कनाडा जा रही मां के बैग से जो मिला, एयरपोर्ट पर मौजूद पुलिस भी हैरान रह गई!
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अधूरा सफर: कानून की बेड़ियाँ और एक टूटता सपना
1. घर का उत्सव और सुनहरी उम्मीदें
पंजाब के मोगा जिले के एक छोटे से गाँव में 65 वर्षीय सुरजीत कौर का घर खुशियों से सराबोर था। आँगन में टेंट लगा था, पड़ोस की औरतें लोकगीत गा रही थीं और हलवाई बड़े-बड़े कड़ाहे में जलेबियाँ तल रहा था। मौका ही कुछ ऐसा था। सुरजीत कौर का कनाडा का ‘सुपर वीजा’ लग गया था। वह अपने इकलौते बेटे कुलविंदर के पास हमेशा के लिए टोरंटो जा रही थी।
सुरजीत के चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी, लेकिन उस चमक के पीछे एक गहरा राज भी छिपा था। गाँव वालों के लिए वह एक ऐसी माँ थी जो अपने पोते-पोतियों के साथ बुढ़ापा बिताने जा रही थी, लेकिन सुरजीत के मन के किसी कोने में एक डर बैठा था। वह डर था उस पुराने पुलिस केस का, जिसे उसने सालों से नजरअंदाज किया था। उसने सोचा था, “मैं एक बुजुर्ग महिला हूँ, पुलिस को मेरी क्या परवाह होगी? और एक बार मैं सात समंदर पार पहुँच गई, तो ये कचहरियाँ और समन मेरा क्या बिगाड़ लेंगे?”
उसने अपना कीमती सामान समेटा—बेटे के लिए पंजाब की मिट्टी की खुशबू वाले अचार, पोते के लिए हाथ से बुने स्वेटर और अपनी यादें। उसे लगा कि वह अपने अतीत से भाग रही है, लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि अतीत साये की तरह साथ चलता है।

2. दिल्ली की चकाचौंध और आखिरी विदाई
गाड़ियों का काफिला दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI) पहुँचा। टर्मिनल-3 की नीली-सफेद रोशनी और वहाँ की भव्यता देखकर सुरजीत कौर का दिल बाग-बाग हो गया। उसके रिश्तेदारों ने उसे विदाई दी, गले लगाया और रोते हुए अच्छे सफर की दुआ दी। सुरजीत ने इमिग्रेशन काउंटर की ओर कदम बढ़ाए। उसके हाथ में बोर्डिंग पास था—वह कागज का टुकड़ा जो उसे एक नई दुनिया में ले जाने वाला था।
चेक-इन काउंटर पर सब कुछ सामान्य था। एयरलाइन कर्मियों ने उसका पासपोर्ट देखा, बैग जमा किए और उसे ‘शुभ यात्रा’ कहा। सुरजीत को लगा कि उसने आधी जंग जीत ली है। अब बस एक आखिरी बाधा थी—इमिग्रेशन।
3. लाल रंग का वह घातक अलर्ट
जब सुरजीत कौर इमिग्रेशन अफसर के सामने पहुँची, तो उसने मुस्कुराकर अपना पासपोर्ट दिया। अफसर ने पासपोर्ट को स्कैन किया और कंप्यूटर पर कुछ टाइप करने लगा। अचानक, कंप्यूटर की स्क्रीन पर एक लाल रंग का बॉक्स (Red Alert) चमका। अफसर के माथे पर सिलवटें आ गईं। उसने एक बार सुरजीत को देखा और फिर स्क्रीन को।
“माताजी, आप एक मिनट यहाँ बैठिए। हमें कुछ कागजात की जाँच करनी है,” अफसर ने बड़े ही शांत लेकिन सख्त लहजे में कहा।
सुरजीत के हाथ-पांव ठंडे होने लगे। “बेटा, कोई दिक्कत है क्या? मेरा जहाज छूट जाएगा,” उसने कांपती आवाज में कहा।
अफसर ने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि अपने सीनियर को बुला लिया। दरअसल, सुरजीत कौर के खिलाफ पंजाब पुलिस ने ‘लुक आउट सर्कुलर’ (LOC) जारी करवाया हुआ था। वह अदालत की नजर में एक ‘भगोड़ा अपराधी’ (Proclaimed Offender) थी।
4. अतीत का काला साया: वह अनसुलझा जुर्म
सुरजीत कौर की गिरफ्तारी का कारण कोई आतंकवादी गतिविधि या तस्करी नहीं थी, बल्कि एक उलझा हुआ पारिवारिक विवाद था। सालों पहले, उसके छोटे बेटे की शादी के दौरान दहेज उत्पीड़न (Section 498A) और संपत्ति की धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ था। सुरजीत उस मामले में मुख्य आरोपी थी। शुरुआत में तो वह अदालत गई, लेकिन फिर उसने और उसके परिवार ने कानून को हल्के में लेना शुरू कर दिया।
