घमंडी पहलवान vs 70 साल का बूढ़ा: कौन जीता? 😱
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घमंडी पहलवान vs 70 साल का बूढ़ा — किसकी जीत हुई?
सुल्तानपुर का अखाड़ा उस दिन कुछ ज़्यादा ही शोर से भरा हुआ था।
चारों तरफ़ मिट्टी उड़ रही थी, ढोल की थाप गूंज रही थी और भीड़ का जोश आसमान छू रहा था। गांव, कस्बे और आस-पास के इलाकों से लोग उमड़ पड़े थे। हर किसी की ज़ुबान पर बस एक ही नाम था—
अर्जुन राणा।
“अरे देखो, अर्जुन राणा आ गया!”
“यार ये तो पहाड़ जैसा लगता है।”
“आज तो सामने वाला बच नहीं पाएगा।”
अर्जुन राणा…
142 किलो वज़न, लोहे जैसे बाजू, उभरी हुई नसें और आंखों में ऐसा घमंड, जैसे दुनिया उसी के पैरों तले हो। उसने 150 नहीं, बल्कि अब 200 मुकाबले जीतने का दावा किया था। अखाड़े में उतरते ही वह चारों तरफ़ देखकर मुस्कुराया, जैसे यह जगह उसकी जागीर हो।
“क्या हाल है सुल्तानपुर?”
उसने ऊंची आवाज़ में कहा,
“तैयार हो मुझे हारते देखने के लिए?”
भीड़ में से आवाज़ आई—
“बेटा, थोड़ा विनम्र रह।”
अर्जुन हंसा।
“ये घमंड नहीं है, आत्मविश्वास है।
मैंने 200 मुकाबले जीते हैं।”
गुरुजी ने धीरे से कहा,
“हां बेटा… लेकिन—”
“कोई लेकिन नहीं गुरुजी,”
अर्जुन ने बात काट दी,
“आज भी मैं जीतूंगा।”

अर्जुन की धाक
पहले कुछ मुकाबले अर्जुन ने ऐसे जीते, जैसे बच्चे खिलौने हों।
एक को धोबी पछाड़, दूसरे को उठा कर बाहर।
दो मिनट भी नहीं लगे।
“बस इतना ही?”
अर्जुन हंसा,
“मैं तो दो मिनट में निपटा देता हूं।”
हर जीत के साथ उसका अहंकार और बढ़ता गया।
वह हारने वालों को ताने मारता—
“अगली बार घर पर टीवी देखना।”
“यहां आकर बेइज़्ज़ती क्यों करवाते हो?”
गुरुजी ने टोका—
“अर्जुन, ये क्या बदतमीज़ी है?”
“मैं सच बोल रहा हूं गुरुजी,”
अर्जुन बोला,
“ये लोग मेरे सामने टिक ही नहीं सकते।”
गुरुजी की आंखों में चिंता थी।
उन्होंने धीमे से कहा—
“एक दिन तेरा भी घमंड टूटेगा, अर्जुन।”
अर्जुन ठहाका मार कर हंसा—
“वो दिन कभी नहीं आएगा।”
नई चुनौती
अर्जुन ने माइक उठाया।
“मैं फिर से चुनौती देता हूं।”
“ये दस लाख मैं दोबारा लगा रहा हूं।”
भीड़ में हलचल मच गई।
“कोई है जो मुझे हरा सके?”
अर्जुन ने दहाड़ लगाई।
गुरुजी बोले—
“बहुत हो गया, चल अब।”
“नहीं गुरुजी,”
अर्जुन ज़िद पर अड़ गया,
“मैं सबको दिखाना चाहता हूं कि मैं अजय हूं।”
अचानक भीड़ के पीछे से एक आवाज़ आई—
“मैं हूं।”
भीड़ जैसे जम गई।
“कौन है ये?”
“कहां से आया?”
भीड़ चीरते हुए एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी आगे आया।
सफेद दाढ़ी, झुकी हुई पीठ, शरीर पर सिर्फ हड्डियों का ढांचा।
अर्जुन हंस पड़ा—
“ये क्या मज़ाक है?”
“इसे कोई बाहर निकालो।”
लेकिन बूढ़ा शांत खड़ा रहा।
“मेरा नाम भैरव सिंह है,”
उसने धीमी लेकिन साफ़ आवाज़ में कहा।
भैरव सिंह का परिचय
अर्जुन ने उपहास किया—
“भैरव सिंह?”
“नाम अच्छा है, लेकिन नाम में क्या रखा है?”
