गरीब माँ, अमीर हौसला: जब सच्चाई सामने आई

भूमिका

मुंबई की शामें हमेशा भीड़ और शोर से भरी रहती हैं, लेकिन मेरे छोटे से फ्लैट में अक्सर सुकून रहता है। मेरा नाम तारमती भोसले है, उम्र 56 साल। अंधेरी ईस्ट के मारोल इलाके में दो कमरे के फ्लैट में रहती हूँ। 12 साल पहले मेरे पति मोहन गुजर गए थे। तीन साल की लंबी बीमारी के बाद उनकी किडनी फेल हो गई थी। तब मैं 44 साल की थी। अकेले ही बेटी निशा को पाला। लोग सोचते हैं कि मैं घर पर कपड़े सिलती हूँ, किसी तरह गुज़ारा करती हूँ। पर सच कुछ और है, एक ऐसा सच जो मेरी बेटी भी नहीं जानती। लेकिन यह कहानी उस दिन से शुरू होती है जब मैं पहली बार अपनी होने वाली दामाद केशव के परिवार से मिली थी।

पहली मुलाकात

निशा और केशव की शादी तय हो चुकी थी। प्रेम विवाह था। दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे। केशव अच्छा लड़का था, पढ़ा लिखा, संस्कारी। पर उसकी मां रत्नावली रायचंद बांद्रा वेस्ट के पाली हिल इलाके में चार कमरे के बड़े फ्लैट में रहती थी। उनके पति महेंद्र रायचंद के इलेक्ट्रॉनिक्स के शोरूम थे, पैसा बहुत था और घमंड उससे भी ज्यादा।

निशा ने कहा, “मम्मा, पहली मुलाकात के लिए अच्छी साड़ी पहन लेना। केशव के परिवार वाले बहुत मॉडर्न हैं।” मैं मुस्कुरा दी। मेरी अलमारी में बनारसी, कांजीवरम सिल्क, डिजाइनर साड़ियां थीं। पर मैंने एक सादी सूती साड़ी पहनी, बिना जरी की, बिना काम की। चप्पल भी साधारण। बाल भी बस एक सीधा जुड़ा। निशा ने देखा तो बोली, “मम्मा, कुछ और अच्छा पहन लेतीं।” मैंने कहा, “बेटा, मेरे पास यही ठीक है।”

रायचंद परिवार के घर

हम बांद्रा पहुंचे। सातवीं मंजिल पर लिफ्ट से पहुंचे तो सामने रत्नावली खड़ी थी, डिजाइनर साड़ी, हीरे के झुमके, गले में मोतियों की माला। उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी आंखों में वह भाव था—जब कोई किसी को छोटा समझता है। “आइए,” उन्होंने कहा, पर आवाज में गर्मजोशी नहीं थी। घर बहुत बड़ा था, महंगा फर्नीचर, बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स, सब कुछ दिखावे के लिए सजा हुआ। महेंद्र रायचंद सोफे पर बैठे थे। उन्होंने भी वैसे ही देखा मुझे।

चाय आई महंगे कप में। रत्नावली बोली, “तो आप अकेले ही रहती हैं? बहुत मुश्किल होता होगा ना?” उनकी आवाज में हमदर्दी नहीं थी, सिर्फ दिखावा था। “हां,” मैंने धीरे से कहा, “पति गुजर गए 12 साल पहले। बस मैं और निशा। किसी तरह गुजारा चल रहा है।” “और क्या करती हैं आप?” महेंद्र ने पूछा। “घर पर थोड़ा सिलाई का काम कर लेती हूँ।” मैंने जवाब दिया। झूठ नहीं था बिल्कुल, सिलाई मैं करती थी, पर सिर्फ अपने कपड़ों की। पर उन्हें जो समझना था, समझने दिया।

रत्नावली और महेंद्र ने एक दूसरे की तरफ देखा। मैं समझ गई, उन्हें लगा कि मैं गरीब हूँ, बेसहारा हूँ। केशव शर्मिंदा सा दिख रहा था, निशा असहज थी। पर मैं शांत थी, क्योंकि मुझे पता था कि सच तो अभी आना बाकी है।

सगाई की तैयारी

शादी की तारीख तय हुई। रत्नावली ने कहा, “हम लोग सब इंतजाम कर लेंगे। आपकी हालत देखकर लगता नहीं कि…” उन्होंने बात बीच में छोड़ दी, पर मतलब साफ था। मैं मुस्कुरा दी। जब हम निकले तो निशा ने कहा, “मम्मा, आपने उनसे बता क्यों नहीं दिया कि आप क्या करती हैं?” “बेटा, सही समय पर सब पता चल जाएगा,” मैंने कहा।

