बकरी चराने गई महिला के साथ ससुर ने कर दिया कारनामा/गांव के लोग और पुलिस सभी हैरान हो गए/
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“खूनी खेत: रूबी, उसके ससुर और न्याय की आख़िरी रात”
1. छज्जूपुर का गड़रिया
उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में एक छोटा-सा गांव था – छज्जूपुर। मिट्टी की गलियां, कच्चे घर, खेतों के बीच से गुजरती पगडंडियां, दूर कहीं बकरियों की टनटनाती घंटियां – यह गांव का रोज़ का नज़ारा था।
इसी गांव में रहता था चंद्र सिंह – पेशे से गड़रिया।
चंद्र के पास अपनी लगभग बीस-पच्चीस बकरियां थीं। रोज सुबह करीब आठ बजे, वह लाठी कंधे पर रखकर, बकरियों के झुंड को हांकता हुआ गांव से बाहर खेतों की तरफ निकल जाता। बकरियां कभी गेहूं के खेत की मेड़ पर, कभी सूखी घास के गट्ठों के पास चरतीं, और चंद्र पूरे दिन इधर-उधर घूमता रहता। शाम करीब चार बजे बकरियों के साथ वापस गांव लौटना उसकी रोज़ की दिनचर्या थी।
दूर से कोई देखता तो कहता –
“कितना मेहनती आदमी है, सुबह से शाम तक मैदानों में भटकता रहता है।”
लेकिन असली सच कुछ और ही था।
चंद्र जो भी पैसा बकरियों से कमाता, उसे शराब और औरतों पर उड़ा देता। गांव में साफ़ कहा जाता था –
“चंद्र नाड़े का ढीला आदमी है, जहां पैसा दिखा या औरत दिखी, वहां फिसल जाता है।”
उसके अंदर न तो जिम्मेदारी का एहसास था, न परिवार के लिए कोई सोच। जो कमाता, वही बहा देता।
2. बेटा जतिन और बहू रूबी
चंद्र के परिवार में उसकी पत्नी नहीं थी, वह सालों पहले गुजर चुकी थी। घर में एक ही बेटा था – जतिन। गांव वाले कहते थे – “बाप जैसा, वैसा बेटा।”
जतिन भी अपने पिता के नक्शे-कदम पर चल पड़ा था। न पढ़ाई, न काम-धंधा। दिनभर दोस्तों के साथ आवारागर्दी, कभी ताश, कभी सिगरेट, कभी इधर-उधर खाली घूमना।
चंद्र ने समाज के ताने सुनते-सुनते दो साल पहले जतिन की शादी कर दी थी। दुल्हन आई – रूबी।
रूबी एक गरीब परिवार की, लेकिन संस्कारी और मेहनती लड़की थी। सांवला चेहरा, सीधी मांग में सिन्दूर, बड़ी-बड़ी आंखों में सपने और थोड़ी-सी मासूम झिझक। वह सुबह से शाम तक घर के काम में जुट जाती – खाना बनाना, झाड़ू-पोंछा, पानी भरना, कपड़े धोना, गाय-बकरियों को चारा देना।
लेकिन घर का हाल कुछ और ही था।
न पति कमाता था, न ससुर कोई पैसा घर में टिकने देता था। धीरे-धीरे गरीबी ने घर का दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया। रसोई में आटा कम, सब्ज़ी कम, तेल कम, उधार ज़्यादा।
एक दिन रूबी ने परेशान होकर जतिन से कहा –
“सुनो जी, अगर आप कोई काम-धंधा नहीं करोगे तो एक दिन हमें भीख मांगकर गुज़ारा करना पड़ेगा। घर में खर्चा कैसे चल रहा है, आपको पता भी है?”
जतिन ने मुंह फेरकर कहा –
“बस-बस, कान मत खाओ। अभी तो ज़िंदगी पड़ी है, कर लूंगा कुछ।”
रूबी की बात एक कान से सुनकर वह दूसरे से निकाल देता।
थक-हारकर रूबी ने ससुर चंद्र से शिकायत की –
“पिताजी, आप ही जतिन को कुछ समझाइए। घर का गुज़ारा मुश्किल में है। आप भी शराब में सब उड़ा देते हो, वो भी कुछ कमाता नहीं। कब तक यूं चल पाएगा?”
