरे पास ₹5000 हैं तो रिपोर्ट लिखूंगा, नहीं तो यहां से जाओ।”

रोहन ने गुस्से में दरोगा से अपनी मां के साथ हुई घटना का जिक्र किया। अमर सिंह भड़क उठा। उसने कहा, “सड़क सरकार की है। किसी को ठेला लगाने की इजाजत नहीं है। तेरी मां बीच सड़क पर ठेला लगाती है और मेरी बात नहीं मानती और मेरे आगे जुबान लड़ाती है। और तू खुद को आर्मी वाला बताकर मुझे डराना चाहता है। चल, यहां से!”

तभी दरोगा ने रोहन को धक्का दिया और जाने के लिए कहा। किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि एक आर्मी ऑफिसर के साथ दरोगा ऐसा करेगा। लेकिन उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उसने केवल इतना कहा, “इस थप्पड़ का हिसाब मैं लूंगा, दरोगा साहब।”

दरोगा ने कहा, “चल, तेरे से जो होता है कर लेना।”

रोहन वहां से आने लगा तो कुछ नौजवान उसके पास आए। उन्होंने कहा, “भाई, हम सब तेरे साथ हैं। उस दरोगा ने सालों से हमें दबा कर रखा है। लेकिन अगर तू आगे बढ़ेगा तो हम सब तेरे पीछे खड़े रहेंगे।”

रोहन ने बस इतना कहा, “जो होगा कानून के खिलाफ नहीं होगा, लेकिन हिसाब जरूर होगा।”

अगले ही दिन दरोगा ने एक और गरीब ठेले वाले को पीट डाला। इस बार रोहन मौके पर मौजूद था। वह आगे बढ़ा और भीड़ के सामने उसने अमर सिंह की कलाई पकड़ ली। पहली बार किसी ने अमर सिंह का हाथ थामा था।

भीड़ सन्न रह गई। दरोगा ने छूटने की कोशिश की, लेकिन रोहन की पकड़ लोहे जैसी थी। उसने ठेले वाले को छोड़ा और रोहन पर दहाड़ा, “तू मुझे रोकने वाला कौन होता है?”

रोहन ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “मैं वही हूं जिसकी मां के आंसू तूने देखे थे। और अब यह इलाका तेरी गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं करेगा।”

भीड़ भड़क उठी। लोगों ने शोर मचाना शुरू किया। दरोगा गुस्से में लाल हो गया। उसने तुरंत अपने सिपाहियों को बुलाया और रोहन को पकड़ने की कोशिश की। लेकिन भीड़ रोहन के साथ खड़ी हो गई।

भीड़ के बीच एक लड़के ने पुलिस को फोन कर दिया। उसी समय पुलिस आई और मामला सुलझाकर रफादफा कर दिया। लेकिन दरोगा बहुत घमंडी और गुस्से से भरा हुआ इंसान था। वह सोचने लगा, “इसको तो कल बाजार में ही देखेंगे।”

अगले दिन सुबह रोहन साधारण कपड़ों में बाजार गया। वह अपनी मां के लिए सब्जियां खरीद रहा था। थैला लेकर जैसे ही वह गली के मोड़ पर पहुंचा, अचानक चार-पांच आदमी उसके सामने आ खड़े हुए। पीछे से दरोगा अमर सिंह भी आ गया।

अमर सिंह ने दहाड़ते हुए कहा, “बहुत अकड़ दिखा रहा है तू। कल पूरे बाजार में मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी। आज तुझे सबक सिखाऊंगा।”

रोहन ने शांत स्वर में कहा, “दरोगा साहब, आप चाहे जो कर लें, लेकिन मैं अब डरने वाला नहीं।”

उसी समय दरोगा अमर सिंह ने इशारा किया और उसके दोस्त रोहन के ऊपर टूट पड़े। चारों तरफ से उन्होंने रोहन को पकड़ लिया। तभी रोहन ने अपने हाथ छुड़वाकर अपनी जेब से फोन निकाला और एसएओ को मिला दिया।

“साहब, दरोगा और उसके दोस्तों ने मुझे पकड़ रखा है। अभी की अभी यहां आओ।”

उसी समय एसएओ की गाड़ी देखते ही दरोगा अपने दोस्तों के साथ अपनी बाइक उठाकर भाग गया। एसएचओ अपनी जीभ लेकर तुरंत पहुंचा। उसने देखा कि दरोगा अमर सिंह और उसके आदमी एक आर्मी ऑफिसर को पीट कर भाग गए।

एसएओ साहब ने सिपाहियों से कहा, “जाओ। अभी की अभी दरोगा अमर सिंह को पकड़ कर मेरे पास लाओ।”