“तेरा वजन कितना है बूढ़े?”
“51 किलो,” भैरव सिंह ने जवाब दिया।
अर्जुन ज़ोर से हंसा—
“मेरा एक बाजू ही 51 किलो का है।”
“मेरा वजन जानता है? 142 किलो।”
भैरव सिंह मुस्कुराए—
“अनुभव है बेटा।”
“तूने मुझे बेटा कहा?”
अर्जुन भड़क उठा।
“हां,”
भैरव सिंह बोले,
“उम्र में छोटा है, इसलिए बेटा ही कहूंगा।”
भीड़ में खुसर-पुसर शुरू हो गई।
तभी गुरुजी आगे आए—
“रुको… मैं इसे जानता हूं।”
“ये भैरव सिंह हैं।”
“1978 के राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियन।”
भीड़ में सन्नाटा।
अर्जुन हंसा—
“1978?”
“47 साल पहले?”
“अब ये बूढ़ा हो चुका है, खत्म।”
शरीर बनाम अनुभव
भैरव सिंह ने शांत स्वर में कहा—
“शरीर बूढ़ा हुआ है, दिमाग नहीं।”
अर्जुन बोला—
“दिमाग पहलवानी में काम नहीं करता।”
“ताकत काम करती है।”
भैरव सिंह मुस्कुराए—
“गलत।”
“पहलवानी 70% दिमाग और 30% ताकत है।”
“बकवास!”
अर्जुन चिल्लाया,
“मैंने अपनी ताकत से 200 मुकाबले जीते हैं।”
“हां,”
भैरव सिंह बोले,
“जब तू पैदा भी नहीं हुआ था, तब मैं अखाड़ों में राज कर रहा था।”
मुकाबले की शुरुआत
गुरुजी ने आख़िरी बार पूछा—
“भैरव, तुम अपनी ज़िम्मेदारी पर लड़ रहे हो?”
“हां,”
भैरव सिंह ने हाथ जोड़कर कहा,
“आशीर्वाद दीजिए।”
ढोल बजा।
“शुरू!”
अर्जुन बिजली की तरह झपटा।
लेकिन भैरव सिंह एक कदम पीछे हटे।
“क्या?”
“कैसे बचा?”
“अनुभव, बेटा,”
भैरव सिंह बोले।
अर्जुन ने दोबारा पकड़ा।
“इस बार नहीं बचेगा।”
लेकिन—
धड़ाम!
अर्जुन खुद ज़मीन पर था।
भीड़ उछल पड़ी—
“अरे!”
“ये कैसे हुआ?”
“धोबी पछाड़!”
“बूढ़े ने गिरा दिया!”
अहंकार का टूटना
अर्जुन उठ खड़ा हुआ।
“फ्लूक था!”
“दोबारा नहीं होगा।”
फिर हमला।
फिर—
धड़ाम!
दूसरी बार।
अर्जुन की आंखों में डर की हल्की सी झलक आ गई।
“ये जादू है क्या?”
“नहीं,”
भैरव सिंह बोले,
“ये कला है।”
तीसरी बार अर्जुन ने पूरी ताकत झोंक दी।
“अब नहीं बचेगा!”
लेकिन—
धड़ाम!
तीसरी बार भी वही नतीजा।
अखाड़ा गूंज उठा—
“भैरव सिंह की जय!”
अर्जुन हांफ रहा था।
उसका घमंड टूट चुका था।
असली जीत
अर्जुन घुटनों पर बैठ गया।
“मैं हार गया…”
गुरुजी बोले—
“पहलवान ज़मीन पर नहीं रोते।”
अर्जुन ने सिर झुका दिया।
भैरव सिंह आगे आए।
“40 साल पुराना कर्ज़ उतार दिया बेटा।”
अर्जुन ने उनके पैर छुए।
“माफ़ कर दीजिए।”
“मैंने आपका अपमान किया।”
भैरव सिंह ने उसे उठाया।
“मैंने पहले ही माफ़ कर दिया।”
अंत
गुरुजी ने ऐलान किया—
“विजेता— भैरव सिंह!”
भीड़ गूंज उठी—
“भैरव सिंह जिंदाबाद!”
“अर्जुन राणा जिंदाबाद!”
“सुल्तानपुर जिंदाबाद!”
अर्जुन ने आज पहली बार सीखा था—
ताकत से मुकाबले जीते जाते हैं,
लेकिन घमंड को सिर्फ अनुभव ही हराता है।
और उस दिन अखाड़े में
एक बूढ़ा नहीं जीता था—
एक सोच जीती थी।
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