चंद्र को पहली बार लगा कि बात हाथ से निकल रही है। उस शाम उसने जतिन को बुलाया।
3. फैक्ट्री वाली रातों की नौकरी
शाम का वक्त था। चंद्र चौपाल पर बैठा बीड़ी पी रहा था। उसने जतिन को आवाज़ दी –
“ओ जतिन, इधर आ।”
जतिन आया, हाथ जेब में, आंखें इधर-उधर।
“देख बेटा, अब मैं बूढ़ा हो रहा हूं। तू कोई काम-धंधा शुरू कर दे, नहीं तो मैं तुझे घर-परिवार से अलग कर दूंगा।”
जतिन ने थोड़ी देर चुप रहकर बोला –
“ठीक है पिताजी, मैंने एक काम ढूंढ लिया है।”
चंद्र चौंक गया –
“कौन सा काम?”
“मैं फैक्ट्री में रात की नौकरी करूँगा। बात हो गई है। आज रात आठ बजे से ही ज्वाइन कर रहा हूं। रात के बारह घंटे काम करूंगा, सुबह आठ बजे तक घर वापस आ जाया करूंगा।”
रूबी यह सुनकर बहुत खुश हुई।
“चलो, अब पति कुछ कमाएगा, घर में इज्जत भी बढ़ेगी, मजबूरी भी कम होगी।”
उसे क्या पता था कि इसी नौकरी के बहाने उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी उसके घर के अंदर ही पनपने वाली है।
अब रोज़ रात आठ बजे जतिन फैक्ट्री चला जाता, सुबह आठ बजे लौटता। दिन में थका-हारा सो जाता, शाम को थोड़ा उठकर खा-पीकर फिर रात के लिए निकल जाता।
रूबी अब रातों में अकेली रहने लगी।
4. ससुर का डर, पति का भरोसा
रात का सन्नाटा, सुनसान घर, बाहर कुत्तों का भौंकना, कभी दूर से आती ट्रेन की सीटी – इन सबके बीच रूबी को कभी-कभी डर लगने लगा। सबसे बड़ा डर था – ससुर चंद्र का।
वो अक्सर नशे में देर रात घर आता, लड़खड़ाकर अंदर घुसता, कुछ बड़बड़ाता, फिर किसी कोने में गिरकर सो जाता।
रूबी ने एक दिन जतिन से कहा –
“सुनो, मुझे आपके पिताजी से डर लगता है। शराब पीकर रात में घर आते हैं, कहीं कल को मेरे साथ ऊंच-नीच न कर दें।”
जतिन हंस पड़ा –
“अरे पगली, वो लाख शराबी हो, पर तुझे कुछ नहीं कहेंगे। तू बेकार डरती है, मेरा बाप ऐसा नहीं है।”
रूबी ने फिर कोशिश की, कई बार दोहराया, लेकिन जतिन हर बार टाल जाता।
उसे क्या पता, एक दिन उसका यही डर हक़ीक़त बन जाएगा।
5. 20 अक्टूबर 2025 – खेत और एक हैवान की नीयत
समय बीतता गया। एक दिन तारीख आई – 20 अक्टूबर 2025।
सुबह करीब सात बजे का समय था। घर के आंगन में धूप झांक रही थी। रूबी चूल्हे पर रोटी सेंक रही थी, चंद्र बाहर बैठा बीड़ी के कश ले रहा था।
उसकी नज़र अचानक बहू की तरफ उठी। आज शायद उसने पहली बार बहू को बहू की नज़र से नहीं, एक औरत की नज़र से देखा। रूबी की सादगी, उसका जवान शरीर, काम में झुकी हुई कमर – सब कुछ चंद्र की गंदी नज़र में समाने लगा।
उसके भीतर का जानवर जाग उठा।
“बहू को… किसी न किसी तरीके से हासिल करना ही है।”
दिल में ख्याल आने लगे, नीयत बिगड़ गई।
थोड़ी देर बाद वह खांसने का नाटक करते हुए बोला –
“रूबी, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है। आज मैं बकरियां चराने नहीं जा पाऊंगा। तू बकरियां लेकर खेतों में चली जा।”
रूबी ने चिंता से पूछा –
“क्या हुआ पिताजी? तबीयत इतनी खराब है क्या?”
