शीर्षक: “शिखर और शून्य” – एक आईएएस अधिकारी का धर्मयुद्ध
अध्याय १: आगमन और आघात
तीन साल। एक हज़ार निन्यानवे दिन। और अनगिनत रातें।
जब उस नीली सुपरफास्ट एक्सप्रेस ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर चार पर अपनी लोहे की सांसें छोड़ीं, तो हिमांशु शर्मा के मन में यादों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ। खिड़की के बाहर वही शोर था—चाय वालों की पुकार, कुलियों की भागदौड़ और लाउडस्पीकर पर गूंजती यांत्रिक आवाजें। हिमांशु ने अपना बैग कंधे पर लटकाया। उसकी नीली शर्ट पर लगा वह सरकारी बैज उसकी तीन साल की तपस्या का प्रमाण था। वह अब ‘हिमांशु’ नहीं, ‘हिमांशु शर्मा, आईएएस’ था।
लेकिन जैसे ही उसके पैर प्लेटफार्म की कंक्रीट की ठंडी जमीन पर पड़े, उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। इसी प्लेटफार्म पर तीन साल पहले उसकी पत्नी आशा ने उसका हाथ थामकर कहा था, “हिमांशु, ये दिल्ली बड़े लोगों का शहर है, हम जैसे गरीबों को निगल जाता है। मत जाओ।”
हिमांशु ने तब मजबूरी में अपना हाथ छुड़ाया था। उसे ऑफिसर बनना था, गरीबी की बेड़ियाँ तोड़नी थीं। तीन साल तक उसने न दिन देखा न रात। उसने अपने कमरे की दीवार पर आशा की फोटो लगा रखी थी, जिसे देखकर वह अपनी भूख और नींद भूल जाता था। लेकिन पिछले छह महीनों से आशा का फोन बंद था। घर से कोई खत नहीं आता था। उसे लगा शायद आशा नाराज है, या शायद वह अपनी नई जिंदगी में व्यस्त है।
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भीड़ को चीरते हुए हिमांशु आगे बढ़ रहा था कि तभी उसकी नजर प्लेटफार्म के उस अंधेरे कोने पर पड़ी जहाँ समाज के ‘अदृश्य’ लोग रहते हैं—भिखारी, बेघर और लावारिस।
वहाँ एक महिला बैठी थी। फटी हुई मैली साड़ी, उलझे हुए बाल और कांपते हुए हाथ में एक लोहे का कटोरा। उसने अपना चेहरा एक फटी हुई चुनरी से ढका था, लेकिन जब उसने अपनी आवाज उठाई— “बाबूजी, दो दिन से कुछ नहीं खाया, भगवान के नाम पर कुछ दे दो”—तो हिमांशु के कानों में बिजली कौंध गई।
यह आवाज… यह आवाज उसकी रूह में बसी थी। यह आशा थी।
हिमांशु के हाथ से बैग गिर गया। वह घुटनों के बल वहीं बैठ गया। उसने कांपते हाथों से उस महिला का घूंघट उठाया। सामने जो चेहरा था, वह हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था। आशा की वे आँखें, जिनमें कभी सपने तैरते थे, अब केवल गहरी शून्यता और अपमान के आँसू लिए बैठी थीं।
“आशा?” हिमांशु के गले से केवल एक चीख निकली।
आशा ने उसे देखा। उसकी आँखों में पहले पहचान, फिर शर्म और अंत में एक असहनीय दर्द उभरा। उसने अपना कटोरा छोड़ दिया और हिमांशु के पैरों से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी। प्लेटफार्म पर खड़ा हर व्यक्ति सन्न रह गया। एक आईएएस ऑफिसर, जिसके कंधों पर देश की जिम्मेदारी होने वाली थी, वह एक भिखारिन के सामने घुटनों पर था।

अध्याय २: विश्वासघात का अंधेरा
हिमांशु उसे एक पास के गेस्ट हाउस में ले गया। जब आशा ने नहला-धुलाकर साफ कपड़े पहने और थोड़ा भोजन किया, तब उसकी आवाज फूटी।
हिमांशु ने पूछा, “मेरे माता-पिता कहाँ हैं? मनीष भैया और कविता भाभी ने तुम्हारा ध्यान क्यों नहीं रखा?”
