सब्र का फल और अल्लाह का इंसाफ: ज़ैनब की अनकही दास्तान

अध्याय 1: यतीम का आँगन और लालच की दीवार

कहते हैं कि जब किसी बेसहारा पर जुल्म हद से बढ़ जाए, तो अर्श-ए-इलाही हिल जाता है। ज़ैनब, जिसकी उम्र महज 18 साल थी, कुदरत का एक हसीन शाहकार थी। उसकी मासूम आँखों में सादगी थी, लेकिन तकदीर ने उसके सिर से वालिदैन (माता-पिता) का साया बहुत पहले छीन लिया था। वह अपने बड़े भाई शाहिद और लालची भाभी नुसरत के रहमोकरम पर जी रही थी।

ज़ैनब उस घर में एक बहन नहीं, बल्कि एक मुफ्त की नौकरानी थी। फजर की अज़ान के साथ ही नुसरत की चीखें गूँजने लगती थीं, “ऐ ज़ैनब! उठ और बावर्चीखाना संभाल।” ज़ैनब फटे दुपट्टे से अपनी आँखें पोंछती और काम में लग जाती। उसे नाश्ते में सूखी रोटी मिलती, जबकि नुसरत अपने बच्चों को मक्खन और पराठे खिलाती।

अध्याय 2: मासूम का सौदा

वक्त बीतता गया और ज़ैनब की जवानी उसकी दुश्मन बन गई। नुसरत को डर था कि ज़ैनब की शादी में जहेज (दहेज) देना पड़ेगा। एक दिन एक रिश्ता लाने वाली माई ने शहर के सबसे बड़े रईस, सेठ हयात खान का जिक्र किया। सेठ जी की उम्र 75 साल थी, वे बीमार थे और उनके आगे-पीछे कोई न था। वे मेहर के रूप में लाखों रुपये देने को तैयार थे।

नुसरत के लालची दिमाग ने हिसाब लगाया— “बूढ़ा चंद महीनों का मेहमान है, फिर ज़ैनब वापस आ जाएगी और हमारे पास लाखों रुपये होंगे।” शाहिद ने पहले तो विरोध किया, लेकिन पत्नी के दबाव में अपनी सगी बहन का सौदा कर दिया। जब ज़ैनब को यह पता चला, तो वह भाई के पैरों में गिर गई, “भाईजान! क्या यतीम होना इतना बड़ा गुनाह है?” मगर शाहिद ने नज़रें फेर लीं।

.

.

.

अध्याय 3: हवेली का सन्नाटा और दवा की खुशबू

निकाह का दिन किसी मातम से कम नहीं था। ज़ैनब को एक पुरानी हवेली में ले जाया गया। वहाँ हर तरफ दवाइयों की बदबू थी। सेठ हयात खान बिस्तर पर लेटे शदीद खाँसी से जूझ रहे थे। ज़ैनब डर के मारे कांप रही थी, लेकिन जब उसने सेठ जी की आँखों में देखा, तो वहाँ हवस नहीं, बल्कि एक बेबस पिता जैसी लाचारी थी।

सेठ जी ने कांपती आवाज़ में कहा, “बेटी, मुझे माफ कर देना। मेरे रिश्तेदारों ने मुझे गिद्धों की तरह घेर रखा है, उन्हें मेरी मौत का इंतज़ार है। मुझे बीवी नहीं, एक सहारा चाहिए था जो मेरी आँखें बंद होने तक वफादारी से मेरे पास रहे।” ज़ैनब का दिल पिघल गया। उसने अपनी जिम्मेदारी समझी और रात-दिन उनकी खिदमत में लग गई।