“हां-हां, बस थकान है। तू संभाल लेगी। आज तू ही बकरियां ले जा।”
रूबी सोचने लगी – घर का काम भी, बकरियां भी, पर मजबूरी थी। तभी उसी समय फैक्ट्री से रातभर काम करके जतिन घर लौट आया।
रूबी ने जतिन को बताया –
“आज पिताजी की तबीयत खराब है। मुझे बकरियां चराने जाना होगा।”
जतिन ने अध-नींद में आंखें मलते हुए कहा –
“ठीक है, बकरियां तो तू ही ले जाएगी, पर पिताजी को भी साथ ले जा। उनकी तबीयत इतनी भी खराब नहीं कि तेरा ध्यान ना रख सकें।”
रूबी ने कुछ कहना चाहा, लेकिन जतिन की बात मान ली।
उधर चंद्र के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान फैल गई –
“आज तो दोनों का साथ खेतों में तय हो गया… बस यही मौका चाहिए था।”
6. खेत, सुनसान मेड़ें और टूटी हुई इज्जत
सुबह करीब नौ बजे, रूबी और चंद्र बकरियों के साथ गांव से बाहर निकल गए। गांव की आवाज़ें पीछे छूट गईं। खेतों के बीच कच्ची पगडंडियां, चारों ओर फैले हरे-पीले खेत, कहीं-कहीं आम के पेड़, और बीच-बीच में सन्नाटा।
कुछ दूर जाकर बकरियां एक जगह चरने लगीं। रूबी दूर खड़ी होकर निगरानी कर रही थी। चंद्र उसे टकटकी लगाकर देखने लगा – अब किसी के आने-जाने का डर भी नहीं था।
उसके दिमाग में अजीब-अजीब ख्याल आने लगे।
वह बहू के पास आया। जेब से कुछ नोट निकाले – दो-चार, शायद दस-दस और बीस-बीस के।
“रूबी, ये पैसे रख ले।”
रूबी ने चौंककर कहा –
“पिताजी, मुझे पैसों की ज़रूरत नहीं है।”
चंद्र अब साफ़ शब्दों में बोला –
“ये पैसे यूं ही नहीं दे रहा। इसके बदले में मैं तुझसे… कुछ लेना चाहता हूं।”
रूबी ने उसकी आंखों में देखा और एक ही पल में समझ गई – उसके ससुर की नीयत उसके शरीर पर है।
वह पीछे हटने लगी –
“पिताजी, होश में रहिए। मैं आपकी बहू हूं।”
लेकिन इससे पहले कि वह कुछ और बोल पाती, चंद्र ने झपटकर उसका हाथ पकड़ लिया। दूसरे हाथ से उसका मुंह दबा दिया ताकि वो चिल्ला न सके।
रूबी ने छटपटाने की कोशिश की, पर खेतों में दूर-दूर तक कोई नहीं था। चंद्र ने उसकी चुन्नी उतारी, उसी से उसके हाथ-पैर कसकर बांध दिए। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, गालों पर लकीरें बनती जा रही थीं।
चंद्र के दिमाग पर दरिंदगी का परदा पड़ चुका था।
उसने बहू रूबी के अस्तित्व, उसकी इज्जत, उसके रिश्ते की पवित्रता – सबको कुचल डाला।
रूबी का विरोध, उसकी सिसकियां, उसका रोना – सब बेकार।
उस दिन उस सुनसान खेत में, एक ससुर ने अपनी बहू के साथ ऐसा अपराध किया, जिसकी दर्दनाक गूंज रूबी के मन में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।
काम खत्म होने के बाद, चंद्र ने उसे छोड़ दिया, कुछ देर धमकाया –
“अगर तूने ये बात किसी को बताई, खासकर मेरे बेटे जतिन को, तो मैं तुझे उससे तलाक दिलवा दूंगा। तेरी कहीं इज्जत नहीं रहेगी।”
तलाक का शब्द सुनते ही रूबी डर गई। गरीब घर की लड़की, मायके में भी मजबूरी, ससुराल में भी।
“अगर तलाक हो गया, तो कहां जाऊंगी? कौन अपनाएगा?”
