महिला ने सिक्योरिटी गार्ड से कहा, क्या तुम मेरे पति बनोगे, सिर्फ एक दिन के लिए
दिल्ली का एक बड़ा अस्पताल। सुबह की हल्की धूप में उसकी ऊँची इमारतें चमक रही थीं। गेट पर सुरक्षा गार्ड अर्जुन अपनी वर्दी सीधी करता खड़ा था। चेहरे पर कठोरता थी, लेकिन भीतर जाने कितनी अनकही बातें दबकर बैठी थीं। यह उसकी रोज़ की ड्यूटी थी—हर आने-जाने वाले पर नज़र रखना।
लेकिन उसकी नज़रें अक्सर एक ही जगह ठहर जाती थीं—उस नर्स पर, जो रोज़ ठीक 9 बजे अस्पताल आती थी। उसका नाम था नेहा। सफेद यूनिफ़ॉर्म, साधारण चेहरा, थकी हुई आँखें पर उनमें आत्मविश्वास की एक चमक। अर्जुन ने उसे हमेशा व्यस्त, गंभीर और थोड़ा उदास-सा पाया था।
उस दिन नेहा की चाल धीमी थी, आँखों में चिंता की लकीरें और गालों पर फीकी-सी थकान। अर्जुन ने हिम्मत जुटाकर कहा—
“सुप्रभात मैडम।”
नेहा ने सिर हिलाकर जवाब दिया, पर उसकी आँखों में छिपा दर्द अर्जुन से छुपा नहीं।
कुछ पल चुप्पी रही, फिर अर्जुन पूछ बैठा—“सब ठीक है न?”
नेहा अचानक रुक गई। जैसे किसी अनजाने को अपना राज़ कह देने का मन हो। उसने सीधा अर्जुन की आँखों में देखा और धीमे स्वर में कहा—
“क्या तुम… मेरे पति बन सकते हो? सिर्फ़ आज के लिए।”
अर्जुन स्तब्ध रह गया। शब्द जैसे उसके कानों पर ठिठक गए।
“क्या कहा आपने?” उसने संकोच से पूछा।
नेहा की आँखें भर आईं। वह बोली—
“आज मेरी बेटी आन्या का स्कूल फंक्शन है। हर साल वह अकेली रह जाती है। मैंने उससे वादा किया था कि इस बार उसके पापा ज़रूर आएँगे। लेकिन उसके असली पिता हमें सालों पहले छोड़कर जा चुके हैं। मैं अपनी बच्ची को और मायूस नहीं देख सकती। बस एक दिन… उसके लिए पिता बन जाइए।”
अर्जुन के दिल में जैसे कुछ टूट गया। उसने गेट से बाहर झाँककर देखा—वहाँ एक नन्ही बच्ची खड़ी थी। गुलाबी फ्रॉक, हाथों में एक टेढ़ा-सा टेडी बियर और आँखों में उम्मीद की चमक। वह मासूमियत अर्जुन का दिल पिघला गई।
वह मुस्कुराया और बोला—
“अगर आपको भरोसा है, तो आज ही नहीं… जब भी आपको ज़रूरत हो, मैं आपके लिए खड़ा रहूँगा।”

नेहा की आँखों से आँसू बह निकले। इतने सालों में पहली बार किसी अजनबी ने उसके दर्द को बिना सवाल समझ लिया था।
दोपहर को स्कूल का फंक्शन था। अर्जुन ने अपनी वर्दी ठीक की, नेहा और बच्ची के साथ स्कूल पहुँचा। गेट पर रंग-बिरंगी रौनक थी। हर बच्चा अपने पिता या माँ के साथ आया था। आन्या अर्जुन का हाथ कसकर पकड़े थी।
अपने दोस्तों से वह गर्व से बोली—“देखो, मेरे पापा आए हैं।”
बच्चों ने तालियाँ बजाईं—“वाह, तुम्हारे पापा तो हीरो लगते हैं!”
अर्जुन की आँखें भीग गईं, पर उसने मुस्कुराकर उस नन्ही को और मज़बूत किया। जब आन्या मंच पर कविता सुनाने गई, तो उसने सबके सामने कहा—
“आज मेरे पापा यहाँ बैठे हैं। वे ताली बजाकर मेरा हौसला बढ़ाएँगे।”
पूरा हॉल अर्जुन की ओर देखने लगा। अर्जुन ने जोर से तालियाँ बजाईं। आन्या के चेहरे पर गर्व और आत्मविश्वास की चमक फैल गई।
कार्यक्रम के बाद प्रिंसिपल ने अर्जुन और आन्या को मंच पर बुलाया। बोले—
“आपकी बेटी बहुत होनहार है। हमें खुशी है कि उसके पिता यहाँ मौजूद हैं।”
नेहा की साँसें रुक गईं। उसे डर था कि सच्चाई कभी भी उजागर हो सकती है। लेकिन अर्जुन मज़बूती से खड़ा रहा। वह पल मानो उसकी अपनी जिंदगी का भी सबसे बड़ा क्षण बन गया था।
पर कहानियाँ इतनी सरल कहाँ होती हैं। अगले ही दिन अस्पताल के गलियारों में कानाफूसियाँ शुरू हो गईं। किसी ने फंक्शन की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाल दी थी। लोग फुसफुसाने लगे—
“गार्ड और नर्स का अफेयर चल रहा है।”
“उसकी बेटी को भी फंक्शन में ले गया। पापा बनकर खड़ा रहा।”

ये बातें जहर की तरह फैलने लगीं। नेहा का दिल डूबने लगा। वह चीखना चाहती थी कि यह सब सिर्फ़ एक दिन की मासूम मदद थी। लेकिन कौन सुनता?
अर्जुन चुप रहा, पर भीतर से जल रहा था। उसने ठान लिया कि अब पीछे हटना मतलब नेहा और उसकी बेटी को अकेला छोड़ देना होगा। और यह वह हरगिज़ नहीं करेगा।
जब अस्पताल प्रबंधन ने मीटिंग बुलाई, सबकी नज़रें अर्जुन और नेहा पर थीं। चेयरमैन ने सख्ती से पूछा—
“अर्जुन, तुम सुरक्षा गार्ड हो। तुम्हारा काम गेट देखना है, किसी महिला सहकर्मी के निजी जीवन में दखल देना नहीं। यह सब क्या है?”
अर्जुन ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“सर, मैंने कोई मर्यादा नहीं तोड़ी। मैंने सिर्फ़ एक बच्ची को उसका हक़ दिया। एक दिन का सहारा। अगर यह मदद गलती है तो मैं नौकरी छोड़ दूँगा, लेकिन इंसानियत नहीं छोड़ूँगा।”
नेहा ने भी हिम्मत जुटाई—
“सर, मैं दिन-रात मरीजों की सेवा करती हूँ। पर मेरी बेटी के लिए मैंने सिर्फ़ इतना किया कि उसे अकेलापन न महसूस हो। अर्जुन ने मेरी इज्ज़त बचाई है, छीनी नहीं। अगर हमें सज़ा मिलेगी, तो इसका मतलब होगा कि इंसानियत की कोई जगह नहीं।”
कुछ पल की खामोशी के बाद चेयरमैन ने गहरी आवाज़ में कहा—
“अफवाहें सच नहीं होतीं। अस्पताल तुम्हारे साथ है। अर्जुन, तुम्हारी नौकरी सुरक्षित है। नेहा, तुम्हें किसी से डरने की ज़रूरत नहीं।”
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