पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर दिया कारनामा/पत्नी के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/
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अध्याय 1: वर्दी के पीछे का अंधेरा
कानपुर जिले का सरसोल गाँव वैसे तो शांत था, लेकिन यहाँ रहने वाले यशपाल की चर्चा अक्सर दबी जुबान में होती थी। यशपाल उत्तर प्रदेश पुलिस में एक हेड कांस्टेबल था। खाकी वर्दी पहनकर कानून की रक्षा करने की शपथ लेने वाला यशपाल खुद अपराध की दलदल में धंसा हुआ था। वह एक ऐसा पुलिसकर्मी था जिसके लिए ‘ईमानदारी’ शब्द का कोई मोल नहीं था। उसका पूरा दिन लोगों को डराने-धमकाने और उनसे मोटी रिश्वत वसूलने में बीतता था।
यशपाल के पास पैसों की कमी नहीं थी, लेकिन वह पैसा जिस रास्ते से आता था, उसी रास्ते निकल भी जाता था। यशपाल को शराब और जुए की ऐसी लत थी कि वह अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा कोठों और जुए के अड्डों पर लुटा देता था। वह अक्सर बीस-बीस दिनों तक घर नहीं आता था। उसे न अपने बेटे बिट्टू की परवाह थी और न ही अपनी पत्नी रूबी की।
रूबी एक साधारण गृहिणी थी। उसका पूरा दिन घर के काम और अपने इकलौते बेटे बिट्टू की यादों में बीतता था। बिट्टू पास के ही एक हॉस्टल में आठवीं कक्षा में पढ़ता था। घर में रूबी बिल्कुल अकेली थी। यशपाल जब कभी घर आता भी था, तो वह रूबी से प्यार से बात करने के बजाय उस पर रौब झाड़ता था। अगर रूबी उससे पूछती कि वह इतने दिनों तक कहाँ था, तो यशपाल उसे मारने-पीटने पर उतारू हो जाता।

धीरे-धीरे रूबी को पता चल गया कि उसका पति उसे धोखा दे रहा है और बाहर महिलाओं के साथ समय गुजारता है। इस सच ने रूबी के मन में एक अजीब सी रिक्तता और नफरत भर दी। वह घर के सूनेपन से घबराने लगी थी। उसने यशपाल से कई बार कहा कि घर में कोई नौकर रख लो ताकि उसे किसी का साथ मिल सके, लेकिन यशपाल शक्की मिजाज का था। उसे डर था कि कोई दूसरा आदमी घर में रहेगा तो रूबी उसे धोखा दे सकती है।
एक दिन यशपाल और रूबी के बीच इतना जबरदस्त झगड़ा हुआ कि यशपाल ने रूबी की बेरहमी से पिटाई कर दी और घर से निकलते हुए चिल्लाया, “अब तक तो मैं बीस दिन में आता था, अब मैं दो-दो महीने तक शक्ल नहीं दिखाऊंगा!”