उस रात घर पहुंचकर मैं अपने छोटे से होम ऑफिस में बैठी। दीवार पर मोहन की फोटो थी। मैंने उनसे कहा, “देखा? शुरुआत हो गई। अब देखते हैं आगे क्या होता है।” मेरे सामने बिजनेस के रजिस्टर रखे थे। फार्मास्यूटिकल डिस्ट्रीब्यूशन का धंधा। 12 साल की मेहनत, 40 से ज्यादा हॉस्पिटल और क्लीनिक मेरे क्लाइंट थे। हर महीने ₹5 लाख की आमदनी। पर यह बात सिर्फ मैं और मेरी बिजनेस पार्टनर उर्वशी फड़के जानती थी।

सगाई का दिन

एक दिन रत्नावली ने फोन किया, “सुनिए, सगाई के लिए आप क्या सोच रही हैं?” “जो आप कहें,” मैंने कहा। “देखिए, मैं समझती हूँ आपकी हालत। तो बेहतर होगा अगर छोटा सा फंक्शन रख लें, घर पर ही। ज्यादा खर्चा नहीं होगा।” उनकी आवाज में वही घमंड था। “ठीक है,” मैंने शांति से कहा।

सगाई के दिन रायचंद के घर पर ही फंक्शन था। कुछ रिश्तेदार आए थे, सब बहुत अमीर दिख रहे थे। मैं फिर से सादी साड़ी में थी। निशा के लिए सुंदर लहंगा खरीदा था, पर अपने लिए कुछ खास नहीं। रत्नावली ने देखा तो बोली, “अरे, आपने अपने लिए कुछ नया नहीं लिया?” “बस यही ठीक था,” मैंने कहा।

गहनों की बात आई। रत्नावली ने कहा, “देखिए, निशा को सोने के गहने तो चाहिए। अगर आपको दिक्कत हो तो हम खरीद देंगे, बाद में आराम से दे देना।” मेरे अंदर गुस्सा आया, पर चेहरे पर कुछ नहीं दिखाया। “नहीं, निशा के गहने मैं खुद ले आउंगी,” मैंने शांति से कहा। रत्नावली ने फिर से वहीं तिरछी मुस्कान दी। “ठीक है, पर आप जानती हैं ना कि आजकल सोने के दाम कितने हैं?” “जी, पता है,” बस इतना ही कहा मैंने।

अगले हफ्ते मैं सीधे जावेरी बाजार गई। उर्वशी मेरे साथ थी। हमने निशा के लिए पूरा सेट खरीदा—हार, कंगन, झुमके, मांगटीका, शुद्ध सोना, 7.5 लाख का कैश पेमेंट किया। बिल अपने नाम से बनवाया। पर यह बात किसी को नहीं बताई।

सगाई के दिन जब निशा गहने पहन कर आई तो सब चौंक गए। रत्नावली के चेहरे का रंग उड़ गया। महेंद्र ने पूछा, “वाह, बहुत सुंदर गहने हैं। कहां से लिए?” “जावेरी बाजार से,” मैंने सीधा जवाब दिया। रत्नावली ने कुछ नहीं कहा, पर उनकी आंखों में सवाल था। मैं मुस्कुरा रही थी, अंदर ही अंदर क्योंकि यह तो बस शुरुआत थी। असली खेल तो अब शुरू होना था।

शादी की तैयारी

शादी की तैयारियां चल रही थी और रत्नावली के तीर भी लगातार चल रहे थे। हर मुलाकात में वे कुछ ना कुछ जरूर कहती थीं। छोटी-छोटी बातें, पर हर बात में जहर भरा हुआ। एक दिन शादी की प्लानिंग के लिए मैं फिर से उनके घर गई। निशा भी थी।

रत्नावली ने कहा, “देखिए, हॉल तो हम बुक कर देंगे, पर खाने का इंतजाम छोटा रखना पड़ेगा। आपकी तरफ से ज्यादा लोग तो नहीं होंगे?” “जी,” मैंने सिर हिलाया। “और बारात भी ज्यादा बड़ी नहीं रखेंगे। सीधा साधा फंक्शन रखेंगे, क्योंकि…” उन्होंने रुककर मेरी तरफ देखा, “हम जानते हैं कि आपकी माली हालत…” निशा ने बीच में रोका, उसकी आंखों में आंसू थे। पर मैंने निशा को संभाला। “नहीं बेटा, रत्नावली जी सही कह रही हैं। जो उचित है वही होगा।”

