घर लौट रही महिला टीचर के साथ हुआ हादसा/S.P साहब के रोगंटे खड़े हो गए/
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घर लौट रही महिला टीचर के साथ हुआ हादसा
एक भरोसे से शुरू हुई कहानी, जो भय, ब्लैकमेल और खून तक पहुँची
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले का कल्याणपुर इलाका—शांत कॉलोनियाँ, रोज़मर्रा की हलचल, और छोटे-छोटे घरों की दुनिया। यहीं गुप्ता कॉलोनी के मकान नंबर 452/56 में रहती थीं सुमित्रा देवी। एक साधारण सी महिला, पेशे से स्कूल टीचर, जिनकी पहचान उनकी सादगी, मेहनत और ईमानदारी से थी।
सुमित्रा की ज़िंदगी आसान नहीं थी। तीन साल पहले एक सड़क हादसे में उनके पति की मृत्यु हो चुकी थी। घर में उनकी बूढ़ी माँ कृष्णा देवी और पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला इकलौता बेटा सोनू था। सुमित्रा ही घर की रीढ़ थीं—कमाई भी, देखभाल भी, और हर दिन की चिंता भी।

हर सुबह लगभग आठ बजे एक ऑटो रिक्शा उन्हें स्कूल ले जाता और छुट्टी के बाद वही ऑटो उन्हें घर छोड़ देता। यही उनकी दिनचर्या थी—सधी हुई, भरोसेमंद, बिना किसी अनिश्चितता के। लेकिन किसे पता था कि एक दिन ऑटो का न आना, पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल देगा।
भरोसे की पहली दरार
एक सुबह ऑटो नहीं आया। सुमित्रा ने घड़ी देखी, फिर बाहर झाँका। वही गली, वही मोड़—लेकिन आज रिक्शा गायब था। समय कम था। तभी पास में रहने वाला सुनील याद आया—पड़ोसी, पेशे से ऑटो चालक। उसकी ऑटो जर्जर थी, अक्सर बीच रास्ते में खराब हो जाती थी, इसलिए वह नियमित सवारी नहीं पकड़ पाता था।
सुमित्रा ने उसे आवाज़ दी।
“सुनील, आज मेरा ऑटो नहीं आया। क्या तुम मुझे स्कूल छोड़ दोगे?”
सुनील ने हामी भर दी। उस दिन उसने उन्हें सुरक्षित स्कूल पहुँचा दिया। लौटकर घर आ गया। सुमित्रा के मन में एक विचार जन्मा—“लड़का ठीक लगता है, क्यों न इसी से रोज़ आना-जाना करूँ?”
शाम को सुनील उनके घर आया। बोला—“मैडम, ऑटो खराब है। पंद्रह हज़ार की ज़रूरत है।”
सुमित्रा ने बिना ज़्यादा सोचे पैसे दे दिए—एक शर्त पर कि सुनील रोज़ समय से उन्हें स्कूल छोड़ने-लाने आएगा।
यहीं से भरोसे की नींव पड़ी—और यहीं से अनदेखी खाई भी।
धीरे-धीरे बदलती नीयत
अगले एक महीने सब ठीक चला। सुनील रोज़ आता, समय पर स्कूल छोड़ता, छुट्टी में लेने आता। सुमित्रा निश्चिंत थीं। उन्हें क्या पता था कि किसी के मन में कैसी सोच पल रही है।
8 अक्टूबर 2025 की सुबह सुनील फिर आया। सुमित्रा तैयार थीं। आज वह कुछ अलग लगीं—सुंदर, सजी हुई, आत्मविश्वासी। सुनील की नज़र बदली। मन में एक गंदा विचार पलने लगा—“आज…।”
रास्ते में बातचीत हुई। सुमित्रा ने कहा कि छुट्टी के बाद शहर जाकर माँ और बेटे के लिए कपड़े लेने हैं। सुनील ने हामी भर दी। स्कूल पहुँचे। सुमित्रा पढ़ाने चली गईं। उधर सुनील ने दिन भर थोड़े पैसे कमाए—और शाम होते-होते नशे में डूब गया। मन में एक ही ठान—आज कुछ कर गुजरना है।
