करोडपति लडका गरीब का भेष बना कर अपने घर आया… फिर घर वालों ने जो किया 😱

असली अमीरी
भाग 1: जर्जर मकान और तिरस्कृत बचपन
शहर के पुराने हिस्से की वह तंग गली आज भी वैसी ही थी—धूल से भरी, बिजली के लटकते तारों का जाल और शोर मचाते बच्चे। गली के अंत में वह दो मंजिला पीला मकान खड़ा था, जिसके जंग लगे ताले और उखड़े हुए पेंट ने न जाने कितने सालों की बेरुखी देखी थी।
यही वह घर था जहाँ 12 साल का अर्जुन अपने चाचा और ताऊ के साथ रहता था। कुछ साल पहले तक अर्जुन की दुनिया खुशहाल थी। उसके माता-पिता बहुत अमीर तो नहीं थे, पर उनका प्यार किसी खजाने से कम न था। फिर एक काली शाम आई, जब एक सड़क हादसे ने अर्जुन से सब कुछ छीन लिया। रिश्तेदारों के बीच तमाशा हुआ—कोई कहता हमारे पास जगह नहीं, कोई कहता अपने बच्चों का बोझ कम है क्या? अंत में, मजबूरी और ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से चाचा और ताऊ ने उसे अपने घर में एक कोने वाला छोटा कमरा दे दिया।
लेकिन वह कमरा सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि रोज मिलने वाले तानों का केंद्र बन गया।
“अर्जुन! उठ गया? पहले बाल्टी भर नल से पानी ला, फिर स्कूल वूल देखेंगे,” चाची की कड़क आवाज रोज सुबह उसकी नींद तोड़ती। जब तक चाचा के बच्चे चाय-बिस्किट का आनंद लेते, अर्जुन टूटी चप्पल पहनकर गली के सार्वजनिक नल पर लाइन में खड़ा होता।
खाने की मेज पर भी भेदभाव स्पष्ट था। कजिंस के लिए गरम रोटियां और घी वाली दाल होती, जबकि अर्जुन की प्लेट में अक्सर बचा-कुचा खाना या सूखी रोटियां होतीं। अगर वह कभी कुछ ज्यादा माँग लेता, तो चाची का ताना तैयार रहता—”मुफ्त का खाता है, एहसान नहीं समझता! सारा राशन अकेले यही चट कर जाएगा क्या?”
भाग 2: मेधावी मस्तिष्क और अपमान का घूँट
भले ही अर्जुन को घर में प्यार नहीं मिला, पर ईश्वर ने उसे एक कुशाग्र बुद्धि दी थी। वह मोहल्ले के छोटे से सरकारी स्कूल में पढ़ता था, जबकि उसके कजिंस महंगे प्राइवेट स्कूलों में जाते थे। इसके बावजूद, हर परीक्षा में अर्जुन का नाम टॉप पर होता।
स्कूल की पीटीएम (P&T Meeting) में जब टीचर अर्जुन की तारीफ करते, तो चाचा-ताऊ को गर्व के बजाय जलन होती। घर पहुँचते ही रिपोर्ट कार्ड तानों की वजह बन जाता। चाचा अपने बेटे को डाँटते—”देखा! यह सरकारी स्कूल वाला तुझसे आगे निकल गया। शर्म नहीं आती?” और फिर अर्जुन की ओर मुड़कर कहते—”ज्यादा उड़ मत! दो किताबें क्या पढ़ लीं, अब आँखों में घमंड दिखने लगा है। खा-पी तो हमारे ही घर का रहा है, यह मत भूल।”
अर्जुन चुपचाप सब सुनता। वह कभी पलटकर जवाब नहीं देता था। उसके लिए किताबें ही उसकी दुनिया थीं और पढ़ाई ही इस नरक से निकलने का एकमात्र रास्ता।
जब कॉलेज की बारी आई, तो परिवार ने हाथ खड़े कर दिए। “हम इसके कॉलेज का खर्च नहीं उठा सकते।” लेकिन अर्जुन ने हार नहीं मानी। उसने कड़ी मेहनत की, एंट्रेंस एग्जाम दिए और देश के टॉप कॉलेज में फुल स्कॉलरशिप हासिल की। चार साल हॉस्टल में रहकर उसने पहली बार चैन की सांस ली। वहां लोग उसे उसके दिमाग की वजह से इज्जत देते थे।