पुलिस वाले दरोगा अमर सिंह को पकड़ने के लिए निकल पड़े। थोड़ी देर बाद दो पुलिस वाले जीभ लेकर आते हुए दिखाई दिए। उनके साथ दरोगा अमर सिंह भी था। उसके हाथों में हथकड़ी लगी हुई थी और चेहरे पर अब वह अकड़ नहीं थी जो रोहन की मां को थप्पड़ मारते वक्त थी।

एसएओ साहब ने भीड़ के सामने दरोगा से कड़क आवाज में कहा, “अमर सिंह, तुमने वर्दी की इज्जत मिट्टी में मिला दी। जिस पुलिस को जनता की रक्षा करनी चाहिए, उसी पुलिस से तुमने डर और आतंक फैलाया। ऐसे लोगों को वर्दी पहनने का कोई हक नहीं है। तुम्हें अभी की अभी सस्पेंड किया जाता है।”

लेकिन दरोगा जल्दी हार मानने वालों में से नहीं था। अगले दिन सुबह के समय, रोहन ड्यूटी पर जाने के लिए अपने आर्मी बैग को कंधे पर टांग रखा था।

रोहन ने भीड़ में से रास्ता बनाते हुए प्लेटफार्म नंबर तीन की ओर कदम बढ़ाए। पर जैसे ही उसने ट्रेन के आने की सूचना सुनी, उसके भीतर एक अजीब सा आभास हुआ। जैसे कोई उसकी हर हरकत पर नजर रख रहा हो।

स्टेशन के बाहर एक दरोगा साधारण कपड़ों में खड़ा हुआ था। उसकी आंखों में गुस्सा साफ दिख रहा था। एसएचओ द्वारा सबके सामने दी गई बेइज्जती उसके दिल में चुभ रही थी। वर्दी की ताकत उसके हाथ से छीन चुकी थी और वह अब सिर्फ बदले की आग में जल रहा था।

उसने अपने दोस्तों की ओर देखते हुए धीमी आवाज में कहा, “आज इसको इसकी औकात दिखानी है। कल सबके सामने मेरी अकड़ मिट्टी में मिलाई थी। आज स्टेशन पर इसको सबक सिखाऊंगा।”

उनमें से एक बोला, “दरोगा जी, आज ट्रेन के शोरशराबे में जो कुछ होगा, किसी को समझ ही नहीं आएगा। हम लोग इसे इस कदर पीटेंगे कि इसके आर्मी वाले तेवर गायब हो जाएंगे।”

अमर सिंह की आंखों में गुस्सा उतर आया और उसने मुट्ठी भी ली। रोहन प्लेटफार्म पर खड़ा होकर ट्रेन का इंतजार कर ही रहा था कि अचानक चार-पांच लोग उसके पास आकर खड़े हो गए। उन्होंने उसे घेर लिया।

उनमें से एक ने रोहन के कंधे पर हाथ रखते हुए व्यंग से कहा, “ओ हीरो, कल तो बड़ा पुलिस वालों को सबक सिखा रहा था। अब अकेला खड़ा है। दिखा तेरी मदानगी।”

दूसरा बोला, “तुझे लगा तू आर्मी की वर्दी पहनकर बड़ा आदमी बन गया है। यहां तेरी कोई वर्दी काम नहीं आएगी।”

रोहन ने उनकी आंखों में देखा और शांत स्वर में कहा, “पीछे हटो। मैं यहां झगड़ा करने नहीं आया। मेरा काम है देश की रक्षा करना। गलियों और स्टेशनों पर दादागिरी करना नहीं।”

भीड़ अब धीरे-धीरे इकट्ठा होने लगी थी। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि मामला क्या है। तभी भीड़ में से दरोगा अमर सिंह सामने आया। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था।

वह रोहन के करीब आकर जोर से बोला, “ओ रोहन, तूने मुझे सबके सामने बेइज्जत किया था ना। एसएओ के सामने मेरी अकड़ मिट्टी में मिलाई थी ना।”

अमर सिंह के इशारे पर गुंडे अचानक रोहन पर टूट पड़े। एक ने उसकी कॉलर पकड़ ली। दूसरे ने बैग खींचा। तीसरे ने उसे धक्का दे दिया। पल भर में रोहन चारों तरफ से घिर गया।

चारों ओर अफरातफरी मच गई। किसी ने चाय का गिलास गिरा दिया तो कोई अपना सामान छोड़कर दौड़ पड़ा। रोहन ने खुद को संभाला और एक तेज झटके से अपनी कॉलर छुड़ाई।

उसने शांत लेकिन गहरी आवाज में कहा, “मैंने कहा था, मुझसे उलझोगे तो पछताओगे।” और फिर उसने एक जोरदार मुक्का उस आदमी के चेहरे पर मारा जिसने उसकी कॉलर पकड़ी थी। वह आदमी लड़खड़ाकर जमीन पर गिर पड़ा।

