मां-बाप का दर्द: गौरी देवी की कहानी
क्या आपने कभी एक मां को अपने ही बेटे के सामने हाथ जोड़ते देखा है? सोचिए, वह मां जिसने अपनी कोख से जन्म दिया, चलना सिखाया, बोलना सिखाया, वही आज अपने बेटे से दो प्यार भरे शब्दों की भीख मांग रही है। ना कोई गुनाह, ना कोई गलती, बस उम्र हो गई थी, बूढ़ी हो गई थी। लेकिन जिस बेटे के लिए उसने सब कुछ कुर्बान किया, वही उसे बोझ कह रहा है, अपमानित कर रहा है।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि कड़वी सच्चाई है जो शायद आपके आसपास भी छुपी है। यह कहानी है उत्तर प्रदेश के लखनऊ की, जहां एक घर के बरामदे में एक बूढ़ी मां बैठी थी। नाम था गौरी देवी। कांपते हाथ, आंखों में चुप्पी और पास में रखी अपनी थाली जिसमें बस दो सूखी रोटियां, थोड़ा नमक और हरी मिर्च का टुकड़ा। उसी वक्त उनका बेटा अभिषेक गुस्से से बाहर आया और बिना कुछ कहे उनकी थाली उनके हाथों से छीन लिया।
गौरी देवी हक्की बक्की रह गईं, लेकिन उन्होंने गुस्सा नहीं किया। वो मां थी। बस धीमे से बोलीं, “बेटा, जानवर भी अपने सामने से किसी की थाली नहीं छीनते, और मैं तो तेरी मां हूं।” उनकी आंखों से आंसू बह निकले। “क्या मैंने तुझे इसलिए पाला, बड़ा किया, पढ़ाया ताकि तू एक दिन अपनी मां को जाहिल और बोझ समझे?”
गौरी देवी जी तीन दिन से बुखार में थीं। कई बार बेटे से डॉक्टर के पास ले चलने या दवा लाने की फरियाद की, लेकिन बेटे ने अनसुना कर दिया। बहू से भी कहा, लेकिन उसने तो बात तक नहीं की। खाना नहीं दिया, दवा नहीं दी। आज थोड़ी तबीयत ठीक लगी तो बरामदे में बैठ गईं, पर बहू ने बर्तन मांजने को कह दिया। जब मना किया तो बहू ने शिकायत कर दी, बेटा बरस पड़ा।
गौरी देवी की आंखों में सिर्फ ममता थी। थाली की ओर देखती हुई धीमे से बोलीं, “यह खाना तो मैंने खुद लिया है, बेटा। बहुत थोड़ा है, अगर खा लूंगी तो तेरा कुछ नहीं घटेगा। अपनी बूढ़ी मां पर थोड़ी सी दया रख।”
इसी वक्त पड़ोस से उनकी पुरानी सहेली लता जी आ गईं। वे तेज कदमों से आईं और सामने का दृश्य देखकर ठिटक गईं। अभिषेक हाथ में थाली लिए खड़ा था और गौरी देवी झुकी आंखों से उसे देख रही थीं। अभिषेक माहौल संभालते हुए बोला, “मां, आप तो नाराज हो जाती हैं। देखिए, जो सब्जी मंगाई थी वो ले आया हूं। और बताइए कैसी बनी है आज की सब्जी?” इतना कहकर वह लता जी को अंदर आने को कहकर अपने कमरे में चला गया।
लता जी सब समझ रही थीं। वे सिर्फ पड़ोसी नहीं, बल्कि गौरी देवी की छाया थीं। जब भी उन्हें लगता कि गौरी पर कोई जुल्म हो रहा है, वे बहाने से ही सही, उनके घर आ जाती थीं।
असल में गौरी देवी को शहर बुलाया गया था जब अभिषेक की पत्नी सोनाली की डिलीवरी होने वाली थी। गौरी का पति मोहनलाल गांव में रहते और खेती का काम देखते थे। उनके पास गन्ने, आलू और सब्जियों की खेती थी जिससे ठीक-ठाक आमदनी हो जाती थी। मोहनलाल बेटे अभिषेक की हर जरूरत पर पैसे भेजते रहते थे। अभिषेक भी जब-जब चाहा, बहाने बनाकर उनसे मदद मांगता रहा—कभी किराए का बहाना, कभी दवा का, कभी नौकरी छूटने का। लेकिन ना अभिषेक को कभी पिता की मेहनत का मान रहा और ना मां के त्याग का। उसे लगता मां-बाप का फर्ज है सब कुछ करना।
