पत्नी ने अफ़सर बनने से पहले पति को तलाक दे दियाजॉइनिंग के बाद फिर जो हुआ… कोई सोच भी नहीं सकता |

“एक अफसर की कीमत – आदित्य और काव्या की सच्ची कहानी”

भाग 1: सपनों की शुरुआत

आदित्य और काव्या की शादी किसी बड़े सपने के साथ नहीं, बल्कि साधारण उम्मीदों के साथ हुई थी। दोनों मध्यमवर्गीय परिवार से थे। लेकिन काव्या के भीतर अफसर बनने की आग थी। आदित्य ने उसी दिन मान लिया था कि अगर जिंदगी में किसी एक का आगे बढ़ना जरूरी है, तो वह काव्या होगी। उसने खुद को कभी आगे नहीं रखा।

शादी के बाद वे शहर के एक छोटे से कमरे में रहने लगे। काव्या ने पीसीएस की तैयारी शुरू कर दी। किताबें, कोचिंग, टेस्ट सीरीज, खर्चा हर महीने बढ़ता जा रहा था। आदित्य की आमदनी कभी तय नहीं रही। कभी प्राइवेट नौकरी मिली, कभी छूट गई। कई बार वह दिनभर काम ढूंढता और खाली हाथ लौट आता। घर चलाने और पढ़ाई का खर्च साथ-साथ उठाना आसान नहीं था। कई बार ऐसा हुआ कि घर में सब्जी नहीं बनी, लेकिन काव्या की फीस समय पर जमा हो गई। आदित्य ने नए कपड़े लेना छोड़ दिया, मोबाइल पुराना चला, जूते घिस गए, लेकिन काव्या की किताबें नई आती रहीं।

भाग 2: कुर्बानियों की कीमत

एक दिन कोचिंग की फीस अचानक बढ़ गई। आदित्य के पास पैसे नहीं थे। उसने किसी को बताया नहीं, चुपचाप गांव गया और अपनी पुश्तैनी जमीन बेच दी। काव्या से कहा कि किसी दोस्त ने मदद कर दी। काव्या ने सवाल नहीं किया, क्योंकि उसके पास वक्त नहीं था। कुछ महीनों बाद गहनों की जरूरत पड़ी। टेस्ट सीरीज, रहने का खर्च, सफर सब महंगा था। आदित्य ने एक-एक करके काव्या के गहने गिरवी रख दिए। कई बार रात को वह खाली अलमारी देखकर देर तक बैठा रहता, लेकिन सुबह वही मुस्कान पहन लेता।

इस बीच बेटी आर्या पैदा हुई। जिम्मेदारी और बढ़ गई। आदित्य ने और ज्यादा काम करना शुरू कर दिया। कभी दिहाड़ी, कभी रात की शिफ्ट। कई बार ऐसा हुआ कि उसने खुद खाना नहीं खाया ताकि दूध और दवाइयों का इंतजाम हो सके।

भाग 3: बदलती दुनिया

काव्या का इंटरव्यू निकल गया। अब उसका उठना-बैठना अफसरों और अफसर बनने वालों के बीच होने लगा। बातचीत, पहनावा, सोच – सब बदलने लगे। अब उसे आदित्य का संघर्ष नहीं दिखता था, सिर्फ उसकी हालत दिखती थी। जब कोई पूछता कि उसका पति क्या करता है, तो वह असहज हो जाती। उसे लगने लगा कि एक बेरोजगार या अस्थिर पति उसकी नई पहचान के साथ मेल नहीं खाता। बेटी भी अब उसे उस दुनिया में बोझ लगने लगी, जहां हर कोई स्टेटस देखता था।

आदित्य वही था – थका हुआ, जिम्मेदार, चुप। लेकिन अब उसकी चुप्पी काव्या को खटकने लगी। उसने बहाने ढूंढने शुरू कर दिए – कभी कहा कि आदित्य कुछ नहीं करता, कभी कहा कि वह भविष्य सुरक्षित नहीं कर सकता। असल में उसे शर्म आने लगी थी कि वह अफसर बनने जा रही है और उसका पति अब भी संघर्ष में है।