आशा की आँखों में फिर से डर समा गया। उसने जो बताया, वह किसी भी इंसान की आत्मा को कंपा देने के लिए काफी था। हिमांशु के जाते ही, उसके बड़े भाई मनीष और भाभी कविता ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया था। मनीष, जो हमेशा हिमांशु की सफलता से जलता था, उसने एक स्थानीय वकील और दलाल के साथ मिलकर एक गहरी साजिश रची।
उन्होंने हिमांशु के अनपढ़ माता-पिता को बताया कि हिमांशु शहर में मुसीबत में है और उसे जमानत दिलाने के लिए संपत्ति के कागजों पर हस्ताक्षर चाहिए। बुजुर्ग माता-पिता ने अपने बेटे को बचाने के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया। धीरे-धीरे मनीष ने पूरी पुश्तैनी जमीन और घर अपने नाम करवा लिया।
जब संपत्ति मनीष के नाम हो गई, तो उसने अपनी क्रूरता की हदें पार कर दीं। उसने अपने बूढ़े माँ-बाप को घर के स्टोर रूम में शिफ्ट कर दिया और उन्हें केवल एक समय का रूखा भोजन देना शुरू किया। आशा ने जब विरोध किया, तो उसे ‘कुलक्षणी’ और ‘बोझ’ कहकर प्रताड़ित किया गया। अंत में, एक रात मनीष ने आशा और अपने ही माँ-बाप को धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया।
आशा ने बताया, “हम दर-दर भटके हिमांशु। तुम्हारे भाई ने गांव के लोगों को बताया कि तुम शहर में किसी और के साथ रहने लगे हो और हमें भूल गए हो। किसी ने हमें आसरा नहीं दिया। अंत में, बाबूजी और माँ की दवाइयों के लिए मुझे स्टेशन पर कटोरा उठाना पड़ा।”
हिमांशु का खून खौल उठा। उसने उसी वक्त मनीष को फोन लगाने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन रुक गया। वह अब सिर्फ एक भाई नहीं था, वह कानून का रक्षक था। उसे न्याय करना था, बदला नहीं।
अध्याय ३: शतरंज की बिसात
हिमांशु ने अपने परिवार को धर्मशाला में सुरक्षित किया और अगले दिन गुपचुप तरीके से अपने गृह जिले की कलेक्ट्रेट पहुंचा। उसे उसी जिले में असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में पोस्टिंग मिली थी। उसने अपनी पहचान गुप्त रखी और सामान्य नागरिक बनकर तहसील कार्यालय पहुंचा।
वहाँ उसने देखा कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। मनीष का वकील, सदानंद, तहसील के कर्मचारियों के साथ मिलकर न केवल हिमांशु के परिवार की, बल्कि गांव के कई अन्य बुजुर्गों की जमीनें भी हड़प चुका था।
हिमांशु ने कलेक्ट्रेट में अपना कार्यभार संभाला। उसकी पहली फाइल वही थी जिसे उसने गुप्त रूप से तैयार किया था— ‘वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति की रक्षा’। उसने एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया।
मनीष को कलेक्ट्रेट से नोटिस मिला। उसे लगा कि यह कोई सामान्य प्रक्रिया है, उसने सोचा कि वह रिश्वत देकर मामला रफा-दफा कर देगा। लेकिन जब वह कलेक्ट्रेट पहुंचा, तो उसके सामने की कुर्सी पर उसका छोटा भाई हिमांशु बैठा था।
मनीष का चेहरा पीला पड़ गया। “हिमांशु? तू… तू ऑफिसर बन गया?”