एक दिन सोनाली ने बेटे को जन्म दिया। गौरी देवी ने खुशी से कहा, “हमारे घर सूरज आया है। इसका नाम सूरज ही रखेंगे।” घर में रौनक छा गई। रंगोली बनी, आंगन में दीप जले, मिठाई बंटी। लेकिन जब गौरी जी ने बहू से पूछा, “बताओ तुम्हें स्वागत कैसा लगा?” सोनाली ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “ठीक ही था, हमारे घर में तो इससे भी ज्यादा होता है।”
गौरी जी का चेहरा बुझ गया। उन्होंने कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर बाद सोनाली बोली, “मम्मी जी, अस्पताल का खाना तो बेस्वाद था, आज कुछ मसालेदार बना दीजिए।” गौरी जी बोलीं, “बहू, डिलीवरी के तुरंत बाद सादा खाना ही ठीक होता है। बच्चा अभी दूध पीता है, चटपटा खाना ठीक नहीं रहेगा।” लेकिन सोनाली हंस दी, “मम्मी जी, आप तो गांव वाली हो। आपको क्या पता अब क्या खाना चाहिए। जैसा कह रही हूं वैसा ही बनाइए, वरना मैं अभिषेक से कह दूंगी कि आप मेरा ख्याल नहीं रख रही हैं।”
गौरी जी जानती थीं, अभिषेक बिना सच जाने बहू की हर बात मान लेता है। इसलिए उन्होंने चुपचाप बहू की पसंद का खाना बना दिया। उस दिन सोनाली ने जी भर कर खाया, बोली, “मम्मी जी, पेट तो भर गया लेकिन मन नहीं भरा।” लेकिन वही रात नई मुसीबत लेकर आई। सूरज का रोना शुरू हो गया, बार-बार पोटी करने लगा और सोनाली को उल्टी-दस्त शुरू हो गए। अब उसे समझ आया कि मसालेदार खाने से गलती हुई। लेकिन अपनी गलती मानने के बजाय वह गौरी देवी पर ही भड़क गई, “आपने धूप में बाल सफेद किए हैं क्या? मुझे ही चटपटा खिला दिया। मना भी कर सकती थीं। कैसी मां हैं आप? बस गवार हो एकदम।”
अभिषेक को भी बहू ने भड़का दिया। “मम्मी ने ध्यान नहीं रखा। आप कुछ बोलते क्यों नहीं?” और अभिषेक बिना कुछ समझे, मां की थाली उठाकर छीन लाया। गौरी देवी ने कुछ नहीं कहा। उनके चेहरे पर बस चुप्पी थी, वो चुप्पी जो एक मां तब ओढ़ लेती है जब उसे अपने ही बच्चे से तिरस्कार मिलता है।
रात बीत गई, सुबह हुई। सोनाली की तबीयत और बिगड़ गई थी। बच्चा सूरज भी गोद में आते ही फिर से रोने लगा। गौरी देवी पास ही बैठी थीं, बच्चे को गोद में लिया, उसकी पीठ सहलाई और सुलाने की कोशिश की। उधर अभिषेक ऑफिस जाने की तैयारी में था। तभी फिर से सोनाली चिल्लाई, “मम्मी जी, आप जानती थीं कि मसालेदार खाना नुकसान करेगा, फिर भी खिलाया। अब देखिए मेरी और बच्चे की हालत।” अभिषेक वहीं से सुन रहा था। उसने भी बिना पूछे झल्लाते हुए कहा, “मां, आपको समझ नहीं आता क्या? बहू नई मां बनी है, उसका ख्याल रखना आपकी जिम्मेदारी थी और आप उल्टा उसे ही बीमार कर दिया।”
गौरी देवी सब सुनती रहीं, बस एक ही बात कहती रहीं, “बेटा, मैंने वही बनाया जो तुम दोनों ने कहा। मुझे डर था कि अगर मना कर दूं तो तुम मुझ पर ही चिल्लाओगे।” लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी।
दोपहर को गांव से एक गाड़ी आकर घर के सामने रुकी। मोहनलाल जी, गौरी देवी के पति, बड़ी बोरी और दो थैले लेकर उतरे। उनके चेहरे पर खुशी थी—पोते को पहली बार देखने की उमंग, बेटे से मिलने की उम्मीद। गौरी देवी ने जब उन्हें देखा तो आंखें भर आईं। “आप आ गए!” मोहनलाल मुस्कुराए, “हां, गौरी, पोते की किलकारी सुने बिना रहा नहीं गया। सोचा कुछ फल-फ्रूट और गांव की बनी चीजें लेकर आ जाऊं।”