एक दिन उसने तय कर लिया कि उसे आगे बढ़ना है, चाहे पीछे सब कुछ छूट जाए। आदित्य को बुलाया गया, उस पर आरोप लगाए गए – वही बातें दोहराई गईं जिन्हें वह बरसों से झेल रहा था। आदित्य ने पूछा कि क्या उसके द्वारा बेची गई जमीन, गिरवी रखे गहने और भूखी रातें भी किसी काम की नहीं थीं? काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। तलाक हो गया। जिस आदमी ने अपनी जमीन बेचकर पत्नी को पढ़ाया, उसी आदमी को पत्नी ने यह कहकर छोड़ दिया कि वह उसके लायक नहीं है।

भाग 4: अकेलापन और जिम्मेदारी

तलाक के बाद आर्या अपनी मां के साथ रहने लगी। आदित्य का कमरा अचानक खाली हो गया। अब वह सुबह उठता, काम पर जाता और रात को उसी खामोशी में लौट आता। कई बार फोन पर आर्या की आवाज सुनाई देती, “पापा कब आओगे?” आदित्य हर बार वही जवाब देता, “जल्दी बेटा,” लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि जल्दी कब आएगा।

उधर काव्या की जिंदगी तेजी से बदल रही थी – ट्रेनिंग, मीटिंग, अफसरों के साथ उठना-बैठना। अब यही उसकी दुनिया थी। वहां बच्चे की रोने की आवाज या घर की जिम्मेदारी के लिए जगह कम थी। धीरे-धीरे आर्या उसे बोझ लगने लगी। सुबह ट्रेनिंग, शाम को पढ़ाई, रात को थकान – इन सबके बीच बच्ची को संभालना उसे मुश्किल लगने लगा। वो खुद से कहती, “अभी करियर की शुरुआत है, सब कुछ एक साथ संभालना आसान नहीं।”

आदित्य से उसका संपर्क बहुत सीमित था। जब बात होती तो बस औपचारिक – आर्या की फीस, डॉक्टर की दवा। आदित्य हर बार पैसे का इंतजाम कर देता, कभी यह नहीं कहा कि उसके पास नहीं है।

भाग 5: रिश्तों की दरार

जॉइनिंग की तारीख नजदीक आने लगी। इसी बीच काव्या के घर वालों ने बात उठाई – अफसर बनने जा रही हो, सिंगल मदर के तौर पर शुरुआत ठीक नहीं लगेगी। पोस्टिंग, ट्रेनिंग, दौरे – इन सब में बच्ची को संभालना मुश्किल होगा। काव्या ने इसे सलाह नहीं, समाधान की तरह लिया। उसने आदित्य को बुलाया, “जॉइनिंग के बाद मैं आर्या को ठीक से समय नहीं दे पाऊंगी। कुछ समय के लिए वो तुम्हारे पास रहे।”

आदित्य कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “कुछ समय या हमेशा?” काव्या ने कोई साफ जवाब नहीं दिया। आदित्य ने गुस्सा नहीं किया, बस इतना कहा, “ठीक है।”

जिस दिन आर्या आदित्य के पास आई, वह बार-बार पूछती रही, “मम्मी कब आएगी?” आदित्य ने बच्ची को सीने से लगाकर कहा, “मम्मी काम पर गई है बेटा।” काव्या बिना ज्यादा रुके चली गई – नई जिंदगी उसका इंतजार कर रही थी।

भाग 6: नई पहचान, नया अकेलापन

अब काव्या की जॉइनिंग हो गई। नई पहचान, नई कुर्सी, नया सम्मान। उसे यह अंदाजा भी नहीं था कि जिन कागजों पर अब उसका नाम लिखा जाएगा, उनके पीछे आज भी आदित्य का नाम छुपा हुआ है।