सुनसान रास्ता और टूटा भरोसा
करीब तीन बजे सुमित्रा का फोन आया। सुनील स्कूल पहुँचा। सुमित्रा बैठीं। शहर गए। शॉपिंग हुई—दो-तीन घंटे निकल गए। शाम ढलने लगी।
वापसी में, दो किलोमीटर आगे एक सुनसान इलाका आया। सुनील ने ऑटो रोका—“शायद खराबी है।”
वह नीचे उतरा, ढोंग करने लगा। तभी उसने जेब से छोटा धारदार हथियार निकाला और सुमित्रा की गर्दन पर रख दिया।
“चिल्लाई तो यहीं काट दूँगा।”
डर ने सुमित्रा की आवाज़ छीन ली। उन्हें खेतों की ओर घसीट लिया गया। धमकियाँ, हिंसा—और इंसानियत का पतन। जब सुनील का मन नहीं भरा, उसने दोस्त राजीव को बुलाया। दोनों ने मिलकर नशा किया—और फिर वही दरिंदगी दोहराई गई। ऊपर से वीडियो बनाकर ब्लैकमेल।
रात को उन्हें घर के सामने उतार दिया गया—धमकी के साथ।
खामोशी का बोझ
सुमित्रा ने किसी को नहीं बताया। माँ को नहीं, पड़ोसी को नहीं। डर ने उन्हें जकड़ लिया। स्कूल जाना बंद हो गया। नींद टूट गई। आँखों में भय बस गया।
कुछ दिन बाद फिर धमकी—होटल बुलाया गया। वीडियो वायरल करने, बेटे और माँ को मारने की धमकी। मजबूरी में वह गईं। वही अत्याचार दोहराया गया। फिर पैसे माँगे गए—लाखों। उन्होंने बैंक से निकाले, दे दिए। वीडियो फिर भी नहीं मिटाया गया।
यह सिलसिला चलता रहा।
निर्णय की रात
25 अक्टूबर 2025। एक और कॉल। वही होटल। वही धमकी।
इस बार सुमित्रा ने मन में ठान लिया—“यह अंतहीन नहीं चल सकता।”
रात करीब साढ़े नौ बजे वह घर से निकलीं—रसोई से एक चाकू छुपाकर। होटल पहुँचीं। सुनील और राजीव नशे में थे। घंटों शराब चली। जैसे-जैसे दोनों बेसुध हुए, सुमित्रा के भीतर जमा डर ने एक भयावह निर्णय का रूप ले लिया।
मौका मिला—और चाकू चला। पहले सुनील पर, फिर राजीव पर। चीख-पुकार मच गई। होटल मालिक पहुँचा। पुलिस को फोन किया गया।
पुलिस आई—तो दोनों युवक दम तोड़ चुके थे।
सच का बोझ और कानून
सुमित्रा गिरफ्तार हुईं। थाने में पूछताछ हुई। महिला हेड कांस्टेबल के सामने उन्होंने पूरी कहानी रख दी—एक-एक घटना, एक-एक धमकी, एक-एक डर।
पुलिस के भी होश उड़ गए। चार्जशीट दाख़िल हुई। मामला अदालत पहुँचा।
यह कहानी किसी “सही-गलत” के सरल खांचे में नहीं बैठती। यह कहानी है भरोसे के टूटने, ब्लैकमेल की क्रूरता, समाज के डर, और कानून की जटिलता की। न्यायालय तय करेगा कि सज़ा क्या होगी—लेकिन यह सवाल समाज के सामने रह जाता है:
अगर शुरुआत में मदद मिलती, तो क्या यह अंत होता?
अगर डर के बजाय सहारा मिलता, तो क्या जानें बचतीं?
क्या खामोशी सबसे बड़ा अपराध बन जाती है?
अंतिम शब्द
यह कहानी चेतावनी है—कि भरोसा अमूल्य है, पर अंधा नहीं होना चाहिए।
कि पीड़ित को बोलने का सुरक्षित रास्ता चाहिए।
और कि कानून, समाज और संवेदनशीलता—तीनों को साथ चलना होगा।
आप क्या सोचते हैं?
कमेंट में लिखें—यह कहानी आपको क्या सिखाती है?
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