“एक साधारण महिला को नज़रअंदाज़ किया गया… सच्चाई सामने आते ही सब हैरान रह गए”

सम्मान का पाठ – शोभा दत्त मेमोरियल स्कूल की सच्ची परीक्षा
भूमिका
शहर के बीचों-बीच बना रॉयल हेरिटेज इंटरनेशनल स्कूल दूर से ही अपनी भव्यता और आधुनिकता से सबका ध्यान खींचता है। ऊँची दीवारें, चमचमाते काँच, लॉन में खेलते बच्चे, और गेट पर तैनात सिक्योरिटी – सबकुछ किसी महल जैसा लगता है। मगर एक दिन, इसी स्कूल के गेट पर पहुंची एक साधारण सी बुजुर्ग महिला, जिसने न सिर्फ उस स्कूल बल्कि पूरे समाज को आईना दिखा दिया।
गेट पर इंतजार
सुबह के करीब 11 बजे होंगे। मोहना देवी, सिर पर पुरानी साड़ी का पल्लू, हाथ में फटा-पुराना झोला, थकी चाल के साथ स्कूल के गेट की ओर बढ़ रही थीं। गेट पर खड़े गार्ड ने उन्हें आते ही रोक लिया –
“दीदी, आप यहां क्या करने आई हैं? क्या काम है?”
मोहना देवी ने विनम्रता से जवाब दिया, “बेटा, मैं प्रिंसिपल सर से मिलने आई हूं। बहुत जरूरी बात है।”
गार्ड ने शक भरी नजर से देखा, “अपॉइंटमेंट है?”
“नहीं बेटा, सीधा चली आई।”
“तो मिलना नहीं होगा दीदी। यहां सब अपॉइंटमेंट लेकर आते हैं। बाहर इंतजार कीजिए। हट जाइए, तंग मत कीजिए।”
मोहना देवी ने फिर भी अंदर घुसने की कोशिश की तो दूसरा गार्ड और सख्ती से खड़ा हो गया –
“ऐसे गुस्सा नहीं जाता, समझी? आज नहीं होगा, अपॉइंटमेंट के बिना।”
पास खड़े पेरेंट्स में से एक बोला, “दान मांगने आई होगी! ₹10 देकर भगा दो, वरना सारा दिन यहीं चिपकी रहेगी।”
मोहना देवी ने सिर झुकाकर कहा, “नहीं बाबा, मैं कुछ नहीं मांग रही। बस एक बात कहनी है।”
मगर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। उन्हें गेट पर ही खड़ा रखा गया। आधे घंटे बाद वहां से गुजरते शिक्षक विकास रॉय ने दया दिखाई –
“चलो दीदी, अंदर आ जाओ। धूप में तकलीफ हो रही होगी।”
भीतर का माहौल
स्कूल के अंदर कदम रखते ही मोहना देवी के सामने स्कूल का घमंड अपनी पूरी ऊँचाई पर था – दीवारों पर बड़े-बड़े स्पॉन्सर्स बोर्ड, ट्रॉफियां, महंगा डेकोर। रिसेप्शन पर बैठी निशा ने उन्हें देखा और बोली –
“जी, आप किससे मिलना चाहती हैं?”