जॉइनिंग के बाद काव्या की जिंदगी अचानक बहुत तेज हो गई। अब वह वही औरत नहीं थी जो कभी छोटे कमरे में बैठकर रात-दिन पढ़ाई करती थी। नई कुर्सी, नया नाम, नया सम्मान – सब कुछ उसे एक अलग ही दुनिया में ले जा रहा था। लोग अब उससे अलग तरीके से बात करते थे, उसकी मौजूदगी को अहमियत देते थे। धीरे-धीरे उसका व्यवहार बदलने लगा – अब वह कम बोलती थी, लेकिन जब बोलती तो उसमें आत्मविश्वास से ज्यादा सख्ती होती थी। उसे लगता था कि उसे अब हर हाल में मजबूत दिखना है।

आदित्य और आर्या की यादें वह खुद से दूर रखने लगी। उसे लगता था कि अगर वह पीछे देखेगी तो आगे नहीं बढ़ पाएगी। ऑफिस में उसकी पहचान एक नई अधिकारी के रूप में बनने लगी। वही उसकी नजदीकिया एक वरिष्ठ अधिकारी से बढ़ने लगी। वो अधिकारी उम्र में बड़ा था, सिस्टम को अच्छी तरह जानता था और लोगों को इस्तेमाल करना भी। शुरुआत में वह काव्या को गाइड करने के नाम पर उसके पास रहने लगा। काव्या को यह अच्छा लगने लगा – उसे लगा कि अब कोई ऐसा है जो उसकी दुनिया को समझता है।

वह अधिकारी उसे यह महसूस कराता कि आदित्य जैसे लोग उसकी नई जिंदगी के लायक नहीं थे। वह धीरे-धीरे काव्या को अपने हिसाब से ढालने लगा – उसकी सोच, उसके फैसले, यहां तक कि उसके रिश्ते भी। काव्या अब उन्हीं लोगों के बीच रहने लगी जिनके लिए सत्ता, पैसा और फायदा सबसे ऊपर था। वहां रिश्तों की कोई कीमत नहीं थी। वह माहौल उसे बदल रहा था, लेकिन उसे यह बदलाव दिखाई नहीं दे रहा था। उसे लगने लगा कि यही असली दुनिया है और जो पीछे छूट गया वह सिर्फ कमजोरी थी।

भाग 7: असली सच्चाई का सामना

उस अधिकारी ने काव्या का खूब इस्तेमाल किया – अपने काम निकलवाने, अपने नाम को चमकाने और अपने गलत फैसलों की जिम्मेदारी उस पर डालने लगा। काव्या को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि वह सिर्फ एक मोहरा बन रही है। लेकिन तब तक वह उस संगती में काफी आगे बढ़ चुकी थी। इसी दौरान उसकी जिंदगी में लापरवाही बढ़ने लगी। काम में चूक होने लगी। लोगों की नजरें बदलने लगीं। कुछ शिकायतें भी दबे शब्दों में आने लगीं।

काव्या को पहली बार डर महसूस हुआ। उसे लगा कि जिस रास्ते पर वह चल रही है, वह उसे कहीं बहुत गलत जगह ले जा रहा है। उसी समय अचानक उसे आदित्य और आर्या की याद आने लगी। उसे याद आया कि कैसे आदित्य बिना सवाल किए उसके लिए सब कुछ करता रहा। कैसे आर्या उसकी गोद में चुपचाप सो जाया करती थी। यह यादें अब उसे कमजोर नहीं, बल्कि खाली महसूस कराने लगीं।