महेंद्र बोले, “और देखिए, शादी के खर्च में हम थोड़ी मदद कर देंगे, आप परेशान मत होइए।” मदद… उन्हें लगता था कि मुझे उनकी मदद चाहिए। मैंने चुपचाप सुना, मन में नोट किया। हर बात, हर शब्द। घर लौटते हुए निशा रो रही थी। “मम्मा, मुझे शर्म आती है, वे लोग आपको इतना छोटा क्यों समझते हैं?” मैंने उसे गले लगाया, “बेटा, लोग जो समझना चाहते हैं, समझने दो। सच तो वक्त पर सामने आ ही जाता है।”

असली योजना

उस रात मैं अपने गोदाम में थी। कुरला का इलाका, मेरा फार्मास्यूटिकल वेयरहाउस। उर्वशी वहां थी। हमारे 12 कर्मचारी थे। सुबह 6 बजे की डिलीवरी की तैयारी चल रही थी। “तारा, तू उन लोगों को बताएगी कब?” उर्वशी ने पूछा। “जब सही समय होगा,” मैंने कहा, “अभी तो और खेल बाकी है। जितना वे मुझे नीचे गिराएंगे, उतना ही ऊंचा मेरा उठना होगा।”

शादी का दिन

शादी की तारीख नजदीक आ रही थी। एक दिन रत्नावली ने फिर फोन किया, “सुनिए, शादी के बाद निशा और केशव को एक फ्लैट चाहिए ना। हमने सोचा है कि हम एक छोटा सा फ्लैट ढूंढ देंगे, अंधेरी या मलाड में। आपकी तरफ से कुछ कंट्रीब्यूशन हो सके तो बता देना।” कंट्रीब्यूशन… मैं हंसी अंदर ही अंदर। “जी, देख लूंगी,” मैंने फोन रख दिया।

अगले दिन मैं अपने वकील मनोज कुलकर्णी से मिली। “मनोज, मुझे पवई में एक अच्छा तीन कमरे का फ्लैट चाहिए।” “बजट?” “दो से ढाई करोड़।” दो हफ्ते में फ्लैट मिल गया, हीरानंदानी में तीन बेडरूम, पूरी तरह फर्निश्ड। 2 करोड़ 40 लाख का। पूरा पेमेंट कैश और बैंक ट्रांसफर से किया। रजिस्ट्री निशा के नाम से करवाई, सिर्फ निशा के नाम। सारे कागजात मनोज के पास रखवा दिए।

शादी और खुलासा

शादी का दिन आया। सब कुछ रत्नावली की मर्जी से हुआ—छोटा सा फंक्शन, साधारण खाना, छोटी बारात। निशा खुश थी, केशव अच्छा लड़का था। शादी के दिन रत्नावली ने अपने रिश्तेदारों से कहा, “देखो, लड़की की मां अकेली है, बेचारी ने बड़ी मुश्किल से इतना इंतजाम किया होगा।” यह बातें मेरे कानों तक पहुंच रही थी। मैं मुस्कुरा रही थी, क्योंकि मुझे पता था कि असली खेल तो अभी बाकी है।

शादी हो गई। केशव और निशा का नया जीवन शुरू हुआ। रत्नावली ने उन्हें अपने घर में ही एक कमरा दे दिया था, जब तक उनका फ्लैट नहीं मिल जाता। पर हर दिन हर बात में वे निशा को एहसास दिलाती थीं कि वो उन पर बोझ है। एक महीना बीत गया। निशा परेशान रहने लगी। एक दिन उसने फोन किया, “मम्मा, मैं वापस आना चाहती हूँ।” “शादी में सब्र चाहिए बेटा, थोड़ा समय दे,” मैंने समझाया। पर अंदर से मेरा खून खौल रहा था।

फैमिली डिनर और असली सच

फिर वह दिन आया, शादी के दो महीने बाद। रत्नावली ने एक डिनर पार्टी रखी, अपने सारे रिश्तेदारों को बुलाया। मुझे भी बुलाया। “आइए, फैमिली डिनर है।” मैंने सोचा, चलो अच्छा है, सही समय आ गया है। उस शाम मैंने कांजीवरम साड़ी पहनी, सोने के गहने पहने, ठीक से तैयार होकर गई। उर्वशी मेरे साथ थी, मनोज कुलकर्णी भी, सारे कागजात एक फाइल में।