“मैं प्रिंसिपल से मिलना चाहती हूं।”
“ठीक है दीदी, इसमें थोड़ा टाइम लगेगा। वेटिंग एरिया में जाकर बैठ जाइए।”
मोहना देवी कोने की कुर्सी पर बैठ गईं। आसपास के लोग उन्हें अजीब नजरों से घूर रहे थे। कोई फुसफुसाया –
“भिक्षा मांगने के लिए अंदर आ गई है। उधर मत जाना, वरना भिक्षा देनी पड़ेगी।”
दूसरा बोला, “अरे यार, ऐसे भिखारियों की वजह से घर से निकलना मुश्किल हो गया है। भिक्षा देते-देते हम भी भिखारी बन जाएंगे।”
मोहना देवी सब सुन रही थीं, मगर चुप थीं।
एक छोटी बच्ची अपनी मां से बोली, “मम्मी, ये दीदी यहां क्यों बैठी हैं? इनकी तो क्लास भी नहीं है।”
मां ने समझाया, “बेटा, यही किस्मत का लिखा है। शायद कोई भिक्षा नहीं देता, इसलिए स्कूल में आ गई। भाग्य नहीं देता तो सबको ऐसे अपमान सहने पड़ते हैं। जा, ₹10 देकर आ।”
बच्ची 10 का नोट लेकर दौड़ी। मोहना देवी के आगे खड़ी होकर बोली, “लीजिए दीदी, ₹10। कुछ खा लीजिएगा।”
मोहना देवी ने मुस्कुराकर उसका सिर सहलाया, “नहीं बेटी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। तुम अच्छे से पढ़ाई करो। जाओ।”
इंतजार और अपमान
घड़ी की सुइयां सरकती रहीं। एक घंटा बीत गया। मोहना देवी बार-बार रिसेप्शन की तरफ देखती रहीं। आखिरकार उठकर निशा के पास गईं –
“बेटी, अगर तुम बिजी हो तो प्रिंसिपल को बुलाओ या मुझे मिलने का इंतजाम कर दो। बहुत जरूरी है।”
निशा झल्लाकर बोली, “ओह माय गॉड! अब प्रिंसिपल को भी बुलाना पड़ेगा? आप कौन हैं जो आपके फालतू बात के लिए सर दौड़े चले आएंगे? अभी बाहर निकलो, वरना सिक्योरिटी बुलाऊंगी!”
मोहना देवी फिर उसी कुर्सी पर बैठ गईं।
सीसीटीवी पर प्रिंसिपल अरिंदम रॉय ने सब देख लिया। गुस्से में रिसेप्शन पर कॉल किया –
“मैं घंटों से देख रहा हूं, ये बुढ़िया यहां घूम रही है। आप लोग कर क्या रहे हो? ड्यूटी कर रहे हो या नहीं? अभी निकालो बाहर, कोई भी VIP आया तो स्कूल का मान-मर्यादा मिट्टी में मिल जाएगा!”
गरीब का दर्द
इसी बीच एक गरीब पिता अपनी बेटी को एडमिशन कराने आया। छोटी बच्ची के हाथ में पुराने सर्टिफिकेट थे।
निशा ने ठंडी आवाज में कहा, “सॉरी, हम गरीब कोटा नहीं रखते। फ्री सीट के लिए रिकमेंडेशन लेटर चाहिए।”
पिता ने गिड़गिड़ाया, “मैडम, मैं मजदूर हूं, बच्ची बहुत होशियार है।”
“दुख होता है, पर रिकमेंडेशन के बिना एडमिशन नहीं।”
बच्ची रो पड़ी। पिता उसका हाथ पकड़कर चला गया।
मोहना देवी की आंखें नम हो गईं। मन ही मन बुदबुदाईं –
“जो स्कूल मैंने सपनों से बनाया था, वहां अब सिर्फ पैसों का राज है।”
शिक्षा का बाजार
थोड़ी देर बाद दो टीचर्स कॉफी लिए बैठे थे –
“आज क्लास नहीं जाएंगे, रोहन सर के साथ पार्टी है।”
“नो प्रॉब्लम, अटेंडेंस तो लग ही जाएगी।”
दूसरे कोने में दो स्टाफ नोटों की गड्डियां गिन रहे थे –
“नया एडमिशन फाइल 500 में क्लियर किया। बाप बड़ा आदमी है, कमीशन बांट लो।”
मोहना देवी सब सुन रही थीं – चेहरा शांत, आंखों में आग।
सच्चाई का सामना
दोपहर में मोहना देवी फिर निशा के पास गईं –
“बेटी, अब तो प्रिंसिपल से मिलवा दो।”
निशा चिढ़कर बोली, “दीदी, मैंने कहा ना, सर मीटिंग में हैं।”
पास खड़े पेरेंट्स हंस पड़े –
“आप जैसे लोग नामी स्कूल में आकर भिक्षा मांगते हैं।”
मोहना देवी ने शांत स्वर में कहा –
“मैं भिक्षा मांगने नहीं, देखने आई हूं… शिक्षा का सम्मान कहां खो गया।”
असली पहचान
तभी प्रिंसिपल अरिंदम रॉय बाहर निकले –
सनग्लास, महंगा परफ्यूम, पीछे असिस्टेंट निशा दौड़ी –
“सर, सुबह से वह बुढ़िया बैठी है, आपने सीसीटीवी में देखा ना?”