एक शाम ऑफिस से लौटते हुए उसने अपने फोन में पुरानी तस्वीरें देखीं – वही छोटा कमरा, वही साधारण जिंदगी। उसे एहसास हुआ कि वह जिस ऊंचाई पर खड़ी है, वहां हवा बहुत तेज है और कोई अपना नहीं है। उसी रात उसने पहली बार खुद से सवाल किया – क्या उसने सही रास्ता चुना था? उसे यह नहीं पता था कि जिन सपनों की वजह से उसने सब कुछ छोड़ा, उनकी नींव किसने रखी थी। लेकिन अब उसका मन बेचैन होने लगा था। और यह बेचैनी उसे उस सच्चाई की ओर ले जा रही थी जो बहुत देर से उसका इंतजार कर रही थी।

भाग 8: खोखली चमक

जॉइनिंग के कुछ महीनों बाद काव्या को लगने लगा कि अफसर बनना जितना बाहर से चमकदार दिखता है, भीतर से उतना ही खोखला भी हो सकता है। जिस सम्मान के लिए उसने अपना घर, पति और बच्चा छोड़ा था, वही सम्मान अब उसे हर दिन और अकेला कर रहा था। जिस वरिष्ठ अधिकारी के साथ उसकी नजदीकियां बढ़ी थी, वही अब उसके लिए परेशानी बनने लगा था।

शुरुआत में वह उसे आगे बढ़ने के तरीके सिखाता रहा, लेकिन धीरे-धीरे उसने अपने काम निकलने शुरू कर दिए। जिन फाइलों पर काव्या ने भरोसे से हस्ताक्षर किए, उनकी जिम्मेदारी अब उसी के सिर डाली जाने लगी। जब ऊपर से सवाल आए, तो वही अधिकारी पीछे हट गया। काव्या को पहली बार एहसास हुआ कि वह प्यार या मार्गदर्शन नहीं, बल्कि इस्तेमाल का हिस्सा बन चुकी है।

ऑफिस में अब उसकी छवि बदलने लगी थी। लोग पहले जैसे भरोसे से बात नहीं करते थे। कुछ निगाहों में शक था, कुछ में मजाक। वो हर दिन खुद को साबित करने की कोशिश करती, लेकिन भीतर से टूटती जा रही थी। जिस गलत संगति में वह आ चुकी थी, वहां से निकलना आसान नहीं था।

भाग 9: आदित्य की मजबूती

इन्हीं दिनों आदित्य की जिंदगी भी एक अलग लड़ाई लड़ रही थी। आदित्य अब पूरी तरह अकेला नहीं था, लेकिन जिम्मेदारियों से भरा हुआ था। सुबह वह आर्या को स्कूल छोड़ता, फिर कॉन्ट्रैक्ट नौकरी पर जाता – जहां ना स्थायित्व था, ना सुरक्षा। शाम को लौटकर वही आदमी बेटी के लिए खाना बनाता, उसके कपड़े धोता और होमवर्क कराता। कभी-कभी आर्या चुपचाप पूछ लेती, “पापा, मम्मी अब अफसर बन गई है, वो हमें लेने क्यों नहीं आती?” आदित्य के पास जवाब नहीं होता, वो बस बेटी को अपने सीने से लगा लेता।

एक दिन आदित्य को बैंक से एक और नोटिस मिला। पुराने लोन की किश्तें बढ़ चुकी थी। जमीन तो पहले ही बिक चुकी थी, गहने अब भी गिरवी थे। वह देर तक कागजों को देखता रहा, फिर उन्हें अलमारी में रख दिया। उसने तय किया कि काव्या को इस बारे में कुछ नहीं बताएगा। वो नहीं चाहता था कि उसकी परेशानी उसकी जिंदगी में फिर दखल दे।

भाग 10: सच्चाई का खुलासा

उधर काव्या की हालत और बिगड़ती जा रही थी। वही अधिकारी जिसने उसे सपनों की दुनिया दिखाई थी, अब साफ-साफ उससे किनारा कर रहा था। कुछ मामलों में काव्या को अकेले जवाब देना पड़ रहा था। पहली बार उसे डर लगा कि कहीं वह पूरी तरह फंस ना जाए।