वह चुप हो गई। उसके मौन ने चंद्र को और हिम्मत दी।
7. एक महीना – रोज़ का डर, रोज़ की चुप्पी
उस दिन के बाद रूबी जैसे भीतर से मर गई। वह पहले की तरह काम करती, खिलाती-पिलाती, मगर उसकी आंखों की चमक बुझ चुकी थी। मुखौटे के पीछे दर्द था, जो सिर्फ वही जानती थी।
चंद्र अब मौका मिलने पर, जब भी अकेलापन पाता, रूबी के साथ जबर्दस्ती करने लगा। कभी धमकी, कभी गंदी बातें, कभी पैसे का लालच।
रूबी सोचती –
“काश, मैंने पहली बार ही सब बता दिया होता…”
लेकिन अब उसे लगता, बहुत देर हो चुकी है।
करीब एक महीने तक वह चुपचाप सब सहती रही। पति जतिन से कहने की कोशिश भी की, पर जुबान साथ न देती।
8. जमींदार करण सिंह की नज़र
समय बढ़ता गया। फिर तारीख आई – 22 नवंबर 2025। सुबह साढ़े पांच बजे का समय था।
रूबी ने पूजा की थाली सजाई, माथे पर बिंदी, हाथों में चूड़ियां, सिर पर पल्लू डालकर गांव के मंदिर की तरफ निकल पड़ी। रास्ते में गांव के जमींदार करण सिंह की बड़ी-सी बैठक पड़ती थी।
करण सिंह गांव का रौबदार आदमी था – जमीनें, नौकर, पैसा, रसूख़ – सब कुछ था। मगर उसके अंदर भी एक गंदगी थी – औरतों के लिए गलत नज़र।
उसने बैठक से बाहर झांककर देखा – रूबी मंदिर की तरफ जा रही है। साधारण कपड़े, पर चेहरे पर अजीब-सी मासूम सुंदरता, आंखों में बहुत-सा दर्द, जो उसे नहीं दिखा, सिर्फ उसका शरीर ही उसे नज़र आया।
करण के अंदर ख्वाहिश जाग उठी –
“जतिन की बीवी… बहुत खूबसूरत है। इसे हासिल करना होगा।”
वह चुपचाप उसका पीछा करने लगा। रूबी मंदिर पहुंची, पूजा-अर्चना की, भगवान के आगे हाथ जोड़े –
“हे भगवान, मेरी तकलीफें खत्म कर दो…”
वापस निकली तो मंदिर के बाहर करण खड़ा था। उसने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया।
“रूबी…”
रूबी ने झटके से हाथ छुड़ाया –
“आप ये क्या कर रहे हैं? मैं सुहागन औरत हूं, आप जमींदार हो, डर-भगवान का होना चाहिए आपको।”
करण मुस्कराया –
“अगर मैं तुझे कुछ पैसे दूं, तो क्या तू मान जाएगी?”