अरिंदम ने ठंडे लहजे में कहा, “ठीक है, अभी भेजो। देखते हैं क्या चाहिए।”
मोहना देवी धीरे-धीरे अंदर गईं –
“जी, आप?”
“मैं इस स्कूल का कामकाज देखने आई हूं।”
अरिंदम हंसे, “क्या आप इंस्पेक्टर हैं? यह प्राइवेट स्कूल है, बाहर वाले चेक नहीं कर सकते।”
“मुझे पता है, सर। पर यह स्कूल मुझे बहुत प्यारा है।”
“ओह, दानवीर हैं क्या?”
“दानवीर नहीं, इस स्कूल की मालकिन।”
अरिंदम चौक गए – “क्या कहा?”
मोहना देवी ने शांत स्वर में कहा –
“मैं शोभा दत्त, इस स्कूल की फाउंडर और असली ओनर हूं। मैं छद्म वेश में आई थी देखने कि शिक्षा के मंदिर में इंसानियत बाकी है या नहीं।”
पूरे ऑफिस में सन्नाटा छा गया। अरिंदम का चेहरा सफेद पड़ गया।
सच्चाई का खुलासा
शोभा देवी ने झोले से कागज निकाले –
“यह मेरा दान पत्र, यह मेरा सिग्नेचर। मैंने सरकारी अप्रूवल लेकर जमीन दी थी। शर्त थी – गरीब बच्चे फ्री पढ़ेंगे। पर आज मैंने देखा, यहां घूंस से एडमिशन, टीचर्स क्लास छोड़कर पार्टी, रिसेप्शन पर इंसानों का अपमान।”
पास में मीना मैम खड़ी हो गईं –
“मैडम, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। हम भी देखते हैं, पर बोल नहीं पाते।”
शोभा देवी ने फोन मिलाया। मिनट भर में दो सरकारी अफसर अंदर आए –
“हम एजुकेशन डिपार्टमेंट से हैं। इस संस्थान के खिलाफ शिकायत की जांच होगी।”
अरिंदम, निशा और दो टीचर्स तुरंत सस्पेंड कर दिए गए। हाथ पकड़कर बाहर ले जाए गए।
सम्मान का पाठ
शोभा देवी माइक थामकर मंच पर खड़ी हुईं –
“यह स्कूल मैंने शिक्षा के लिए बनाया था, अहंकार के लिए नहीं। आज से इस स्कूल में किसी गरीब बच्चे को लौटाया नहीं जाएगा। शिक्षा का मंदिर सबके लिए है, सिर्फ पैसे वालों के लिए नहीं।”
छात्र, टीचर्स, पेरेंट्स – तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा।
कुछ दिन बाद स्कूल के बाहर नया बोर्ड लगा –
शोभा दत्त मेमोरियल स्कूल – ए टेंपल ऑफ ट्रू एजुकेशन
छोटी अर्पिता दौड़कर आई –
“दीदी, अब आप हमारी प्रिंसिपल बनेंगी?”
शोभा देवी ने मुस्कुराकर कहा –
“नहीं बेटी, मैं तो बस एक स्टूडेंट हूं, जो अभी भी सीख रही हूं। जब तक सम्मान देना नहीं आता, तब तक इंसान कहलाने लायक नहीं बनते।”
समापन
हवा में गूंज उठी उनकी आखिरी पंक्ति –
“जिस समाज में सम्मान का पाठ खत्म हो जाए, वहां शिक्षा सिर्फ किताबों की आवाज बनकर रह जाती है। सीखो चेहरा नहीं, चरित्र देखकर इंसान पहचानो। क्योंकि शिक्षा की असली शुरुआत वहीं से होती है।”
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जय हिंद।
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