जब मैं पहुंची तो रत्नावली का घर रोशनी से जगमगा रहा था। बहुत सारे लोग थे। मुझे देखकर रत्नावली चौकी, मेरी साड़ी, गहने देखकर। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। खाना शुरू हुआ, बातचीत चल रही थी। तभी रत्नावली ने जोर से कहा, “अरे सब लोग सुनो, मैं बताना चाहती हूं कि हमने केशव और निशा के लिए एक छोटा सा फ्लैट देखा है, अंधेरी में एक बेडरूम, बस 35-40 लाख का। हम लोग मिलकर खरीद देंगे। क्योंकि निशा की मां अकेली हैं, उनसे तो ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते।”

सब लोग मेरी तरफ देखने लगे। निशा की आंखें भर आई, केशव शर्मिंदा था, महेंद्र ने भी सिर हिलाया। मैं चुपचाप सुन रही थी। एक घूंट पानी पिया, फिर धीरे से बोली, “रत्नावली जी, मुझे लगता है कि आप गलतफहमी में हैं।” “गलतफहमी?” वे हंसी। “कैसी गलतफहमी?” “यह कि मैं गरीब हूं,” मैंने शांति से कहा।

सच्चाई का उजागर होना

कमरे में सन्नाटा छा गया। रत्नावली के चेहरे पर अजीब सा भाव आया। मैंने मनोज को इशारा किया। उन्होंने फाइल मेज पर रखी। “मतलब यह कि केशव और निशा के लिए फ्लैट की जरूरत नहीं है, क्योंकि मैं पहले से ही उन्हें एक फ्लैट दे चुकी हूं।”

“क्या?” रत्नावली उठ खड़ी हुई। मैंने प्रॉपर्टी के कागजात निकाले, “पवई में, हीरानंदानी में, तीन बेडरूम, पूरी तरह फर्निश्ड। रजिस्ट्री निशा के नाम है, सिर्फ निशा के नाम।” निशा की आंखें फटी रह गईं। “मम्मा?” “हां बेटा, यह तेरा घर है, शादी का तोहफा मेरी तरफ से।”

केशव ने कागजात देखे, उसका मुंह खुला का खुला रह गया। “यह तो 2 करोड़ से ज्यादा का…” “2 करोड़ 40 लाख का, पूरा पेमेंट हो चुका है, कोई लोन नहीं।” रत्नावली का चेहरा सफेद पड़ गया, महेंद्र भी स्तब्ध थे। सारे रिश्तेदार चौंक गए थे। किसी ने कुछ नहीं कहा, बस मुझे घूर रहे थे।

मैंने दूसरी फाइल निकाली, “और अगर आप सोच रही हैं कि मैंने यह पैसा कहां से लाया, तो यह देखिए। मेरा फार्मास्यूटिकल डिस्ट्रीब्यूशन बिजनेस 12 साल से चल रहा है। मुंबई के 40 से ज्यादा हॉस्पिटल और क्लीनिक हमारे क्लाइंट हैं, कुरला में हमारा गोदाम है, 12 कर्मचारी हैं। हर महीने औसतन ₹5 लाख की आमदनी। पिछले साल का टर्नओवर ₹56 लाख।”

सबक और बदलाव

रत्नावली को कुर्सी पकड़नी पड़ी। महेंद्र बोले, “पर आप तो…” “मैं तो क्या, महेंद्र जी? आप क्या सोचते थे कि मैं गरीब हूं, कि मुझे आपकी मदद चाहिए, कि मेरी बेटी आपके घर में किसी तरह रह रही है?” मैंने अपनी प्रॉपर्टी के कागजात निकाले, “मेरा अंधेरी ईस्ट में अपना दो कमरे का फ्लैट है, कोई लोन नहीं, कीमत करीब 1 करोड़ 80 लाख। मेरी फिक्स्ड डिपॉजिट ₹85 लाख। बिजनेस एसेट ₹1 करोड़ 30 लाख का।”

तो बताइए रत्नावली जी, अब भी आपको लगता है कि मुझे आपकी मदद चाहिए?