रूबी ने घृणा से उसकी तरफ देखा, कुछ बोले बिना तेज़ कदमों से वहां से निकल गई।
करण वहीं खड़ा रहा, पर उसकी हिम्मत कम नहीं हुई।
“ये नहीं मान रही, पर मैं इसे किसी न किसी दिन झुका कर रहूंगा।”
9. शराब, साजिश और पहली बेचने की डील
उधर शाम को चंद्र अपनी बकरियां चराकर लौट रहा था। रास्ते में करण की बैठक दिखाई दी। करण ने उसे देखा और पुकारा –
“ओ चंद्र! ज़रा उधर आओ, आज बैठकर शराब पीते हैं।”
शराब का नाम सुनते ही चंद्र के कान खड़े हो गए।
“बस अभी बकरियां बांधकर आता हूं।”
वह घर गया, बकरियां बांधी, और रात साढ़े सात बजे के आस-पास करण की बैठक में पहुंच गया। वहां पहले से अच्छी शराब की बोतलें रखी थीं।
दोनों बैठ गए, गिलास भरे, गटागट पीना शुरू कर दिया। नशा चढ़ने लगा।
नशे में करण ने बात घुमाकर असली मुद्दे पर लानी शुरू की –
“चंद्र, तुम्हारे घर में एक बहुत खूबसूरत महिला है… तुम्हारी बहू। मैं उसके साथ थोड़ा समय बिताना चाहता हूं।”
चंद्र पहले खामोश रहा। उसके मन में कुछ पुरानी बात भी कौंधी – कि वो खुद क्या कर चुका है।
करण ने उसे उसकी कमजोर नस पर पकड़ लिया –
“मैं तुम्हें इसके बदले सौ रुपये दूंगा।”
सौ रुपये सुनते ही चंद्र के भीतर का लालची आदमी जाग उठा।
“सौ रुपये? सौ रुपयों के लिए तो मैं कुछ भी कर सकता हूं।”
धीरे-धीरे करण ने उसे मना लिया। चंद्र ने कहा –
“ठीक है, आज रात मेरा बेटा जतिन फैक्ट्री चला जाएगा। उसके बाद तुम मेरे घर आ सकते हो। पूरी रात मेरी बहू तुम्हारे हवाले।”
करण के चेहरे पर वहशी मुस्कान फैल गई।
देर रात करीब साढ़े नौ बजे वे दोनों चुपचाप बैठक से निकले। पौने दस बजे वे चंद्र के घर पहुंचे। दरवाजे पर दस्तक दी।
रूबी ने दरवाज़ा खोला तो देखा – सामने नशे में डूबा ससुर, साथ में गांव का जमींदार करण सिंह।
रूबी तुरंत दरवाज़ा बंद करने लगी –
“आप लोग इस समय? अंदर आने की ज़रूरत नहीं है।”
लेकिन चंद्र ने जोर से धक्का दिया, दरवाज़ा खुल गया। दोनों घर के अंदर घुस आए, दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।
आगे जो हुआ, वो किसी भी इंसान के लिए सुनना भी भारी है।
चंद्र ने अपनी बहू के साथ वही किया, जो वो खेतों में कर चुका था – उसके मुंह पर कपड़ा बांधा, हाथ-पैर बांधे, और इस बार करण भी उसके साथ था। दोनों ने मिलकर रूबी की इज्जत को रौंद डाला।
काम खत्म होने के बाद, फिर धमकी –
“अगर तूने किसी को बताया, तो तलाक दिलवाऊंगा, तुझे घर से बाहर फेंक दूंगा।”
उस रात चंद्र ने करण से ₹10,000 लिए। दोनों सुबह होने से पहले बैठक में लौटे, शराब पी और वहीं सो गए।
10. रोज़ का नरक – और रूबी की चुप्पी
अब यह सिलसिला बार-बार होने लगा। जब भी मौका मिलता, चंद्र और करण रात में शराब पीकर, नशे में धुत्त होकर रूबी के घर आते, दरवाजा बंद करके उसके साथ जबर्दस्ती करते। जतिन रात में फैक्ट्री में होता, उसे कुछ पता ही नहीं।
रूबी बार-बार सोचती –
“क्या मैं गलत हूं कि चुप हूं? या गलती मेरी नहीं, इन दरिंदों की है?”
पर हर बार तलाक का डर, समाज का डर, घर से निकाले जाने का डर उसे पकड़ लेता।
उसने कोशिश की, संकेतों में ही सही, जतिन को बताने की –
“कुछ ठीक नहीं है… घर में…”
पर जतिन हमेशा कहता –
“मैं बहुत थक जाता हूं, फैक्ट्री का काम है, मुझे परेशान मत करो ऐसी बातों से।”
रूबी की हालत दिन-ब-दिन बद्तर होती जा रही थी।
11. सब कुछ बेचकर भी नशे का भूखा
समय बीतता गया। 12 दिसंबर 2025 की सुबह आई। चंद्र ने तब तक अपना बहुत कुछ बर्बाद कर दिया था।
उसने अपनी सभी बकरियां बेच दीं। जो पैसे आए, वह भी शराब, जुआ, और गलत रास्तों में उड़ गए। अब उसकी जेब खाली थी, पेट में शराब की तलब और दिमाग में वही पुरानी हवस।
शाम को उसने सोचा –
“किसी से उधार लेना पड़ेगा, वरना आज शराब नहीं मिलेगी।”
वह गांव के सरपंच दिलबाग के पास गया। दिलबाग भी औरतों के मामले में ढीली नीयत वाला आदमी था। बैठक में बैठकर, तंबाकू थूकते हुए बैठा था।
चंद्र बोला –
“दिलबाग, मुझे हज़ार रुपये की सख्त ज़रूरत है।”
दिलबाग ने कहा –
“मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
चंद्र ने आंखें घुमाकर कहा –
“मैं तुम्हें एक ऐसी चीज दे सकता हूं, जिसके लिए तुम दिन-रात तरसते हो।”
दिलबाग चौंका –
“क्या?”
