कुर्सी और घर के बीच
सर्दियों की हल्की धुंध अभी खेतों पर तैर ही रही थी। सूरज गेहूं की बालियों के पीछे से लाल गोले की तरह निकल रहा था। हाईवे पर ट्रकों की लंबी कतारें सुस्त रफ्तार से बढ़ रही थीं। तभी सन्नाटे को चीरती हुई लाल बत्ती वाली सफेद सरकारी गाड़ियों का काफिला सड़क पर दौड़ा।
बीच वाली एसयूवी में बैठे थे ज़िला मजिस्ट्रेट अभय प्रताप सिंह — सख्त चेहरा, सीधी रीढ़, और वैसी आंखें जिनमें भावनाओं से ज्यादा आदेश बसते थे। जिले में उनकी छवि “लोहे के डीएम” की थी। न सिफारिश सुनते, न दबाव मानते।
पर ईमानदारी के उस कवच के भीतर एक ठंडापन था, जिसने रिश्तों को धीरे-धीरे जमा दिया था।

एक अनचाहा पड़ाव
सुबह से कुछ खाया नहीं था। पेट में जलन उठी तो ड्राइवर ने हिम्मत करके कहा,
“सर आगे एक ढाबा है… पांच मिनट रुक लें?”
अभय ने पहले मना करना चाहा, फिर सिर हिला दिया।
काफिला एक छोटे से ढाबे पर रुका। टीन की छत, अधूरी दीवारें, बाहर खाटें। बोर्ड पर लिखा था —
“माँ अन्नपूर्णा ढाबा”
चूल्हे से धुआं उठ रहा था। बर्तनों की खनखनाहट, तंदूर की तपिश, और एक औरत की खांसी।
अभय की नजर यूं ही अंदर गई — और समय जैसे थम गया।
तंदूर के पास खड़ी औरत… सांवला चेहरा, माथे पर वही छोटा तिल, हाथों पर जले के निशान।
वो सिया थी।
उनकी पत्नी।
जिसे उन्होंने चार साल पहले पीछे छोड़ दिया था।
पहचान जो अनकही रही
सिया चाय लेकर आई।
“साहब, गर्म है… संभल के।”
बस इतना।
न पहचान, न हैरानी।
जैसे वो उन्हें जानती ही न हो।
पर अभय के भीतर तूफान उठ चुका था।
उन्हें याद आया—
वो रातें जब सिया लालटेन की रोशनी में उन्हें पढ़ते देखती
वो दिन जब उसने अपनी चूड़ियां बेचकर उनकी फीस भरी
वो वाक्य… जिसने सब तोड़ दिया
“मुझे बोझ मत बनो।”
उस दिन वो चुपचाप गांव लौट गई थी।
सिया की लड़ाई
गांव लौटकर उसने रोना नहीं चुना।
उसने काम चुना।
उधार लेकर टीन की छत डलवाई।
पुराना तंदूर खरीदा।
ढाबा शुरू किया।
धूप में जलना, बरसात में कीचड़, पुलिस की मुफ्तखोरी, नशेड़ियों की नजरें — सब झेला।
पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।
किस्मत का क्रूर मज़ाक
उसी समय अभय को ऑफिस से फोन आया।
“सर, आज अतिक्रमण हटाना है। लिस्ट के हिसाब से कार्रवाई शुरू हो गई है।”
नाम पढ़े जाने लगे।
और फिर…
“माँ अन्नपूर्णा ढाबा।”
अभय के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
फाइल मंगवाई।
नीचे उनके अपने हस्ताक्षर थे।
कल बुलडोजर यहीं आने वाला था।
यानी — वो खुद अपनी पत्नी का घर तोड़ने जा रहे थे।
एक रात का फैसला
उस दिन अभय लौट गए, पर दिल वहीं अटका रहा।
रात भर सो नहीं पाए।
सुबह 10 बजे बुलडोजर आना था।
और उन्हें तय करना था—
अफसर रहेंगे या इंसान बनेंगे।
सुबह का टकराव
अगली सुबह ढाबे के सामने भीड़ थी।
जेसीबी आ चुकी थी।
नोटिस पढ़ा गया।
सिया चुपचाप दरवाजे के सामने खड़ी हो गई।
जैसे अपनी देह से दीवार बना ली हो।
तभी सायरन गूंजा।
अभय की गाड़ी आकर रुकी।
वो उतरे।
थके हुए, मगर ठान चुके।
“कोई मशीन नहीं चलेगी।”
सब सन्न।
“जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होगी, कोई ढाबा नहीं टूटेगा।”
मीडिया आ गया। सवाल शुरू।
अभय ने साफ कहा—
“जहां लोग मेहनत से जी रहे हों, वहां बुलडोजर आखिरी विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।”
जेसीबी लौट गई।
पहली सच्ची माफी
भीड़ छंटी।
सन्नाटा रह गया।
अभय ने गिलास उठाकर धोए।
पहली बार “साहब” नहीं, इंसान लगे।
धीरे से बोले—
“मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया।”
सिया की आंखें नम हुईं।
“जो साल गए, वो लौटेंगे?”
अभय चुप।
“समय नहीं लौटा सकता… पर जो बचा है, उसे ठीक करना चाहता हूं।”
नया रास्ता
अभय ने महिला स्वयं सहायता समूह बनवाया।
लाइसेंस दिलवाया।
लोन मंजूर कराया।
नया बोर्ड लगा —
“सिया महिला समूह ढाबा”
गांव की औरतें जुड़ गईं।
ढाबा मजबूरी से ताकत बन गया।
रिश्ते की मरम्मत
शाम को दोनों खाट पर बैठे।
अभय बोले,
“अगर कहो… तो फिर से कोशिश करना चाहता हूं। बराबरी से।”
सिया ने लंबी सांस ली।
“माफी आसान नहीं… पर नफरत ढोना उससे भी मुश्किल है।
वादा नहीं… कोशिश कर सकती हूं।”
अभय ने उसका हाथ थामा — पूछते हुए।
सिया ने हटाया नहीं।
बस हल्का सा दबा दिया।
अंत जो शुरुआत बना
लाल बत्ती वाली गाड़ी खड़ी थी,
पर आज उसमें डीएम नहीं बैठा था।
एक पति बैठा था —
जो देर से सही, घर लौट आया था।
ढाबे की रोशनी में उनकी परछाइयां साथ पड़ रही थीं।
और जिंदगी ने धीरे से कहा—
कभी-कभी सबसे बड़ी जीत कुर्सी बचाने में नहीं,
किसी का हाथ पकड़कर साथ चलने में होती है।
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