साधारण फ़ौजी समझकर सताया, पता नहीं था कि मौसी मेजर जनरल है।
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अध्याय तीन: झूठ के पीछे छिपा सच
अंजलि शर्मा चुपचाप प्रिया को देखती रहीं। वर्षों की सैन्य सेवा ने उन्हें सिखाया था कि शरीर से अधिक आँखें सच बोलती हैं।
प्रिया की आँखें काँप रही थीं।
“तुम मुझसे झूठ बोल रही हो,” अंजलि ने धीमे कहा।
प्रिया कुछ पल चुप रही। फिर उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह टूट गई।
उसने बताया कि कैसे ट्रेनिंग के नाम पर उसे बार-बार अपमानित किया गया, कैसे कुछ सीनियरों ने उसे ‘औकात’ दिखाने की कोशिश की, और कैसे एक दिन जानबूझकर उसे चोटिल कर दिया गया।
“मैं नहीं चाहती थी कि आपको पता चले,” प्रिया ने सिसकते हुए कहा,
“मैं चाहती थी कि मैं खुद लड़ूँ।”
अंजलि ने उसे गले लगा लिया।
“अन्याय अकेले नहीं लड़ा जाता, प्रिया,”
“और चुप रहना कभी बहादुरी नहीं होता।”
उस रात, मौसी नहीं—एक कमांडर जाग चुकी थी।
अध्याय चार: जब कमांडर ने क़लम उठाई
अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही अंजलि अपने कार्यालय में थीं।
उन्होंने कोई गुस्से भरा आदेश नहीं दिया।
उन्होंने क़ानून का रास्ता चुना — लेकिन पूरी ताक़त के साथ।
एक गोपनीय जाँच शुरू हुई।
ट्रेनिंग लॉग्स, मेडिकल रिपोर्ट्स, सीसीटीवी फुटेज, और गवाहों के बयान—
हर परत को खोला गया।
जो सामने आया, वह केवल प्रिया की कहानी नहीं थी।
वह एक पूरी यूनिट में फैले भय, उत्पीड़न और चुप्पी की कहानी थी।
कुछ लोग सत्ता का दुरुपयोग कर रहे थे।
और बाकी डरकर चुप थे।

अध्याय पाँच: जब सच बोलने की हिम्मत आई
जाँच के दौरान पहली बार किसी ने खुलकर बोला।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
जो सैनिक वर्षों से अपमान सहते आ रहे थे, उन्होंने महसूस किया कि
अब उनकी बात सुनी जाएगी।
कमांडिंग ऑफिसर को निलंबित किया गया।
दोषी एनसीओज़ पर कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू हुई।
किसी को बचाया नहीं गया।
किसी पर निजी कृपा नहीं की गई।
अंजलि ने केवल इतना कहा:
“सेना ताक़त से नहीं, न्याय से खड़ी रहती है।”
अध्याय छह: प्रिया का सामना
जब सब कुछ सामने आ चुका था,
प्रिया को बुलाया गया।
वह डर रही थी—
न अपने दोषियों से,
बल्कि इस बात से कि लोग उसे क्या समझेंगे।
अंजलि ने उसका हाथ थाम लिया।
“तुम कमजोर नहीं हो,”
“तुमने सच सहा है। और अब सच बोलेगा।”
उस दिन पहली बार
प्रिया ने महसूस किया कि
न्याय केवल सज़ा नहीं होता—
न्याय सुरक्षा भी होता है।
अध्याय सात: नई शुरुआत
अल्फ़ा यूनिट को भंग कर पुनर्गठित किया गया।
नए अधिकारी, नई प्रशिक्षण प्रणाली, और एक स्पष्ट संदेश—
कोई भी वर्दी पहनकर इंसानियत से ऊपर नहीं है।
प्रिया की मेडिकल रिकवरी लंबी थी,
लेकिन उसकी आत्मा पहले से अधिक मज़बूत थी।
एक दिन, उसने फिर से परेड ग्राउंड में कदम रखा।
बैसाखी के बिना।
सिर ऊँचा।
अंतिम अध्याय: मौसी और सैनिक
अंजलि शर्मा ने अपनी वर्दी पर लगे सितारों को देखा।
उन्हें कभी इतने भारी नहीं लगे।
उन्होंने सोचा—
“अगर मेरी शक्ति किसी एक सैनिक को भी सुरक्षित कर सके,
तो यह पद सार्थक है।”
प्रिया ने उन्हें सैल्यूट किया।
यह केवल एक सैल्यूट नहीं था।
यह भरोतसा था।
यह न्याय था।
यह भविष्य था।
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