वादा जो मौत भी तोड़ न सकी

राजस्थान के एक छोटे से गांव में किसान किशन के घर बरसों बाद किलकारी गूंजी। पूरा घर खुशियों से भर गया। पंडित ने कहा — “यह बच्चा देवी का आशीर्वाद है।” उसका नाम रखा गया आरव

लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह बच्चा अपने साथ एक ऐसी कहानी लेकर आया है जो पूरे गांव की सोच बदल देगी।

अजीब बच्चा

आरव बाकी बच्चों जैसा नहीं था।
जहां बच्चे मिट्टी में खेलते, वह सुबह तड़के उठकर खेतों की मेड़ों पर दौड़ लगाता — जैसे कोई सैनिक ट्रेनिंग कर रहा हो।

लकड़ी की बंदूक बनाता, आदेश देता, नकली दुश्मनों पर चिल्लाता।
तीन साल की उम्र में उसने जिद पकड़ी — उसे “आर्मी ऑफिसर वाली वर्दी” चाहिए।

रात में उसे डरावने सपने आते।
वह नींद में चिल्लाता —
“अंजलि… मैं लौटूंगा… मैंने वादा किया है…”

कभी कहता गोलियां लगीं, कभी बर्फीले पहाड़, कभी धमाका।
मां-बाप समझते नजर लग गई है।

सच का पहला झटका

पांच साल की उम्र में एक दिन आरव जोर-जोर से रोने लगा।
किशन ने गोद में उठाया तो उसने हाथ झटक दिया —

“आप मेरे पिता नहीं हो!”
“मेरी बीवी और बच्चा कहां हैं?”

घर में सन्नाटा छा गया।

अब वह रोज एक ही बात कहता —
उसका नाम आरव नहीं, मेजर विक्रम है।
वह मुंबई का आर्मी ऑफिसर है।
उसकी पत्नी अंजलि प्रेग्नेंट है।
वह उसे लेने आया है।

गांव में खबर फैल गई — किशन का बेटा पागल हो गया।

मुंबई का पता

हैरानी की बात — आरव मुंबई का पूरा पता बताता।
सरपंच ने मुंबई पुलिस में अपनी रिश्तेदार एसीपी मीरा को फोन किया।

मीरा ने जांच की —
वह पता सच निकला।
वहां सच में एक मेजर विक्रम रहता था।
चार साल पहले सीक्रेट मिशन में शहीद हुआ था।
पत्नी — अंजलि
एक छोटा बेटा भी।

अब मामला गंभीर हो गया।

एसीपी मीरा की जांच

मीरा गांव पहुंची।
उसे पुनर्जन्म पर यकीन नहीं था।

उसने पूछा —
“अगर तुम मेजर विक्रम हो तो बताओ कैसे मरे?”

आरव बोला —
“ऑपरेशन विजय… तीन गोलियां… फिर धमाका…”

मीरा सन्न रह गई।
यह मिशन गोपनीय था।

जब उसने पूछा मौत और जन्म के बीच क्या हुआ —
आरव बोला —
“मैं घर गया… अंजलि रो रही थी… मैं था पर कोई मुझे सुन नहीं रहा था… फिर किसी ने मुझे पकड़कर यहां भेज दिया…”

यह सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गए।

मुंबई का सफर

सब मुंबई पहुंचे।
मीरा ने कहा —
“अगर सच हो तो रास्ता बताओ।”

आरव ने बिना हिचक रास्ते बताए।
गलियां, मोड़, सिग्नल — सब पहचानता गया।

एक बड़े गेट के सामने रुक गया —
“यही मेरा घर है।”

नेमप्लेट पर लिखा था —
मेजर विक्रम सिंह (शहीद)

अंजलि से मुलाकात

दरवाजा खुला।
सफेद साड़ी में उदास चेहरा — अंजलि।

आरव बोला —
“तुमने सफेद साड़ी क्यों पहनी? सिंदूर क्यों नहीं लगाया? मैं लौट आया हूं।”

अंजलि भड़क गई —
“ये मजाक है?”

पर फिर आरव ने कहा —
“तुमने मेरी कलाई पर काला ताबीज बांधा था… मिशन पर जाने से पहले…”

अंजलि कांप गई।
ये बात सिर्फ दोनों जानते थे।

यकीन की आखिरी परीक्षा

अंजलि ने टेस्ट लिया —
“पहली मुलाकात?”
“आर्मी कैंटीन। तुमने कॉफी गिराई थी।”

“घर में क्या बदला?”
“स्टडी को स्टोर बना दिया… दीवार हरी कर दी… मुझे हरा पसंद नहीं।”

अंजलि रो पड़ी।

फिर सेना के चार जवान बुलाए गए।
आरव ने सबके नाम और निजी बातें बताईं।

चारों ने उसे सैल्यूट किया —
“जय हिंद सर।”

अब कोई शक नहीं बचा था।

समय का सच

कुछ साल सब साथ रहे।
आरव अपने “पिछले बेटे” के साथ खेलता।
दोनों दोस्त बन गए।

पर धीरे-धीरे यादें धुंधली होने लगीं।
ऑपरेशन विजय भूल गया।
अंजलि “आंटी” बन गई।

आठ साल की उम्र तक सब खत्म।
अब वह सिर्फ आरव था।

शायद मेजर विक्रम अपना वादा निभाकर जा चुका था।

अंतिम सच्चाई

किशन आरव को लेकर गांव लौट गया।
अंजलि फिर अकेली रह गई —
पर अब उसे सुकून था।

विक्रम ने वादा निभाया था।
वह लौटा था… बस थोड़ी देर के लिए।

कभी-कभी वह बेटे की आंखों में देखती और मुस्कुराती —
उसे यकीन था…