भाग 3: अमेरिका का सफर और गुमनामी
डिग्री के बाद अर्जुन को विदेश में पढ़ाई के लिए सरकारी स्कॉलरशिप मिली। जब उसने यह खबर घर सुनाई, तो किसी ने उसे बधाई नहीं दी। “वहाँ जाकर भी यही करेगा, किताबों में सिर घुसाए रहेगा। हमारे बच्चों की तरह कमाएगा थोड़े ही,” चाची ने मुँह बनाकर कहा। चाचा ने साफ कह दिया—”वहाँ गया है तो यह मत सोचना कि हम पैसे भेजेंगे। हमारे बस का नहीं है विदेश का खर्च।”
अर्जुन मुस्कुराया, “आपका एक रुपया भी नहीं लगेगा चाचा।”
एयरपोर्ट पर उसे छोड़ने कोई नहीं आया। वह खुद ऑटो से गया। उन 5 सालों में अमेरिका में अर्जुन ने दिन-रात एक कर दिया। पढ़ाई के साथ-साथ रिसर्च और इंटर्नशिप की। धीरे-धीरे उसने अपनी एक कंपनी शुरू की—एक टेक स्टार्टअप। उसकी मेहनत रंग लाई और कुछ ही सालों में उसकी कंपनी की वैल्यू करोड़ों में पहुँच गई।
वह अब सचमुच करोड़पति था। उसके पास आलीशान घर था, महंगी गाड़ियाँ थीं, लेकिन मन के किसी कोने में अभी भी वही छोटा बच्चा था जो अपने परिवार से सिर्फ एक बार ‘शाबाश’ सुनना चाहता था।
भाग 4: परीक्षा का दिन: गरीब का भेष
5 साल बाद अर्जुन ने घर लौटने का फैसला किया। लेकिन इस बार वह अपनी सफलता की नुमाइश नहीं करना चाहता था। वह देखना चाहता था कि क्या उसके परिवार के दिल में उसके लिए थोड़ी भी जगह बनी है? या उनका नजरिया आज भी वही है?
वह एक साधारण टैक्सी से अपनी पुरानी गली में उतरा। फटे हुए बैग और साधारण कपड़ों में जब उसने दरवाजे पर दस्तक दी, तो चाचा ने उसे पहचाना तक नहीं। “अरे! अर्जुन? तू वापस आ गया?” चाचा के चेहरे पर खुशी नहीं, बल्कि एक अजीब सा बोझ था।
अंदर कदम रखते ही तानों का दौर शुरू हो गया। चाची बोलीं, “अरे वाह! अमेरिका से सीधे हमारे छोटे से घर की याद आ गई? क्या लाया हमारे लिए? कोई सूटकेस नहीं, कोई गिफ्ट नहीं? लगता है वहाँ भी फेल होकर ही आया है।”
ताऊ हँसते हुए बोले, “लगता है पढ़ाई में ही सब टाइम निकाल दिया, कमाई का मौका ही नहीं मिला। देख हमारे बेटे को, मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है, लाखों कमाता है।”
अर्जुन को फिर से वही पुराना छोटा कमरा दिया गया। डिनर पर भी वही हाल था। अर्जुन ने कहा, “मैंने अपना छोटा सा काम शुरू किया है वहाँ।” चाची ने तुरंत बात काट दी—”काम! मतलब नौकरी नहीं टिक पाई? स्टार्टअप-वार्टअप बोलता होगा, असल में तो कुछ नहीं होगा। तूने सरकार का सारा पैसा डुबो दिया।”
अर्जुन सब सुनता रहा। उसने देखा कि घर में कोई उसकी वापसी से खुश नहीं था। सिवाय रिया के। रिया ताऊ की बेटी थी, जो अब कॉलेज में थी। वह अर्जुन को चुपचाप खाना दे जाती और पूछती—”भैया, आप ठीक तो हैं?”
भाग 5: लैपटॉप का राज और सच का खुलासा
एक शाम बारिश हो रही थी। अर्जुन अपने कमरे में लैपटॉप पर एक बड़ी विदेशी फंडिंग डील फाइनल कर रहा था। वह अंग्रेजी में आत्मविश्वास के साथ बात कर रहा था— “Yes, the contract is ready. Make sure the legal team reviews it before we sign.”