अध्याय 4: नियति का पलटवार

ज़ैनब की बेलौस खिदमत का असर हुआ कि सेठ जी की तबीयत सुधरने लगी। डॉक्टरों ने जिसे छह महीने का वक्त दिया था, वह डेढ़ साल तक जीवित रहे। इधर गाँव में नुसरत और शाहिद रोज़ सेठ जी की मौत की खबर का इंतज़ार करते थे ताकि वे जायदाद हथिया सकें। एक बार वे हवेली आए और ज़ैनब को रानी की तरह रहते देख उनके सीने पर सांप लोट गए। नुसरत ने चालाकी से कहा, “सेठ साहब, ज़ैनब तो बच्ची है, हम यहीं शिफ्ट हो जाते हैं।” मगर सेठ जी ने उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया।

अध्याय 5: वसीयत का वह ऐतिहासिक दिन

एक सर्द रात, सेठ हयात खान दुनिया से रुखसत हो गए। हवेली में मातम छा गया। जैसे ही खबर फैली, दूर-दराज के तमाम रिश्तेदार, शाहिद और नुसरत किसी भूखे शिकारी की तरह हवेली पहुँच गए। सबकी नज़रें तिजोरी की चाबियों पर थीं।

तीसरे दिन वकील मिस्टर रहमान आए और उन्होंने वसीयत पढ़ना शुरू किया। हॉल में सन्नाटा था। वकील ने पढ़ा, “मैं हयात खान, अपनी पूरी होशो-हवास में यह वसीयत करता हूँ। मेरे उन रिश्तेदारों को, जिन्होंने मेरी बीमारी में कभी पानी का घूँट तक न पूछा, उन्हें मैं एक कौड़ी भी नहीं दे रहा।”

हॉल में हंगामा मच गया। वकील ने आगे पढ़ा, “मेरी तमाम जायदाद, टेक्सटाइल मिल्स, 50 दुकानें और यह हवेली, सबकी एकमात्र मालकिन मेरी बीवी ज़ैनब है। उसने बेटी बनकर मेरी सेवा की है।”

अध्याय 6: स्वाभिमान की जीत

नुसरत दौड़कर ज़ैनब के पास गई, “मेरी प्यारी ननद! मुझे पता था अल्लाह तुझे फल देगा। अब हम सब यहीं मिलकर रहेंगे।” ज़ैनब ने पहली बार अपना सिर गर्व से उठाया। उसकी आँखों में अब वह पुराना डर नहीं था।

उसने नुसरत का हाथ झटक दिया और गरजकर कहा, “भाभी! जब मुझे एक वक्त के सालन की ज़रूरत थी, तब आपने मुझे ताने दिए। जब मुझे अपनों की ज़रूरत थी, तो आपने मुझे बेच दिया। अब मुझे आपकी ज़रूरत नहीं है।” ज़ैनब ने नौकरों को आदेश दिया कि इन दोनों को इज़्ज़त के साथ हवेली की दहलीज से बाहर छोड़ आएँ। शाहिद और नुसरत रुसवा होकर बाहर निकले।

निष्कर्ष: ‘मादरे यतीमान’ ज़ैनब

ज़ैनब ने उस दौलत का इस्तेमाल अपनी ऐय्याशी के लिए नहीं किया। उसने हवेली का एक बड़ा हिस्सा यतीम बच्चियों के लिए वक्फ कर दिया और ‘सेठ हयात खान चैरिटेबल ट्रस्ट’ बनाया। आज लोग उसे ‘ज़ैनब बीवी’ नहीं, बल्कि ‘मादरे यतीमान’ (अनाथों की माँ) के नाम से पुकारते हैं।

लेखक का संदेश: यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान चाहे जितनी चालाकी कर ले, तकदीर का कलम अल्लाह के हाथ में है। जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद उसमें गिरता है। सब्र और ईमानदारी का रास्ता भले ही कठिन हो, लेकिन उसका अंत हमेशा सुखद होता है।


नोट: यह कहानी समाज में विधवाओं और अनाथों की स्थिति पर एक कड़ा प्रहार है। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो इसे साझा करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। अल्लाह हाफिज।