अध्याय 2: एक खाली सिलेंडर और एक नई शुरुआत
तारीख थी 10 दिसंबर 2025। सुबह के सात बजे थे। रूबी रसोई में चाय बनाने गई, तो उसे अहसास हुआ कि गैस सिलेंडर खत्म हो गया है। उसने यशपाल को फोन करने के बारे में सोचा, लेकिन फिर उसे पिछली लड़ाई याद आ गई। उसने तय किया कि वह अपनी पड़ोसन साधना से मदद मांगेगी।
साधना और रूबी अच्छी सहेलियां थीं। जब रूबी साधना के घर पहुँची, तो साधना ने उसे अंदर बुला लिया। दोनों बातें करने लगीं। उसी समय साधना का पति, तेजपाल सिंह घर लौटा। तेजपाल एक ट्रक ड्राइवर था। वह देखने में हट्टा-कट्टा था, लेकिन स्वभाव से थोड़ा आवारा किस्म का था। जैसे ही तेजपाल की नजर रूबी पर पड़ी, उसकी नियत डोल गई। रूबी की खूबसूरती ने उसे अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
तेजपाल ने बातों-बातों में रूबी से उसके घर के हालात पूछने शुरू किए। रूबी, जो पहले से ही अपने पति के व्यवहार से दुखी थी, उसने तेजपाल को सब कुछ बता दिया। उसने बताया कि कैसे उसका पति उसे अकेला छोड़ देता है और वह घर में कितनी उदास रहती है। तेजपाल को समझ आ गया कि शिकार तैयार है। उसने रूबी से हमदर्दी दिखाई।
साधना ने तेजपाल से कहा, “रूबी का सिलेंडर खत्म हो गया है, शाम को हमारे यहाँ से एक सिलेंडर इनके घर पहुँचा देना।” तेजपाल के लिए यह एक सुनहरा मौका था। उसने मुस्कुराते हुए हामी भर दी।
शाम को ठीक पांच बजे, तेजपाल सिलेंडर लेकर रूबी के घर पहुँचा। रूबी ने दरवाजा खोला, तो तेजपाल की आंखों में एक अलग ही चमक थी। रूबी भी तेजपाल की ओर आकर्षित महसूस कर रही थी। सिलेंडर रसोई में रखने के बाद तेजपाल ने अपनी चाल चली। उसने रूबी से कहा, “मुझे 5000 रुपये की बहुत जरूरत है, क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो?”
रूबी कमरे में गई और 5000 रुपये लाकर तेजपाल की हथेली पर रख दिए। लेकिन साथ ही उसने एक ऐसी शर्त रखी जिसने तेजपाल को भी चौंका दिया। रूबी ने कहा, “ये पैसे वापस करने की जरूरत नहीं है, बस तुम्हें मेरे साथ वक्त बिताना होगा।”
तेजपाल, जो खुद यही चाहता था, तुरंत मान गया। उसने बताया कि अगली रात उसकी पत्नी साधना अपने मायके जा रही है, और वह रात को रूबी का इंतजार करेगा।
अध्याय 3: अनैतिकता की राह
11 दिसंबर की रात को जब सरसोल गाँव सो रहा था, रूबी दबे पांव अपने घर से निकली और तेजपाल के घर पहुँच गई। उस रात उन दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना जो समाज और कानून की नजर में गलत था, लेकिन दोनों के लिए वह एक जरूरत बन गया था। रूबी को वह शारीरिक और मानसिक साथ मिल रहा था जिसकी वह लंबे समय से भूखी थी, और तेजपाल को रूबी के साथ-साथ पैसे भी मिल रहे थे।
यह सिलसिला कई दिनों तक चला। जब भी साधना घर पर नहीं होती, रूबी वहाँ पहुँच जाती। लेकिन पाप का घड़ा ज्यादा दिन तक छुपा नहीं रहता। तेजपाल अपनी इस “उपलब्धि” को अपने तक सीमित नहीं रख सका। 24 दिसंबर को तेजपाल अपने दो दोस्तों, दीपक और कालू के साथ शराब पी रहा था। नशे की हालत में उसने डींगें मारनी शुरू कीं और उन्हें रूबी के बारे में सब कुछ बता दिया।
दीपक और कालू भी ट्रक ड्राइवर थे और उसी मानसिकता के थे। उन्होंने तेजपाल पर दबाव बनाया कि वे भी रूबी से मिलना चाहते हैं। तेजपाल पहले तो हिचकिचाया, लेकिन फिर उसने सोचा कि अगर उसने मना किया तो उसके दोस्त उसे पुलिस वाले पति से डराएंगे।