चंद्र ने धीमे से मुस्कुराकर कहा –
“मेरे घर में एक कोहिनूर हीरा है – मेरी बहू रूबी।”
दिलबाग की आंखों में चमक आ गई।
“अगर मैं तुम्हारी बहू के साथ एक रात गुज़ार लूं, तो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा।”
चंद्र बोला –
“पहले मुझे हज़ार रुपये दे दो, फिर तुम्हारी रात मेरी बहू के साथ।”
दिलबाग ने हज़ार रुपये दे दिए। उसने पूछा –
“कब आऊं?”
“रात आठ बजे के बाद। तब तक मेरा बेटा जतिन फैक्ट्री चला जाएगा।”
साजिश तैयार हो चुकी थी। चंद्र पैसे लेकर शराब के ठेके पर गया, बोतल लाया, कहीं एकांत जगह बैठकर पी, नशे में धुत हो गया।
रात साढ़े नौ बजे वह दिलबाग के पास लौटा –
“चलो, अब घर की तरफ।”
12. आख़िरी रात – जब रूबी ने सब सहन कर लिया
घने अंधेरे में चंद्र और दिलबाग, दोनों चुपचाप रूबी के घर की तरफ बढ़े। गांव की पगडंडियां, कुत्तों का भौंकना, कहीं-कहीं से आती रोशनी, और इनके दिलों में छुपा हुआ जानवर।
उन्होंने दरवाज़े पर दस्तक दी।
रूबी ने दरवाज़ा खोला – सामने नशे में धुत्त ससुर चंद्र और सरपंच दिलबाग।
उसका कलेजा कांप गया।
“आज फिर कोई नई आफत…”
वह दरवाज़ा बंद करने लगी, पर चंद्र ने फिर वही किया – ज़बरदस्ती धक्का देकर अंदर घुस गया, दिलबाग के साथ। दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया गया।
रूबी को घसीटकर अंदर कमरे में ले जाया गया, हाथ-पांव बांध दिए गए। और एक बार फिर वही घिनौना, अमानवीय अत्याचार शुरू हो गया – अबकी बार पिता-ससुर और गांव का सरपंच, दोनों मिलकर।
इस बार रूबी की आत्मा चीख रही थी –
“कब तक? कब तक मैं चुप रहूंगी?”
काम खत्म होने के बाद, दोनों ने फिर शराब पीनी शुरू की, घर के ही एक कोने में बैठकर। रात करीब साढ़े ग्यारह बज गए। नशे में चूर दोनों जमीन पर ही ढेर हो गए।
इसी बीच, दरवाज़े पर दस्तक हुई।
13. जतिन की वापसी – और सच की आग
दरवाज़ा किसी ने नहीं खोला – न चंद्र, न दिलबाग। दोनों नशे में बेहोश थे।
रूबी ने खुद को किसी तरह खोलकर आज़ाद किया। हाथ-पांव कांप रहे थे, पर हिम्मत जुटाई। मुख्य दरवाज़े तक गई, धीरे से खोला।
बाहर जतिन खड़ा था – फैक्ट्री से लौटकर। उसके चेहरे पर सामान्य-सी थकान थी, लेकिन रूबी के आंसू देखकर वह घबरा गया।
“क्या हुआ रूबी? तू रो क्यों रही है?”