तभी रिया कमरे में खाना लेकर आई। अर्जुन ने हड़बड़ाहट में लैपटॉप बंद करना चाहा, पर वह अधूरा रह गया। रिया ने स्क्रीन की रोशनी में करोड़ों के ट्रांजेक्शन अलर्ट और ‘CEO Arjun’ के नाम से आए ईमेल्स देख लिए। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“भैया… आप… आप तो बहुत बड़े आदमी बन चुके हैं। फिर यह सब छुपा क्यों रहे थे?” रिया ने रुआंसी आवाज में पूछा।
अर्जुन की आँखें नम हो गईं। “बड़ा तो मैं उस दिन होता रिया, जब कोई मुझे बिना इन पैसों के अपना मान लेता। मैं बस यह देखने आया था कि क्या मेरा परिवार मुझसे प्यार करता है या मेरी हैसियत से। पर सब वैसा ही है।”
रिया उस रात सो नहीं पाई। उसने तय किया कि वह इस स्वार्थ का हिस्सा नहीं बनेगी। उसने रात में ही सबको सच बता दिया।
भाग 6: बदल गई नजरें, पर नियत वही
अगली सुबह का नजारा एकदम अलग था। जो चाची कल तक सूखी रोटी देती थीं, आज गरम पराठे और कॉफी लेकर कमरे में खड़ी थीं। “अर्जुन बेटा, तूने बताया नहीं कि तू इतना बड़ा आदमी बन गया है! यह ले नाश्ता।”
चाचा और ताऊ मुस्कुराकर पास आए। “अरे! हम तो मजाक करते थे बेटा। तू तो हमारा गर्व है। हम सोच रहे थे तेरे साथ मिलकर यहाँ कोई बड़ा बिजनेस शुरू करें।”
अर्जुन खामोशी से सब देख रहा था। उसे साफ दिख रहा था कि ये लोग उसके पैरों में नहीं, उसकी दौलत के पैरों में गिर रहे हैं। शाम को उसने सबको हॉल में बुलाया।
“आज पहली बार नहीं है जब मैं इस घर में आया हूँ, पर शायद आखिरी बार जरूर है,” अर्जुन ने शांत स्वर में कहा। “कल तक मैं आपके लिए निकम्मा और बोझ था। आज करोड़पति होने की खबर लगी तो सबके बोल बदल गए। अगर कल मैं फिर गरीब हो जाऊँ, तो क्या आप मुझे यही इज्जत देंगे?”
सबका सिर झुक गया। किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
अर्जुन ने अपना छोटा सा बैग उठाया और दरवाजे की ओर बढ़ा। “तुम भले ही मुझे परिवार न मानो, पर मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूँ। अगर कभी सच में जरूरत पड़े—बीमारी या मुसीबत में—तो मुझे कॉल करना। मैं मदद करूँगा। पर अब मैं यहाँ अपना आत्म-सम्मान खोकर इज्जत खरीदने नहीं आऊँगा।”
रिया रोने लगी। उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा। “भैया, मुझे माफ कर देना।” अर्जुन ने उसके सिर पर हाथ रखा, “रिया, तू ही इस घर की असली कमाई है। तू मत बदलना।”
अर्जुन उस गली से बाहर निकल गया। उसके बैंक बैलेंस में करोड़ों थे, लेकिन उसे महसूस हुआ कि असली दरिद्रता उन रिश्तों में थी जो पैसों के बिना साँस नहीं ले सकते थे। वह आज आजाद था और सचमुच अमीर भी—क्योंकि वह मानवता की परीक्षा जीत चुका था।
सीख: इंसान की कीमत उसके चरित्र और संघर्ष से होती है, उसकी बैंक पासबुक से नहीं। जो रिश्ते दौलत देखकर बनते हैं, वे दौलत के साथ ही खत्म हो जाते हैं।
News
बेटे ने माँ और बहन को घर से निकाल दिया… लेकिन माँ ने जो किया, पूरी दुनिया रो पड़ी
बेटे ने माँ और बहन को घर से निकाल दिया… लेकिन माँ ने जो किया, पूरी दुनिया रो पड़ी माँ…
एक अकेला फौजी पुलिस वालों पर भारी पड़ गया।।
एक अकेला फौजी पुलिस वालों पर भारी पड़ गया।। कर्तव्य पथ पर सिपाही भाग 1: घर की दहलीज और मां…
महिला पुलिस दरोगा अकेली घर लौट रही थी/रास्ते में हो गया हादसा/
महिला पुलिस दरोगा अकेली घर लौट रही थी/रास्ते में हो गया हादसा/ न्याय का शंखनाद: मर्यादा और प्रतिशोध की कहानी…
“बैलेंस हुआ तो दोगुना दूँगा!” — मैनेजर ने मज़ाक उड़ाया… पर वह बैंक का CEO था!
“बैलेंस हुआ तो दोगुना दूँगा!” — मैनेजर ने मज़ाक उड़ाया… पर वह बैंक का CEO था! फीकी पगड़ी का ताज…
Buhri Saas Ke Sath Bahu Ny Zulm Ki Inteha Kar Di
Buhri Saas Ke Sath Bahu Ny Zulm Ki Inteha Kar Di सफलता की कीमत और माँ का सम्मान: एक मार्मिक…
जिस सड़क निर्माण पर पति मजदूरी कर रहा था उसको बनवाने का टेंडर तलाकशुदा पत्नी के पास था फिर जो हुआ…
जिस सड़क निर्माण पर पति मजदूरी कर रहा था उसको बनवाने का टेंडर तलाकशुदा पत्नी के पास था फिर जो…
End of content
No more pages to load