एक रात वह देर तक ऑफिस में बैठी रही। फाइलें खुली थीं, लेकिन नजरें कहीं और थीं। उसे अचानक आदित्य की याद आ गई – वही शांत चेहरा, वही बिना शिकायत वाली आदत। उसे याद आया कि कैसे वह कभी पैसों की कमी की बात नहीं करता था, कैसे हर मुश्किल में सिर्फ यही कहता था – “हो जाएगा।” उसी पल उसे एहसास हुआ कि जिस इंसान को उसने कमजोर समझा था, वही शायद सबसे मजबूत था।

उसने आदित्य का नंबर खोला, नाम स्क्रीन पर चमका, उसकी उंगली कॉल बटन पर रुकी रही, लेकिन उसने कॉल नहीं किया। उसी समय आदित्य घर में बेटी को सुला रहा था। आर्या ने नींद में बुदबुदाया, “मम्मी…” आदित्य ने आंखें बंद कर ली। वह जानता था कि काव्या एक दिन समझेगी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

भाग 11: पछतावे का पल

काव्या अब उस मोड़ पर खड़ी थी जहां आगे सिर्फ गिरावट थी और पीछे वो जिंदगी जिसे उसने खुद छोड़ दिया था। काव्या की जिंदगी अब बाहर से जितनी सजी हुई दिखती थी, भीतर से उतनी ही बिखरी हुई थी। जिस कुर्सी पर बैठकर उसे ताकत महसूस होनी चाहिए थी, वही बैठकर उसे हर दिन डर लगने लगा था। शिकायतों की फाइलें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। जिस अधिकारी पर उसने भरोसा किया था, वह अब साफ शब्दों में कहने लगा था कि उसे अपने फैसलों की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी।

अब काव्या को समझ आने लगा था कि वह गलत संगति में आ चुकी है। लेकिन पीछे लौटने का रास्ता आसान नहीं था। उसके आसपास वही लोग थे जो जरूरत पड़ने पर साथ देते थे और काम निकलते ही दूर हो जाते थे। वह पहली बार खुद को बिल्कुल अकेला महसूस करने लगी।

इन्हीं दिनों एक घटना ने उसे अंदर तक हिला दिया। बैंक से एक कॉल आया – औपचारिक बातचीत थी, लेकिन बातों-बातों में अधिकारी ने कहा कि पुराने लोन की कुछ औपचारिकताएं अभी भी एक्स-हस्बैंड से जुड़ी हुई हैं। काव्या ने चौंक कर पूछा, “कौन सा लोन?” जवाब आया, “मैडम, आपकी पीसीएस की पढ़ाई से जुड़ा लोन और आपकी ज्वेलरी प्लेज से जुड़ी फाइलें भी।”

काव्या के हाथ से फोन फिसलते-फिसलते बचा। उसे अचानक सब कुछ याद आने लगा – वह दिन जब फीस बढ़ी थी, वह समय जब गहने अचानक घर से गायब हो गए थे, वह वाक्य जो आदित्य हर बार कहता था – “किसी तरह हो जाएगा।”

उसने बैंक जाकर फाइलें देखी – जमीन बेचने के कागज, गहनों की रसीदें, लोन की गारंटी, हर जगह एक ही नाम था – आदित्य। उस पल काव्या को पहली बार एहसास हुआ कि जिस आदमी को उसने बेरोजगार और बेकार समझकर छोड़ा था, वही आदमी उसकी पूरी पढ़ाई का बोझ अपने कंधों पर उठाए हुए था। उसने अपने लिए नहीं, उसके सपनों के लिए अपनी जमीन बेच दी थी।