अब अमर सिंह खुद आगे बढ़ा। उसने रोहन की वर्दी पर हाथ रखते हुए कहा, “आज देखता हूं तेरी आर्मी ट्रेनिंग कितना काम आती है।” और उसने सीधे रोहन के चेहरे पर थप्पड़ मारने की कोशिश की।

लेकिन रोहन ने उसके हाथ को रोक लिया और आंखों में आंखें डालकर कहा, “यह हाथ देश की रक्षा के लिए बने हैं। तेरे जैसों को सबक सिखाने के लिए नहीं। लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो तुम्हें भी रोकना पड़ेगा।”

अगले ही पल उसने अमर सिंह को जोर से पीछे धकेल दिया। भीड़ अब और जोर से चिल्लाने लगी। कोई पुलिस को बुलाने भागा, कोई वीडियो बनाने लगा। लेकिन लड़ाई इतनी तेज थी कि किसी को रोकने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

स्टेशन पर अफरातफरी का माहौल बन चुका था। इसी बीच प्लेटफार्म पर अचानक सायरन की आवाज गूंजी। भीड़ ने देखा कि एसएओ की जीप स्टेशन के भीतर तेजी से आ रही है। साथ में कई सिपाही भी थे।

एसएओ गाड़ी से उतरते ही चिल्लाया, “सिपाहियों, दरोगा और उसके आदमियों को तुरंत पकड़ो!”

अमर सिंह ने यह देखा तो उसकी सांसे तेज हो गई। उसने भागने की कोशिश की। लेकिन इस बार रोहन ने उसका कॉलर पकड़ लिया और भीड़ के सामने उसे खींच लिया।

तेजी से आगे आया और अमर सिंह की ओर देखते हुए गुस्से से गरजा, “अमर सिंह, मैंने सोचा था सस्पेंड करने के बाद तू सुधर जाएगा। लेकिन तू तो और भी बदल गया। अब तू सिर्फ पुलिस की नहीं बल्कि सेना के जवान पर हमला करने का गुनाह कर बैठा है।”

“इस बार तुझे सिर्फ सस्पेंशन नहीं बल्कि जेल होगी।”

दो सिपाहियों ने तुरंत अमर सिंह के हाथ पीछे कर हथकड़ी डाल दी। भीड़ ने तालियों और नारों से पूरा स्टेशन गूंजा दिया। लोग कह रहे थे, “फौजी जिंदाबाद, रोहन जिंदाबाद।”

किसी ने अपने मोबाइल से पूरी घटना की रिकॉर्डिंग एसएओ को दिखाई जिसमें साफ दिख रहा था कि कैसे अमर सिंह और उसके साथियों ने पहले हमला किया था।

एसएओ ने गुस्से में वीडियो देखकर कहा, “बस अब कोर्ट में तेरा खेल खत्म। तूने वर्दी की इज्जत मिटाई है। अब तुझे जेल होगी।”

स्टेशन पर भीड़ अब रोहन के चारों ओर इकट्ठा हो गई थी। एक बुजुर्ग यात्री आगे बढ़े और बोले, “बेटा, तूने तो हमें आज गर्व से भर दिया। तू अकेला होकर भी ना जाने कितनों की जान बचा ली।”

छोटे-छोटे बच्चे उसके पास आकर उसके जूतों को छूने लगे। जैसे कोई देवता उनके बीच खड़ा हो। एसएओ ने भीड़ की ओर मुखातिब होकर कहा, “याद रखो, यही है असली वर्दी की ताकत। यह जवान हमारी सीमाओं पर दिन रात खड़ा रहता है ताकि हम चैन की नींद सो सकें। रोहन ना सिर्फ आर्मी का सच्चा सिपाही है बल्कि इस शहर का भी गर्व है।”

ट्रेन अब प्लेटफार्म पर आ चुकी थी। रोहन से कहा, “जाओ बेटा, अपनी ड्यूटी पर जाओ। देश की सीमाएं तेरा इंतजार कर रही हैं। यहां का हिसाब अब हम देखेंगे।”

रोहन ने एसएचओ को सलाम किया, बैग उठाया और ट्रेन में चढ़ गया। उसकी आंखों में खुशी थी और होठों पर हल्की मुस्कान थी। जैसे ही ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी, पूरा स्टेशन उसके सम्मान में तालियों और नारों से गूंज उठا।

दोस्तों, हमारे देश के आर्मी जवानों के लिए एक लाइक तो बनता है। और दोस्तों, हमारे जवानों के लिए कमेंट में दो शब्द जरूर लिखना।