अभिषेक दरवाजे पर आया, पिता के हाथ में थैले और बोरी देखकर आंखें चमक उठीं। “पापा, आप तो खुद आ गए! इतनी सारी चीजें लाने की क्या जरूरत थी?” मम्मी को चाय बनाने को कहा। गौरी देवी चुपचाप रसोई में चली गईं।
मोहनलाल जी ने पास आकर पूछा, “सब ठीक तो है ना गौरी? तुम्हारा चेहरा बुझा लग रहा है।” गौरी देवी की आंखें फिर भर आईं। “कुछ नहीं, बस थोड़ा बुखार था। अब ठीक हूं।” लेकिन मोहनलाल सब समझ गए थे। उन्होंने उनकी हथेली थामी और बोले, “गौरी, तुम आंखें झुका सकती हो पर सच नहीं छुपा सकती। क्या हुआ है यहां?” गौरी देवी फफक पड़ीं और धीरे-धीरे बेटे-बहू का सारा व्यवहार बता दिया।
मोहनलाल सुनते रहे और उनका चेहरा तमतमाता रहा। “अभिषेक, सोनाली, इधर आओ।” दोनों आ गए। “गौरी तुम्हारी मां है, इस घर की लक्ष्मी है। जिस दिन तुमने इनका अपमान किया, उस दिन अपनी ही नींव खोद ली। तुम जिस आलीशान मकान में रहते हो, उसकी एक-एक ईंट में हमारे खून-पसीने की कमाई लगी है। जिस दिन तुम पैदा हुए थे, उसी मां ने पूरे गांव में लड्डू बांटे थे। और आज तुम इसी मां को बर्तन माजने को कह रहे हो।”
सोनाली ने झुकी नजरों से माफी मांगी, “पापा जी, मम्मी जी, माफ कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।” मोहनलाल बोले, “माफी मुझसे नहीं, गौरी से मांगो।” दोनों गौरी देवी के पैरों में गिर पड़े। गौरी ने तुरंत ही दोनों को उठाया और गले लगा लिया। “बच्चों, मां कभी अपने बच्चों से ज्यादा देर नाराज नहीं रह सकती। बस अब और मत दुख देना।”
लग रहा था जैसे घर में शांति लौट आई हो। लेकिन शायद यह उनकी ममता का भ्रम था। अगले ही दिन सोनाली रसोई में थी। गौरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बहू, चाय मैं बना देती हूं, तुम आराम करो।” सोनाली ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “नहीं मम्मी जी, आप पापा जी के पास बैठिए, मैं बना देती हूं।” गौरी देवी को अच्छा लगा।
थोड़ी देर बाद मोहनलाल बोले, “गौरी, जरा एक गिलास गर्म पानी लाओ।” गौरी देवी रसोई की ओर गईं। उन्होंने देखा सोनाली चाय के कप में चम्मच चला रही थी और किसी दवा जैसी चीज मिला रही थी। गौरी देवी रुक गईं, कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
चाय आई। दोनों ने चाय पी और फिर बस कुछ ही मिनटों में शरीर भारी होने लगा। पलकें झुकने लगीं। और देखते ही देखते वे वही बेंच पर सो गए। अभिषेक घर लौटा, देखा कि मां-बाप बेसुद पड़े हैं। सोनाली बोली, “पता नहीं जी, कब से सोए हुए हैं। शायद थक गए होंगे।”
रात बीत गई। सुबह होने तक दोनों को थोड़ा होश आया। लेकिन शरीर ढीला था, दिमाग सुस्त। गौरी देवी को याद आया, वह आवाज, वह दवा जैसी चीज, वह मिलाई गई चाय। तभी वह पानी लेने रसोई में गई। बेटे-बहू को बात करते सुना। सोनाली कह रही थी, “अब यह दोनों किसी काम के नहीं रहे, एक बाई रख लेंगे। इतने पैसे इन दो बूढ़ों पर खर्च करने से अच्छा है किसी बाहर वाली को पैसा दे दिया जाए।” अभिषेक बोला, “पर उन्हें घर से कैसे निकाले?” सोनाली बोली, “घर से तो नहीं निकाल सकते, लेकिन इस दुनिया से तो जा सकते हैं ना।”