भाग 12: अंतिम सामना

काव्या वही कुर्सी पर बैठ गई, उसके भीतर कुछ टूट गया। उसे आर्या याद आई, उसकी छोटी सी आवाज और वह दिन जब उसने बिना पीछे देखे बेटी को आदित्य के पास छोड़ दिया था। अब उसे समझ आया कि आदित्य ने सिर्फ पति होने का फर्ज नहीं निभाया था, बल्कि पिता और इंसान होने का भी पूरा हक अदा किया था। और उसने सब कुछ कुर्सी और पहचान के लिए कुर्बान कर दिया था।

उस रात काव्या अपने कमरे में देर तक बैठी रही, ना रोई, ना किसी से बात की, बस सोचती रही। उसे वह छोटा सा कमरा याद आया, जहां आदित्य थका हुआ लौट कर भी मुस्कुरा देता था, जहां उसने कभी यह नहीं कहा कि उसके पास कुछ नहीं है।

अब काव्या को पछतावा हो रहा था, लेकिन यह पछतावा किसी से कहा नहीं जा सकता था। अगली सुबह उसने आदित्य का नंबर डायल किया, कॉल गई लेकिन कट गई। उसने दोबारा कॉल नहीं किया। वह जानती थी कि अब बात फोन पर नहीं हो सकती। जो उसने खोया था, उसका सामना करके ही समझा जा सकता था।

उसने फैसला कर लिया था – वो आदित्य से मिलने जाएगी। पछतावे के साथ नहीं, सवालों के साथ नहीं, बल्कि सच्चाई के साथ। और शायद पहली बार बिना किसी कुर्सी, बिना किसी पहचान के।

भाग 13: घर की दहलीज पर

काव्या आदित्य के घर पहुंची तो शाम ढल चुकी थी। दरवाजा खुला था, अंदर से किसी के हंसने की आवाज आ रही थी। उसने कदम रोक लिए – वही आवाज जो उसने बहुत पहले खो दी थी। आर्या जमीन पर बैठी पढ़ाई कर रही थी, आदित्य उसके पास बैठा था, धैर्य से उसे समझा रहा था। दोनों इतने सहज थे कि काव्या को लगा जैसे वो किसी और की दुनिया देख रही हो।

आदित्य की नजर उस पर पड़ी, वो चौंका नहीं, ना गुस्सा दिखाया, ना हैरानी। बस शांत स्वर में बोला, “आ गई।” काव्या के मुंह से शब्द नहीं निकले, उसकी आंखें भर आईं। वह आर्या के पास गई, बेटी ने उसे देखा और फिर आदित्य की ओर देखा। आर्या ने धीरे से पूछा, “पापा, यह मम्मी है ना?” आदित्य ने सिर हिलाया, “हां।”

काव्या वहीं बैठ गई, उसने पहली बार बिना सफाई दिए, बिना बहाने बनाए कहा, “मैं गलत थी।” आदित्य ने कुछ नहीं कहा, उसने ना तो उसे रोका, नहीं दिलासा दिया। थोड़ी देर बाद आदित्य बोला, “जो किया, उसी का बोझ है। मैंने कभी शिकायत नहीं की।”

काव्या समझ गई कि कुछ रिश्ते टूटने के बाद वापस नहीं जुड़ते, बस याद बनकर रह जाते हैं। वो उठी, आर्या के सिर पर हाथ रखा और बिना पीछे देखे चली गई। दरवाजा बंद हुआ। आदित्य ने बेटी को गोद में उठा लिया, आर्या ने सिर उसके कंधे पर रख दिया। आदित्य ने धीमे से कहा, “हम ठीक हैं बेटा।”

भाग 14: कहानी का सबक

कुछ लोग सब कुछ खोकर भी अपनी जिम्मेदारी नहीं खोते। आदित्य ने अपनी जमीन, गहने, सुख सब कुछ काव्या के सपनों के लिए कुर्बान किया, लेकिन खुद कभी शिकायत नहीं की। काव्या ने जो खोया, वह सिर्फ एक पति या एक घर नहीं था, बल्कि उस इंसानियत और प्यार को खो दिया जिसने उसकी जिंदगी की नींव रखी थी।

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जय हिंद।