हिमांशु की आवाज में कोई गुस्सा नहीं था, केवल एक ठंडी गंभीरता थी। “मनीष शर्मा, यहाँ मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ। मैं इस जिले का एसडीएम हूँ। तुम्हारे खिलाफ धोखाधड़ी, बुजुर्गों के उत्पीड़न और जालसाजी के पच्चीस गंभीर मामले दर्ज हैं।”
मनीष ने रोने का नाटक किया, कविता ने आशा के पैर पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हिमांशु अडिग रहा। उसने पुलिस को इशारा किया और मनीष को हथकड़ी पहना दी गई।
अध्याय ४: प्रायश्चित और पुनर्निर्माण (नया अध्याय)
मनीष और कविता को जेल भेज दिया गया, लेकिन हिमांशु का काम अभी खत्म नहीं हुआ था। उसने देखा कि समाज में केवल मनीष जैसे अपराधी ही दोषी नहीं थे, बल्कि वह सिस्टम भी दोषी था जिसने आशा जैसी महिलाओं को भीख मांगने पर मजबूर किया।
हिमांशु ने अपनी पत्नी आशा को फिर से पढ़ने के लिए प्रेरित किया। आशा, जिसने हिमांशु की सफलता के लिए अपनी गरिमा को दांव पर लगा दिया था, अब महिलाओं के लिए एक ‘स्वयं सहायता समूह’ (Self Help Group) की अध्यक्ष बनी। हिमांशु ने सरकारी जमीन पर एक ‘आश्रय सदन’ बनवाया, जहाँ स्टेशन पर रहने वाली लावारिस महिलाओं और बुजुर्गों को छत और काम दिया गया।
उसने अपने पुश्तैनी घर को एक लाइब्रेरी और मुफ्त कोचिंग सेंटर में बदल दिया। उसने वहाँ एक बोर्ड लगवाया— “शिक्षा वह हथियार है, जिससे गरीबी और अन्याय दोनों को मारा जा सकता है।”
अध्याय ५: अंतहीन यात्रा (नया अध्याय)
दो साल बाद, हिमांशु का तबादला दूसरे जिले में हो रहा था। जाने से पहले वह एक बार फिर उसी प्लेटफार्म नंबर चार पर खड़ा था। इस बार वह अकेला नहीं था, उसके साथ आशा थी, जो अब एक आत्मविश्वास से भरी सामाजिक कार्यकर्ता थी।
प्लेटफार्म पर अब भी कुछ लोग भीख मांग रहे थे, लेकिन अब वहाँ एक ‘हेल्प डेस्क’ थी, जो उन्हें सीधे सरकारी आश्रय गृह से जोड़ती थी।
आशा ने हिमांशु का हाथ थामा और पूछा, “हिमांशु, क्या तुम अब भी उन तीन सालों के लिए खुद को दोषी मानते हो?”
हिमांशु ने मुस्कुराकर प्लेटफार्म की ओर देखा। “आशा, वे तीन साल शून्य थे, लेकिन उस शून्य ने ही मुझे अनंत तक पहुँचने की ताकत दी। अगर मैं तुम्हें उस हाल में न देखता, तो शायद मैं भी एक साधारण, फाइलें दबाने वाला अफसर बनकर रह जाता। आज मैं जो भी हूँ, तुम्हारी उस फटी हुई चुनरी और उस खाली कटोरे की बदौलत हूँ, जिसने मुझे सिखाया कि असली सर्विस क्या होती है।”
तभी ट्रेन की सीटी बजी। हिमांशु ने अपने बूढ़े माता-पिता को कोच में बिठाया। मनीष अभी भी जेल में अपनी सजा काट रहा था, लेकिन हिमांशु ने सुनिश्चित किया था कि मनीष के बच्चों की शिक्षा का खर्च सरकारी फंड से मिलता रहे। उसने नफरत को नफरत से नहीं, बल्कि सुधार से काटा था।
ट्रेन चल पड़ी। हिमांशु ने खिड़की से प्लेटफार्म को ओझल होते देखा। वह प्लेटफार्म जहाँ से एक भिखारी की पत्नी ने एक ऑफिसर की दुनिया बदल दी थी।
निष्कर्ष: मानवता का संदेश
यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता केवल पद या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का नाम नहीं है। सफलता का असली अर्थ तब है जब आप अपनी शक्ति का उपयोग उन लोगों को उठाने में करें जो धूल में पड़े हैं। हिमांशु ने न केवल अपनी पत्नी की गरिमा वापस लौटाई, बल्कि उस पूरे समाज को आईना दिखाया जो गरीबों को अदृश्य समझकर छोड़ देता है।
इंसानियत आज भी वहीं खड़ी है, बस उसे देखने के लिए एक संवेदनशील ऑफिसर की आँखों की ज़रूरत है।
समाप्त
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