वे तारीखों पर नहीं गए। समन आते रहे और डस्टबिन में जाते रहे। उन्हें लगा कि भारतीय कानूनी प्रणाली इतनी धीमी है कि कोई उन्हें पकड़ नहीं पाएगा। जब आरोपी बार-बार बुलाने पर भी नहीं आता, तो अदालत उसे ‘भगोड़ा’ घोषित कर देती है। सुरजीत कौर यही भूल कर बैठी थी। उसने सोचा था कि उम्र का फायदा और विदेश जाने की जल्दी उसे बचा लेगी।
5. सपनों का कत्ल और हथकड़ी की खनक
जब दिल्ली पुलिस के अधिकारी वहाँ पहुँचे, तो हवाई अड्डे का वह हिस्सा जो थोड़ी देर पहले तक खुशियों से भरा था, सन्नाटे में डूब गया। “सुरजीत कौर, आप हिरासत में हैं। आप कनाडा नहीं जा सकतीं,” पुलिस वाले ने कहा।
सुरजीत वहीं फर्श पर बैठ गई और जोर-जोर से रोने लगी। “मेरा बेटा इंतज़ार कर रहा है! मेरी टिकट के लाखों रुपए डूब जाएंगे! मुझे जाने दो, मैं एक बीमार बुढ़िया हूँ!” उसकी चीखें टर्मिनल की दीवारों से टकराकर वापस आ रही थीं। लेकिन कानून की अपनी भाषा होती है।
हवाई अड्डे पर मौजूद अन्य यात्री भी यह देखकर दंग थे। जिस माँ को खुशी-खुशी विदा किया जाना था, उसे अब दो महिला पुलिसकर्मी पकड़कर थाने ले जा रही थीं। बाहर खड़े उसके रिश्तेदार, जो उसे उड़ते हुए देखने का इंतज़ार कर रहे थे, उन्हें जब यह खबर मिली तो मानो उनके सिर पर आसमान टूट पड़ा।
6. परिणाम: एक विनाशकारी अंत
सुरजीत कौर को दिल्ली के एक स्थानीय थाने में ले जाया गया। वह रात उसके जीवन की सबसे लंबी और खौफनाक रात थी। जहाँ उसे टोरंटो की ठंडी हवाओं के बीच मखमली बिस्तर पर होना था, वहाँ वह थाने की सीमेंट की बेंच पर बैठी मच्छर काटते हुए अपनी गलती पर पछता रही थी।
अगले दिन पंजाब पुलिस की एक टीम दिल्ली पहुँची। उन्हें ‘ट्रांजिट रिमांड’ पर सुरजीत को वापस पंजाब ले जाना था। जब वह अपने ही गाँव के थाने में लाई गई, तो वह बदनामी का बोझ उसके बुढ़ापे को और झुका गया। पूरे गाँव में चर्चा थी—”कनाडा जाने वाली माता जेल पहुँच गई।”
इस घटना के गंभीर परिणाम कुछ इस प्रकार रहे:
आर्थिक तबाही: कनाडा की टिकट, वीजा फीस और वकीलों के खर्च में परिवार के करीब 10-15 लाख रुपए बर्बाद हो गए।
कानूनी पेचीदगियां: एक बार भगोड़ा घोषित होने के बाद, जमानत मिलना लगभग असंभव हो गया। उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, जिसका मतलब था कि वह शायद अब कभी विदेश नहीं जा पाएगी।
पारिवारिक बिखराव: कनाडा में बैठा उसका बेटा और बहू गहरे मानसिक तनाव में आ गए। जिस खुशी के लिए उन्होंने सालों इंतज़ार किया था, वह अब एक कानूनी लड़ाई में बदल गई थी।
चरित्र पर दाग: सुरजीत की बाकी की जिंदगी अब कचहरियों के चक्कर काटते हुए कटेगी।
7. निष्कर्ष: एक कड़वा सबक
सुरजीत कौर की कहानी हमें एक बहुत बड़ा सबक देती है। हम अक्सर सोचते हैं कि कानून को धोखा देना आसान है, खासकर अगर हम बुजुर्ग हैं या हमारा कोई रसूख है। लेकिन आज के डिजिटल युग में, आपका हर रिकॉर्ड एक क्लिक की दूरी पर है।
अगर सुरजीत ने समय रहते अदालत का सामना किया होता, अपने वकील के माध्यम से केस को निपटाया होता और अनुमति लेकर विदेश जाने की अर्जी दी होती, तो आज वह अपने पोते-पोतियों के साथ कनाडा में होती। लेकिन ‘शॉर्टकट’ और ‘कानून से भागने’ की उसकी प्रवृत्ति ने उसे वहां पहुँचा दिया जहाँ से वापसी का रास्ता बहुत कठिन है।
याद रखें, हवाई अड्डा कोई भागने का रास्ता नहीं है, बल्कि यह वह जगह है जहाँ कानून की सबसे पैनी नजर होती है। अपने अतीत को सुलझाए बिना भविष्य की इमारत खड़ी करना रेत पर महल बनाने जैसा है।
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