रूबी बिना कुछ बोले उसके गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी।
जतिन को कुछ समझ नहीं आया। उसने उसका चेहरा ऊपर उठाकर देखा, आंसुओं से भीगा हुआ, आंखों में बेइज़्ज़ती का सैलाब।
“अंदर चल, बताती क्या हुआ।”
दोनों अंदर आए। कमरे में देखा – चंद्र और दिलबाग नशे में धुत्त पड़े हुए, शराब की बोतलें बिखरी हुईं।
रूबी ने जतिन को अलग कमरे में ले जाकर आज वह कहा, जो महीनों से उसके गले में अटका था।
“तुम्हारे पिता… मेरे साथ दिन-रात गलत काम करते हैं। खेतों में, घर में, जब-तब। आज भी उन्होंने और इस दिलबाग सरपंच ने मिलकर मेरे साथ जबर्दस्ती की है।”
जतिन ने पहले विश्वास नहीं किया –
“तू होश में तो है? तू मेरे बाप पर इलज़ाम लगा रही है!”
रूबी ने अपनी फटी हुई साड़ी, निशान, अपने कांपते शरीर को दिखाया –
“ये सब झूठ है क्या?”
जतिन की आंखों का रंग बदलने लगा। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
सारी बात उसके सामने साफ़ होती गई – रात में नशे में घर आना, बहू की आंखों में छुपा डर, उसकी आधी-अधूरी बातें।
फिर कमरे से आती शराब की बदबू, और फर्श पर पड़े दो हैवान – उसका बाप और सरपंच।
14. खून का फैसला – कुल्हाड़ी और गंडासा
जतिन के गुस्से ने अब उफान पकड़ लिया।
“इन दोनों ने… मेरी पत्नी के साथ…”
उसकी नजर घर में रखे औज़ारों पर गई। दीवार के सहारे एक कुल्हाड़ी टंगी थी। उसने उसे उठा लिया।
उधर रूबी के हाथ भी कुछ तलाश रहे थे – उसे एक गंडासा मिल गया।
अब दोनों कमरे में लौटे जहां चंद्र और दिलबाग शराब के नशे में धुत्त पड़े थे। दिलबाग कुछ बड़बड़ा रहा था –
“तुम्हारी बीवी तो दिन-रात चंद्र के साथ सो सकती है, तो मेरे साथ थोड़ी देर क्या…”
शब्द अधूरे रह गए। अगले ही पल जतिन की आंखों में खून उतर आया।
“तूने मेरे घर को कोठा समझ रखा है?” – वह दहाड़ा।
उसने दिलबाग के गले के पास कुल्हाड़ी उठाई – एक, दो, तीन, चार वार। खून कमरे में फैल गया। दिलबाग वहीं ढेर हो गया।
उधर रूबी ने अपने ससुर चंद्र के पेट और सीने में गंडासा चलाया – कई बार, बिना रुके, बिना हिचके। वो हर वार के साथ अपने भीतर छुपे महीनों के दर्द, डर, घुटन, बेइज्जती को बाहर निकाल रही थी।
चंद्र तड़पता हुआ ज़मीन पर गिर गया।
फिर जतिन ने एक और बात कही –
“उसका वो अंग काट दे, जिससे वो राक्षसी काम करता था।”
उसने अपने पिता की पेंट नीचे खींच दी। रूबी ने गंडासा उठाया – एक ही वार में उसकी मर्दानगी काट डाली।
एक ही पल में, वह हैवान जो महीनों से उसे नोच रहा था, हमेशा के लिए नपुंसक और निर्जीव पड़ा था।
दो लाशें – एक सरपंच की, एक ससुर की – कमरे में खून से लथपथ थीं।
लेकिन रूबी और जतिन के दिल में पहली बार एक अजीब-सा सुकून था –
“अब कोई फिर ऐसा नहीं कर पाएगा।”
15. थाने की राह – और सच की गवाही
इतना सब करने के बाद भी, इन दोनों ने भागने की कोशिश नहीं की।
रात के अंधेरे में, वे घर से बाहर निकले, करीब डेढ़ घंटे पैदल चलते हुए नज़दीकी पुलिस थाने पहुंचे।
थाने में ड्यूटी पर तैनात दरोगा ने उन्हें देखकर पूछा –
“कौन हो तुम? इस वक्त यहां क्या काम?”