तेजपाल ने उसी समय रूबी को फोन किया और उसे गाँव से 15 किलोमीटर दूर एक होटल ‘कल्याण’ में बुलाया। रूबी पहले तो झिझकी, लेकिन तेजपाल की बातों में आकर वह घर से निकल गई। होटल के कमरे में पहुँचने पर उसे पता चला कि तेजपाल अकेले नहीं है, बल्कि उसके साथ उसके दो दोस्त भी हैं। रूबी ने विरोध किया, लेकिन तेजपाल ने उसे समझा-बुझाकर और थोड़ा डराकर मना लिया। उस रात उस होटल के कमरे में रूबी ने उन तीनों के साथ समय बिताया।
अध्याय 4: नया चेहरा, नई गलती
इंसान की इच्छाएं कभी शांत नहीं होतीं। रूबी का मन अब उन ट्रक ड्राइवरों से ऊबने लगा था। उसे कुछ ‘नया’ चाहिए था। 5 जनवरी 2026 की सुबह, जब रूबी अपने घर के बाहर काम कर रही थी, उसकी नजर सामने की एक दुकान पर पड़ी। वहाँ एक नई मोबाइल शॉप खुली थी। दुकान पर एक नौजवान और बेहद आकर्षक लड़का बैठा था, जिसका नाम रवि था।
रूबी ने रवि को देखते ही उसे अपने जाल में फंसाने की योजना बना ली। वह दुकान पर गई और रिचार्ज कराने के बहाने रवि से बात करने लगी। रूबी ने रवि को रिचार्ज के पैसे से दोगुने पैसे दिए। रवि ने जब टोकना चाहा, तो रूबी ने उसे अपनी बातों में उलझा लिया और उसे अपने घर आने का न्योता दे दिया।
उसी रात करीब 9 बजे, रवि रूबी के घर पहुँचा। रूबी ने उसे कमरे में बिठाया। लेकिन अभी उन्हें कुछ ही मिनट हुए थे कि घर के दरवाजे पर फिर से दस्तक हुई। रूबी को लगा कि शायद यशपाल आ गया है, वह घबरा गई। लेकिन जब उसने दरवाजा खोला, तो सामने तेजपाल, दीपक और कालू खड़े थे।
रूबी ने उन्हें भगाने की कोशिश की, “अभी मेरे पास वक्त नहीं है, तुम लोग जाओ यहाँ से!”
लेकिन तेजपाल ने उसे धक्का दिया और अंदर घुस गया। कमरे में रवि को देखकर तेजपाल आगबबूला हो गया। उसने रूबी पर चिल्लाते हुए कहा, “जब ये लड़का यहाँ आ सकता है, तो हम क्यों नहीं?” रूबी बेबस थी। उस रात उस घर में एक अजीब और वीभत्स स्थिति पैदा हो गई। तीनों ट्रक ड्राइवर और रवि, चारों रूबी के साथ कमरे में थे।
तभी एक अजीब घटना हुई। रूबी के शरीर पर एक छिपकली गिर गई और वह जोर-जोर से चीखने लगी। उन चारों ने मिलकर छिपकली को भगाया और फिर से अपनी हरकतों में मशगूल हो गए। लेकिन वे भूल गए थे कि पाप की उम्र कम होती है।
अध्याय 5: यमराज का आगमन
ठीक उसी समय, घर के मुख्य दरवाजे पर एक ऐसी दस्तक हुई जिसने सबकी रूह कपा दी। रूबी ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला। सामने साक्षात यमराज के रूप में यशपाल खड़ा था। वह पुलिस की वर्दी में था और शराब के नशे में धुत्त था।
यशपाल ने जैसे ही घर के अंदर का नजारा देखा, उसका नशा काफूर हो गया। उसने देखा कि चार गैर मर्द उसके घर में मौजूद हैं। जैसे ही उन चारों ने पुलिस वाले को देखा, उनके होश उड़ गए। तेजपाल, दीपक, कालू और रवि—यशपाल को धक्का देकर वहां से भागने में कामयाब हो गए। यशपाल उन्हें पकड़ नहीं पाया, लेकिन उसके अंदर का राक्षस जाग चुका था।
यशपाल ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। रूबी जमीन पर गिरकर गिड़गिड़ाने लगी, “मुझे माफ कर दो, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई!”