रत्नावली कुछ नहीं बोल पाई। सारे रिश्तेदार फुसफुसाने लगे, “अरे तो यह इतनी अमीर हैं। हमें तो लगा रत्नावली ने कितनी बार इनकी बेइज्जती की थी।”

मैंने रत्नावली की तरफ सीधा देखा, “आप जानती हैं, मैंने यह सब छुपाया क्यों? क्योंकि मैं चाहती थी कि निशा प्रेम के लिए शादी करे, पैसे के लिए नहीं। और मैं यह देखना चाहती थी कि आप लोग असल में कैसे हैं। जब आपको लगा कि सामने वाला गरीब है, तो आपने कैसा बर्ताव किया।”

हर मुलाकात में आपने मुझे नीचा दिखाया, मेरे कपड़ों पर टिप्पणी की, मेरी माली हालत पर सवाल उठाए, मेरी बेटी को एहसास दिलाया कि वह आप पर बोझ है। और आज आप फिर से सबके सामने मुझे छोटा दिखाना चाह रही थीं।

अंत और सीख

रत्नावली की आंखों में आंसू आ गए, शर्म केशव ने कहा, “मां, आपने गलत किया।” महेंद्र बोले, “हमें माफी मांगनी चाहिए।” मैंने हाथ उठाया, “माफी किस बात की? मैं तो आपको शुक्रिया कहना चाहती हूँ। आपने मुझे दिखा दिया कि इंसान की असलियत पैसे से नहीं बल्कि उसके बर्ताव से पता चलती है।”

मैंने निशा को गले लगाया, “बेटा, तेरा अपना घर है अब। जा खुश रह। केशव अच्छा लड़का है। बस इतना याद रखना, पैसा जरूरी है जिंदगी में, पर इज्जत, संस्कार और किसी को छोटा ना समझना यह सब उससे भी ज्यादा जरूरी है।”

उर्वशी मुस्कुरा रही थी, मनोज ने भी सिर हिलाया। मैंने रत्नावली की तरफ आखिरी बार देखा, “अगर आप सोच रही हैं कि मैं महेंद्र जी के तीन शोरूम खरीद सकती हूँ, तो शायद आप सही सोच रही हैं। पर मैं ऐसा नहीं करूंगी, क्योंकि मैं पैसे से इज्जत नहीं खरीदती। मैं अपनी मेहनत से कमाती हूँ।”

मैं मुड़ी और चलने लगी। सारे लोग चुप थे। निशा रो रही थी, खुशी के आंसू। केशव ने मेरे पैर छुए, “माफ कीजिए, मैं नहीं जानता था कि मेरी मां…” “बेटा, तू अच्छा है, बस अपनी मां को सिखा कि हर किसी को छोटा समझना गलत है।”

घर पहुंची तो रात के 11 बज चुके थे। पूजा घर में दिया जलाया, मोहन की फोटो के सामने। देखा, आज मैंने अपनी बेटी को उसका हक दिला दिया और उन लोगों को दिखा दिया कि औरत कभी कमजोर नहीं होती, बस मौका चाहिए।

बदलाव की लहर

अगले कुछ दिनों में बहुत कुछ बदल गया। रत्नावली ने मुझसे माफी मांगी, रोते हुए। अब वे निशा के साथ अच्छे से बात करती हैं, केशव के साथ भी। महेंद्र ने मुझे बिजनेस में निवेश की पेशकश की, पर मैंने मना कर दिया। मेरा बिजनेस मेरी मेहनत से बना है।

अब लोग मुझे इज्जत से देखते हैं। निशा और केशव अपने पवई वाले फ्लैट में रहते हैं, खुश हैं। निशा को अब समझ आ गया है कि मैंने उसे क्या सिखाया। “मम्मा, अगर मुझे पहले पता होता तो शायद…” “तो शायद तू किसी और से शादी करती, पैसे वाले से। पर क्या वह तुझे खुश रख पाता?” “नहीं, केशव मुझे प्यार करता है, पैसे से नहीं।”

बस यही तो मैं चाहती थी। आज मैं अपने छोटे से फ्लैट में खुश हूँ, क्योंकि मैंने वह हासिल किया जो चाहती थी—इज्जत, अपनी बेटी का सम्मान और सबसे बड़ी बात, अपने आप पर गर्व।

कहानी का सबक

कभी किसी को उसकी सूरत, कपड़े या दिखावे से मत आंको। असली इंसान अंदर से होता है। औरत कभी कमजोर नहीं होती, उसे बस मौका चाहिए। पैसा जरूरी है, पर संस्कार उससे भी ज्यादा। अपनी मेहनत पर भरोसा रखो। दुनिया कुछ भी कहे, तुम्हें अपने ऊपर यकीन होना चाहिए।