“प्लीज मेरे छोटे भाई को गोद ले लीजिए, मैं अनाथालय में ही रहूँगा।” बच्चे की इस विनती ने..

“मल्होत्रा मेंशन की दीवारें: खून से गहरे रिश्ते”

भूमिका

मुंबई की चमकती रोशनी के बीच, मल्होत्रा मेंशन एक आलीशान महल था, जहां दौलत, नाम और शोहरत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन इस महल की दीवारें बच्चों की किलकारी के लिए तरस रही थीं। शेखर मल्होत्रा और उनकी पत्नी अंजलि की जिंदगी में सब कुछ था, सिवाय एक वारिस के। कई सालों तक इलाज और मन्नतों के बाद, जब डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी, तो दोनों ने एक बड़ा फैसला लिया—एक बच्चे को गोद लेना।

अनाथालय का सफर

मुंबई के एक अनाथालय में बच्चों की कतार लगी थी। हर बच्चा अपने-अपने तरीके से आए हुए मेहमानों को रिझाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन कतार के आखिरी कोने में दो भाई—दक्ष (10 साल) और मोक्ष (5 साल)—एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे। दक्ष के कपड़े पुराने थे लेकिन साफ, और उसने मोक्ष के बालों को सलीके से संवारा था। उसकी आंखों में बचपन की मासूमियत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का बोझ था। वह बार-बार मोक्ष को समझा रहा था, “जब वो अंकल आएं तो अच्छे से नमस्ते करना, रोना बिल्कुल नहीं, वरना वो तुम्हें नहीं ले जाएंगे।”

अंजलि बच्चों से मिलती हुई आगे बढ़ रही थी। जैसे ही उसकी नजर मोक्ष पर पड़ी, वह रुक गई। मोक्ष की डरी हुई आंखों में अंजलि को अपना अक्स दिखाई दिया। उसने मोक्ष को गोद में उठा लिया। मोक्ष पहले तो सहम गया, फिर धीरे-धीरे अंजलि के गले लग गया। अंजलि की आंखों से ममता के आंसू छलक पड़े। उसने शेखर की ओर देखा और सिर हिलाया—फैसला हो चुका था।

दक्ष का बलिदान

तभी दक्ष ने मोक्ष का हाथ छोड़ दिया और पीछे हट गया। उसने रूखेपन से कहा, “मुझे नहीं जाना, आप सिर्फ मोक्ष को ले जाइए। मुझे यहां अपने दोस्तों के साथ रहना है।” वार्डन ने घबराकर कहा, “साहब, ये दोनों सगे भाई हैं। इनके माता-पिता एक एक्सीडेंट में गुजर गए थे। तब से दक्ष ही मोक्ष की मां और बाप दोनों बना हुआ है। ये झूठ बोल रहा है।”

शेखर मल्होत्रा ने दक्ष की आंखों में झांका। उन्होंने देखा कि ये बच्चा अपने भाई के सुनहरे भविष्य के लिए खुद को बुरा बना रहा है। उसे डर था कि दो बच्चों को कोई गोद नहीं लेगा। शेखर का दिल पसीज गया। उन्होंने वार्डन से कहा, “कागजात तैयार कीजिए। मैं यहां एक बच्चे को लेने आया था, लेकिन अब मैं दो बेटे लेकर जाऊंगा।”

मल्होत्रा मेंशन में नया तूफान

कार मल्होत्रा मेंशन के विशाल लोहे के गेट पर पहुंची। घर के दरवाजे पर शेखर की मां कावेरी देवी और विधवा बहन रूपाली बुआ खड़ी थीं। कावेरी देवी पुराने ख्यालात की सख्त महिला थीं। जैसे ही शेखर और अंजलि दोनों बच्चों का हाथ थामे उतरे, कावेरी देवी ने आरती की थाली जमीन पर दे मारी। “यह किस जात के बच्चों को मेरे घर के आंगन में ले आया शेखर?” उनकी आवाज में नफरत थी।

शेखर ने मां की आंखों में आंखें डालकर कहा, “मां, ये कोई कचरा नहीं, ये मेरे बेटे हैं।” रूपाली बुआ ने फुसफुसाकर कावेरी देवी को शांत किया, “अभी इन्हें अंदर आने दो, बाद की बाद में देखेंगे।” कावेरी देवी ने रास्ता छोड़ते हुए कहा, “ठीक है, अंदर आ जाओ, लेकिन याद रखना शेखर, खून-खून होता है और पानी-पानी।”