गौरी देवी वहीं रुक गईं। पैरों तले जमीन खिसक गई। सासें तेज हो गईं और लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे में लौट आईं। मोहनलाल को धीरे से बताया। मोहनलाल बोले, “अब एक पल भी इस घर में नहीं रुकेंगे। अभी रात को ही निकल चलते हैं और अपने गांव लौट चलते हैं।”
रास्ते में एक ऑटो वाला मिला। उसने झुककर हाथ जोड़ते हुए कहा, “आपने पैसे नहीं दिए, इज्जत दी।” गौरी देवी की आंखें नम हो गईं। “जब अपने ही पराए हो जाएं तो पराए ही सहारा बनते हैं।”
गांव लौटने के बाद खेती अब उतनी उपज नहीं दे रही थी और शरीर उतना मेहनत नहीं कर पा रहा था। पैसों की तंगी थी लेकिन इज्जत बची थी। एक दिन होटल के बाहर बोर्ड देखा—वर्कर चाहिए। मोहनलाल बोले, “गौरी, तुम अच्छा खाना बनाती हो, मैं हिसाब संभाल लूंगा।” होटल मालिक रमेश जी ने दोनों की आंखों में इंसानियत देख ली और काम पर रख लिया।
कुछ ही महीनों में होटल का चेहरा बदल गया। रमेश जी बोले, “दादा जी, आपके नाम पर होटल खोलते हैं—गौरी भोजनालय।” नया रेस्टोरेंट खुला, फूल बरसे, तालियां बजीं। लेकिन गौरी देवी की आंखें उस कोने की ओर थीं, जहां अभिषेक और सोनाली फटे कपड़ों में, पछतावे के साथ खड़े थे। उनके पास अब कुछ नहीं था—ना घर, ना गहने, ना जमीन, बस भूख, गलती और पछतावा।
रात में जब गौरी और मोहनलाल गरीबों को खाना बांट रहे थे, उसी लाइन में उनके बेटे-बहू खड़े थे। गौरी देवी के हाथ कांपे, लेकिन एक थाली भर दी। “खाइए।” सोनाली कांपते हाथों से थाली ली और घुटनों पर गिर गई, “मम्मी जी, पापा जी, हमने बहुत गलती की, क्या आप हमें फिर से अपना सकते हैं?”
मोहनलाल बोले, “हमने तो कभी तुम्हें छोड़ा ही नहीं था, तुम ही थे जो हमें बीच रास्ते छोड़ गए थे।” गौरी देवी चुप रहीं, आंखों में अब गुस्सा नहीं था, लेकिन भरोसा भी नहीं बचा था। अभिषेक कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द नहीं निकले।
कुछ देर बाद उनका पोता सूरज चुपचाप लौट आया। “दादी, क्या मैं आपके पास रह सकता हूं?” गौरी देवी ने उसे गले से लगा लिया। “हां बेटा, तू जहां चाहे वही हमारा घर है।” सूरज ने कहा, “अब मैं कभी आपसे दूर नहीं जाऊंगा।” गौरी देवी की आंखों से आंसुओं की जगह सुकून टपकने लगा।
मोहनलाल ने ईश्वर को देखा और आंखें बंद कर ली। “आज हमने सब कुछ पा लिया—रिश्ते, आदर और एक सच्चा पोता जो कभी हमारा साथ नहीं छोड़ेगा।” और उधर बेटा-बहू भीड़ से दूर एक कोने में बैठे चुपचाप रोते रहे। वो रोना अब किसी को बुलाने के लिए नहीं था, वो रोना पछतावे का था कि जिस मां-बाप को एक वक्त की रोटी तक नहीं दी, आज उन्हीं के हाथ से खाना मांगना पड़ रहा है।
दोस्तों, मां-बाप को खो देना सबसे बड़ी गरीबी है। क्या आपने कभी किसी मां-बाप को अपने बच्चों से तिरस्कार सहते देखा है? क्या आपको लगता है वक्त हर जुल्म का हिसाब देता है? नीचे कमेंट करके जरूर बताइए और कहानी पसंद आई है तो इसे औरों तक पहुंचाएं।
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