लेकिन यशपाल कुछ सुनने की स्थिति में नहीं था। उसने रूबी के बाल पकड़े और उसे घसीटते हुए कमरे में ले गया। उसने रूबी के हाथ-पैर रस्सियों से बांध दिए और उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि उसकी चीख बाहर न जा सके। यशपाल की आंखों में खून उतर आया था। उसे लगा कि रूबी ने न केवल उसे धोखा दिया है, बल्कि उसकी वर्दी और उसकी मर्दानगी का भी अपमान किया है।
यशपाल रसोई में गया। वह कोई हथियार ढूंढ रहा था। उसे वहां लाल मिर्च के पाउडर का एक डिब्बा मिला। वह उस डिब्बे को लेकर कमरे में आया और रूबी पर अत्याचार की सारी हदें पार कर दीं। उसने रूबी के संवेदनशील अंगों में वह लाल मिर्च भर दी। रूबी दर्द से तड़प रही थी, उसकी आंखें बाहर आ रही थीं, लेकिन मुंह बंद होने के कारण वह सिर्फ सिसक पा रही थी।
यशपाल का गुस्सा फिर भी शांत नहीं हुआ। वह दोबारा रसोई में गया और इस बार उसके हाथ में सब्जी काटने वाला चाकू था। वह कमरे में वापस आया और रूबी के पास बैठ गया। उसने रूबी की आंखों में देखा, जिनमें अब सिर्फ मौत का खौफ था। यशपाल ने एक ही झटके में चाकू रूबी के गले पर फेर दिया। खून का फव्वारा फूटा और रूबी का तड़पता हुआ शरीर कुछ ही पलों में शांत हो गया।
अध्याय 6: आत्मसमर्पण और न्याय का इंतजार
हत्या करने के बाद यशपाल के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था। उसने अपने कपड़े बदले और सीधा अपने ही पुलिस स्टेशन पहुँच गया। वहां मौजूद संतरी और बाकी पुलिस वाले उसे देखकर हैरान रह गए।
यशपाल ने मेज पर चाकू रखा और कहा, “मैंने अपनी पत्नी का कत्ल कर दिया है, मुझे गिरफ्तार कर लो।”
पुलिस तुरंत यशपाल के घर पहुँची। वहां का मंजर इतना खौफनाक था कि अनुभवी पुलिस वालों का भी जी घबरा गया। रूबी की लाश खून से लथपथ पड़ी थी। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा और यशपाल को सलाखों के पीछे डाल दिया।
पूछताछ के दौरान यशपाल ने अपना जुर्म कबूल करते हुए कहा, “उसने मेरे घर को कोठा बना दिया था। मेरी गैर-मौजूदगी में वह रोज नए मर्द बुलाती थी। एक पुलिस वाले की पत्नी होकर उसने मेरी नाक कटवा दी, इसलिए मैंने उसे खत्म कर दिया।”
पुलिस ने तेजपाल, दीपक, कालू और रवि की भी तलाश शुरू कर दी। यह घटना पूरे कानपुर में आग की तरह फैल गई। लोग यशपाल और रूबी, दोनों के चरित्र पर सवाल उठा रहे थे।
निष्कर्ष और नैतिक सवाल
आज यशपाल जेल की सलाखों के पीछे अपनी सजा का इंतजार कर रहा है। कानून अपना काम करेगा, लेकिन यह कहानी पीछे कई सवाल छोड़ गई है।
क्या यशपाल निर्दोष था? यशपाल खुद भ्रष्टाचार, शराब और पराई महिलाओं के चक्कर में था। क्या उसके अपने अनैतिक जीवन ने रूबी को इस रास्ते पर नहीं धकेला?
क्या रूबी की गलती की सजा मौत थी? रूबी ने गलत रास्ता चुना, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन क्या किसी को हक है कि वह खुद कानून अपने हाथ में लेकर इतनी क्रूरता से किसी की जान ले?
समाज की भूमिका: सरसोल जैसे गाँवों में जब एक औरत अकेली होती है, तो समाज उसे सहारा देने के बजाय तेजपाल जैसे भेड़ियों के सामने क्यों छोड़ देता है?
यह कहानी हमें सिखाती है कि ‘एक गलती दूसरी गलती को सही नहीं ठहरा सकती।’ रूबी का भटकाव गलत था, लेकिन यशपाल का कृत्य जघन्य अपराध था। अंत में, जीत नफरत की नहीं, बल्कि बर्बादी की हुई—एक घर उजड़ गया, एक मां मर गई, एक पिता जेल चला गया और मासूम बिट्टू का भविष्य अंधेरे में डूब गया।
जय हिंद, वंदे मातरम।
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