घर में तिरस्कार

मल्होत्रा मेंशन अंदर से किसी महल जैसा था, लेकिन वहां की हवा में ठंडक और तनाव था। नौकरों ने सामान उठाया, लेकिन उनकी नजरों में भी तिरस्कार था। कावेरी देवी ने पोते के लिए सजा कर रखा कमरा बंद कर दिया। “यह कमरा मेरे वंश का है। इन अनाथों को गेस्ट हाउस में ले जाओ।”

दक्ष सब समझ रहा था। उसने चुपचाप मोक्ष का हाथ पकड़ा और गेस्ट रूम की तरफ चल दिया। कमरे में पहुंचकर जब अंजलि ने दरवाजा बंद किया, तब जाकर बच्चों ने राहत की सांस ली।

साजिश की रात

रात को दक्ष को प्यास लगी। वह दबे पांव रसोई की तरफ बढ़ा। लिविंग रूम में रूपाली बुआ फोन पर किसी से बात कर रही थी, “भाई अभी नया-नया पिता बना है, शौक शरा है उतर जाएगा। कल घर में पूजा है, उसी पूजा में ऐसा तमाशा करूंगी कि भाई खुद इन दोनों को बाहर निकाल देगा।”

दक्ष का गला सूख गया। उसे समझ आ गया कि उनकी लड़ाई सिर्फ दादी की नफरत से नहीं, बल्कि बुआ की साजिशों से भी है। वह अपने भाई को वापस उस अनाथालय में नहीं जाने देगा।

पूजा में साजिश

अगली सुबह पूजा की तैयारियां जोरों पर थीं। रूपाली बुआ ने कीमती सोने का हार सोफे के गद्दे के नीचे छिपा दिया, ठीक वहां जहां दक्ष बैठा था। पूजा शुरू हुई, हॉल में मेहमानों की भीड़ थी। अचानक रूपाली बुआ चीख पड़ी, “हाय राम मेरा हार कहां गया?” पूजा रुक गई। रूपाली बुआ ने दक्ष को बाह से पकड़ कर खड़ा किया, और सोफे के गद्दे के नीचे से हार निकाल लिया।

हॉल में सन्नाटा छा गया। कावेरी देवी ने कहा, “जरूर घर के ही किसी नए सदस्य का हाथ होगा।” रूपाली बुआ ने पुलिस को बुलाने की धमकी दी। मोक्ष डर के मारे रोने लगा।

पुलिस का आगमन

इंस्पेक्टर कदम घर पहुंचे। कावेरी देवी ने दक्ष की ओर उंगली उठाई, “चोर यही है।” पुलिस वाला दक्ष की तरफ बढ़ा। मोक्ष चीख पड़ा, “भैया को मत ले जाओ।” शेखर ने पुलिस का रास्ता रोका, “यह मेरा बेटा है, और मेरे घर में कोई चोरी नहीं हुई है।”

रूपाली बुआ ने पुलिस को जोर देकर कहा, “हार गद्दे के नीचे से मिला है।” दक्ष यह सब देख रहा था। उसे समझ आ गया कि अगर उसने सच बोला तो कोई यकीन नहीं करेगा। उसके पिता की इज्जत और भाई की सुरक्षा के लिए उसने बलिदान देने का फैसला किया।

दक्ष का त्याग

दक्ष ने सिर झुकाकर कांपते हुए कहा, “पुलिस अंकल सही कह रहे हैं। चोरी मैंने ही की है।” शेखर को लगा जैसे किसी ने उसका कलेजा निकाल लिया हो। इंस्पेक्टर कदम ने हथकड़ी निकाली और दक्ष को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा। मोक्ष चीख पड़ा और अंजलि फूट-फूट कर रोने लगी। रूपाली बुआ के चेहरे पर शैतानी मुस्कान थी। उनकी साजिश कामयाब हो गई थी।

सच का उजागर होना

लेकिन तभी शेखर ने झपट्टा मारा और इंस्पेक्टर के हाथ से हथकड़ी छीन कर दूर फेंक दी। शेखर ने दक्ष को अपनी गोद में उठा लिया और उसे सीने से लगा लिया। फिर उसने अपनी मां और बहन की तरफ देखा। “एक छोटा बच्चा जिसने झूठ बोला ताकि मेरी नाक ना कटे।”

शेखर ने अपना मोबाइल टीवी से कनेक्ट किया। अगले ही पल टीवी की स्क्रीन पर वीडियो प्ले हुआ—रूपाली बुआ हार को सोफे के गद्दे के नीचे छिपा रही थीं। हॉल में सन्नाटा छा गया। असली चोर सामने था।