जतिन ने बिना घुमाए-फिराए कहा –
“हमने दो लोगों की हत्या की है – मेरे पिता चंद्र और गांव के सरपंच दिलबाग की। हमें गिरफ्तार करो।”
सब हक्का-बक्का रह गए।
दरोगा ने उन्हें बैठाया, पानी दिया, और पूरा किस्सा सुनने को कहा।
रूबी ने अपने बीते हुए हर एक दिन का पन्ना खोलना शुरू किया –
खेत में पहली बार ससुर की दरिंदगी,
पहली धमकी,
शराब भरी बैठकों के बाद घर में घुसना,
करण सिंह जमींदार के साथ मिलकर किए गए ज़ुल्म,
पैसे के लालच में अपनी ही बहू को बेच देना,
दिलबाग सरपंच के साथ आखिरी रात की हैवानियत,
सब कुछ।
पुलिस ने हर बात ध्यान से सुनी। जतिन ने बीच-बीच में अपनी तरफ से भी घटनाएं बताईं।
काफी देर की पूछताछ के बाद पुलिस टीम घटना स्थल पर पहुंची, दोनों की लाशें बरामद कीं। करण सिंह जमींदार को भी तुरंत पकड़ लिया गया। जांच के बाद उसके भी खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी गई – बलात्कार, साजिश, और औरत की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए।
रूबी और जतिन के खिलाफ भी हत्या की धाराएं लगीं।
मामला अदालत तक पहुंचा। अब यह जज के हाथ में था –
“क्या ये हत्या है, या ज़ुल्म के खिलाफ आखिरी प्रतिरोध?”
फैसला भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है।
16. सवाल, जो कहानी छोड़ जाती है
छज्जूपुर गांव में इस घटना के बाद हलचल मच गई। लोग कानाफूसी में कहते –
“ससुर ने बहू के साथ ऐसा किया, तो क्या बहू-बहू और ससुर-ससुर रह गए थे?”
“जतिन ने जो किया, सही किया या गलत?”
“कानून हाथ में लेना क्या ठीक था?”
कहानी यह नहीं कहती कि हत्या समाधान है।
कानून इस बात का फैसला करेगा कि रूबी और जतिन ने जो किया, वह किस हद तक अपराध है, और किस हद तक मजबूरी और आत्मरक्षा का परिणाम।
लेकिन इस घटना से कुछ सवाल ज़रूर निकलते हैं:
क्या गरीब औरत की चुप्पी को हमेशा उसकी मजबूरी समझकर उसे नोचा जा सकता है?
क्या बाप होने की आड़ में कोई इंसान हैवान बन सकता है, और समाज फिर भी आंख बंद रखे?
क्या जब न्याय समय पर नहीं मिलता, तब लोग खुद न्याय करने की कोशिश नहीं करते?
रूबी की गलती यह थी कि उसने इतने दिन चुप्पी साधे रखी।
चंद्र की गंदगी यह थी कि उसने अपने ही घर की इज्जत को बाज़ार में बेच डाला।
करण और दिलबाग की दरिंदगी यह थी कि उन्होंने एक मजबूर औरत को सिर्फ जिस्म समझा, इंसान नहीं।
17. अंत नहीं, आईना
यह कहानी सिर्फ छज्जूपुर गांव की नहीं, उन सभी घरों की है जहां औरतें डर, शर्म, और समाज की जुबान के डर से चुप रहती हैं। जहां कोई चंद्र, कोई करण, कोई दिलबाग, दूसरों के रिश्तों, इज्जत और जिन्दगी से खेलते हैं।
हो सकता है, अदालत रूबी और जतिन को सज़ा दे –
हो सकता है, उनकी सज़ा कम हो, ज़्यादा हो –
लेकिन यह तय है कि समाज को ये कहानी एक आईना दिखाकर गई है।
अगर घर के अंदर ही हैवान बैठा हो,
तो औरत की चुप्पी ही उसकी सबसे बड़ी कैद बन जाती है।
और जब एक दिन वह चुप्पी टूटती है,
तो सिर्फ आवाज़ नहीं निकलती –
अक्सर खून भी बहता है।
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