इंस्पेक्टर कदम ने रूपाली बुआ को गिरफ्तार कर लिया। रूपाली बुआ घुटनों के बल गिर पड़ी, “मां, मुझे माफ कर दो।” कावेरी देवी ने झटक कर अपना पैर छुड़ा लिया। शेखर ने दीवार में बनी तिजोरी से वसीयत की फाइल निकाल लाया और उसे आग के हवाले करने की धमकी दी।

रिश्तों की जीत

दक्ष ने शेखर का हाथ पकड़ लिया, “पापा, प्लीज इसे मत जलाइए। यह आपका घर है, आपकी मेहनत है। हमारे लिए आप अपना सब कुछ क्यों खो रहे हैं? हम वापस अनाथालय चले जाएंगे।”

शेखर की आंखों से आंसू बह निकले। उसने जलती हुई लकड़ी को हवन कुंड में फेंक दिया और फाइल नीचे गिरा दी। वह घुटनों के बल बैठ गया और दक्ष को गले लगाकर फूट-फूट कर रोने लगा। “तू मेरा बेटा है, दक्ष। तुझे कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”

कावेरी देवी ये सब देख रही थीं। उनका अहंकार और वंश का घमंड चकनाचूर हो गया। वे आगे बढ़ीं और दक्ष के पास जमीन पर बैठ गईं। “मुझे माफ कर दे बेटा। मैं हीरों की परख करने का दावा करती थी, लेकिन असली हीरा मेरे सामने था और मैं उसे पत्थर समझ बैठी।”

दक्ष ने दादी के आंसू पोंछे, “दादी आप रोइए मत। बड़े लोग रोते हुए अच्छे नहीं लगते।” कावेरी देवी ने दक्ष को प्यार से गले लगा लिया। “आज से तुम अनाथ नहीं हो, आज से तुम इस घर के मालिक हो।”

एक नई शुरुआत

अगली सुबह मल्होत्रा मेंशन में एक नई शुरुआत हुई। शेखर ने वकील को बुलाया, वसीयत बदलने के लिए। “मेरी दौलत का वारिस अब सिर्फ मल्होत्रा खून होने से तय नहीं होगा। वारिस वह होगा जिसमें इंसानियत होगी, जिसमें त्याग की भावना होगी।”

शेखर ने अपनी आधी संपत्ति ‘दक्ष और मोक्ष फाउंडेशन’ के नाम कर दी, जो शहर के हर अनाथ बच्चे की पढ़ाई और परवरिश का खर्च उठाएगा।

कावेरी देवी ने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा, “तूने सही किया शेखर। दौलत तिजोरी में बंद रहने के लिए नहीं, किसी के आंसू पोंछने के लिए होती है। यह सबक मुझे मेरे 10 साल के पोते ने सिखाया है।”

समय का पहिया

15 साल बाद, मुंबई के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में बिजनेसमैन ऑफ द ईयर का अवार्ड फंक्शन चल रहा था। स्टेज पर 25 साल का दक्ष मल्होत्रा खड़ा था। अपनी मेहनत और काबिलियत से उसने पिता के बिजनेस को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था। उसके बगल में मोक्ष खड़ा था, जो अब एक मशहूर आर्टिस्ट बन चुका था।

दक्ष ने अवार्ड अपनी दादी के हाथों में सौंप दिया और उनके पैर छुए। “दुनिया मुझे अनाथ कहती थी, लेकिन सच तो यह है कि इस परिवार ने मुझे गोद नहीं लिया, बल्कि मैंने और मेरे भाई ने इस परिवार को नया जीवन दिया। मेरी असली दौलत यह अवार्ड नहीं, बल्कि मेरी दादी का आशीर्वाद है।”

पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। शेखर और अंजलि की आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। कावेरी देवी ने दक्ष और मोक्ष को गले लगा लिया।

उपसंहार

यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवार का मतलब सिर्फ एक सरनेम या डीएनए नहीं होता। परिवार वो है जो आपके बुरे वक्त में आपका हाथ ना छोड़ दे। खून के रिश्ते तो अक्सर जायदाद के लिए लड़ते हुए देखे गए हैं, लेकिन दिल के रिश्ते जो प्यार और त्याग की नींव पर बनते हैं, वे हर आंधी का सामना कर सकते हैं। मल्होत्रा मेंशन अब सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं, बल्कि एक घर बन चुका था। एक ऐसा घर जहां दीवारें प्यार से जुड़ी थीं, सीमेंट से नहीं।

समाप्त