बहु ने ससुर संग कर दिया कारनामा/ससुर ने उठाया था गलत कदम/

मर्यादा का अंत: एक पारिवारिक त्रासदी
उत्तर प्रदेश का कानपुर जिला अपनी औद्योगिक पहचान के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके शांत ग्रामीण अंचलों में भी कभी-कभी ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं जो समाज की रूह को झकझोर देती हैं। ऐसी ही एक घटना कानपुर के श्रवणखेड़ा गाँव की है, जहाँ एक प्रतिष्ठित परिवार के भीतर छिपे अंधकार ने सब कुछ तबाह कर दिया।
एक संपन्न परिवार की नींव
श्रवणखेड़ा गाँव के रहने वाले जिले सिंह एक मेहनती किसान थे। उनके पास 16 एकड़ उपजाऊ जमीन थी, जिससे उनका परिवार गाँव के संपन्न परिवारों में गिना जाता था। जिले सिंह ने वर्षों के परिश्रम से न केवल खेती को संवारा था, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य के लिए अच्छी खासी बचत भी कर रखी थी।
जिले सिंह के दो बेटे थे। बड़े बेटे का नाम अजय था और छोटे का नाम आनंद। अजय बचपन से ही अनुशासित और साहसी था, इसलिए उसने भारतीय सेना को अपना कार्यक्षेत्र चुना। वह पिछले चार वर्षों से देश की सीमाओं पर तैनात था और साल में कुछ ही बार छुट्टी लेकर गाँव आता था। छोटा बेटा आनंद, घर पर ही रहकर अपने पिता के साथ खेती-किसानी का हाथ बँटाता था।
करीब तीन साल पहले, जिले सिंह ने अजय की शादी ‘कल्पना’ नाम की एक बहुत ही सुशील और मेहनती युवती से करवाई थी। कल्पना ने आते ही घर की बागडोर संभाल ली। वह न केवल एक आदर्श बहू थी, बल्कि अपने ससुर और देवर की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ती थी।
विश्वास के पीछे का अंधकार
दिसंबर 2025 का महीना था। गाँव में सर्दी की दस्तक हो चुकी थी। अजय सात दिनों की छुट्टी लेकर घर आया था। घर में खुशियों का माहौल था। अजय अपनी पत्नी कल्पना को शहर घुमाने ले गया, उसके लिए नए कपड़े खरीदे और अपने भाई आनंद व पिता के लिए भी उपहार लाए। वह खुश था कि उसका परिवार सुरक्षित और खुशहाल है। लेकिन उसे भनक तक नहीं थी कि उसके पीछे उसके अपने ही घर में क्या पक रहा है।
12 दिसंबर को अजय वापस अपनी ड्यूटी पर चला गया। घर फिर से शांत हो गया। 15 दिसंबर की सुबह, जब आसमान से हल्की बारिश हो रही थी, जिले सिंह और आनंद छाता लेकर खेतों की ओर चले गए। पीछे से कल्पना ने घर के कामकाज निपटाए और कपड़े धोकर छत पर सूखने डाल दिए। अचानक बारिश तेज हो गई और कल्पना छत पर कपड़े समेटने गई।
भीगते हुए जब वह नीचे आई और अपने कमरे में वस्त्र बदलने लगी, तभी आनंद अचानक कमरे में दाखिल हुआ। उसने न तो आवाज दी और न ही दरवाजा खटखटाया। उस पल आनंद की दृष्टि में जो दोष आया, उसने पवित्र ‘देवर-भाभी’ के रिश्ते को कलंकित करने की नींव रख दी। कल्पना ने उसे फटकारा और बाहर जाने को कहा, लेकिन आनंद के मन में दुर्भावना घर कर चुकी थी।
शोषण की असहनीय दास्तां
उसी दोपहर कल्पना की माँ ने फोन किया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। कल्पना ने आनंद से उसे मायके छोड़ने को कहा। रास्ते में, एक सुनसान इलाके में आनंद ने मोटरसाइकिल रोकी और अपनी भाभी के साथ अत्यंत अमर्यादित और हिंसक व्यवहार किया। उसने कल्पना को धमकी दी कि यदि उसने यह बात किसी को बताई, तो वह उसे बदनाम कर देगा और जान से मार देगा।
कल्पना डर गई। वह चुपचाप अपने मायके गई और अपनी माँ की सेवा की, लेकिन अपने भीतर के घावों को छिपा लिया। 19 दिसंबर को जब जिले सिंह उसे लेने पहुँचे, तो रास्ते में वही दोहराव हुआ। जिले सिंह, जिन्हें कल्पना एक पिता के समान मानती थी, उनके मन में भी विकार उत्पन्न हो गया। गाँव की सीमा पर स्थित अपने ही खेत के एक कमरे में उन्होंने अपनी बहू के साथ बलपूर्वक दुर्व्यवहार किया।
अब कल्पना के लिए घर एक जेल बन गया था। जिस घर में वह सुरक्षा की उम्मीद करती थी, वहीं उसके रक्षक भक्षक बन चुके थे। देवर और ससुर, दोनों ने उसे डरा-धमकाकर उसका शोषण करना जारी रखा। वह असहाय थी, अकेली थी और समाज के डर से चुप थी।
फौजी का न्याय: एक भयानक रात
तकरीबन एक महीने तक यह सिलसिला चलता रहा। 22 जनवरी 2026 को कल्पना की सहनशक्ति जवाब दे गई। उसने अपने पति अजय को फोन किया और फूट-फूट कर रोते हुए सारी सच्चाई बता दी। अजय, जो सरहद पर दुश्मनों से लड़ रहा था, यह सुनकर सुन्न रह गया कि उसके अपने ही घर में उसकी पत्नी के साथ क्या हुआ है।
24 जनवरी को अजय बिना किसी को बताए गाँव पहुँचा। उसने कल्पना से विस्तार में सब सुना। उसका खून खौल रहा था, लेकिन उसने धैर्य बनाए रखा। उसने पुलिस के पास जाने की बजाय स्वयं ‘न्याय’ करने का निर्णय लिया। उसने एक मेडिकल स्टोर से नींद की गोलियां खरीदीं और कल्पना से कहा कि वह इन्हें रात के खाने में मिला दे।
रात के करीब 9 बजे, जिले सिंह और आनंद ने खाना खाया और गहरी नींद में सो गए। रात के सन्नाटे में, करीब 11 बजे, अजय अपने कमरे से बाहर निकला। उसके हाथ में एक कुल्हाड़ी थी।
उसने पहले अपने भाई आनंद के कमरे में जाकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी और फिर अपने पिता जिले सिंह के कमरे में जाकर वही खौफनाक कदम उठाया। उसने अपनी पत्नी के अपमान का प्रतिशोध अत्यंत हिंसक तरीके से लिया।
यही नहीं, उसने दोनों के शवों को आंगन में लगे एक पेड़ से लटका दिया।
कानून और अंत
इस भयानक कृत्य को अंजाम देने के बाद, अजय भागा नहीं। वह अपनी पत्नी कल्पना को साथ लेकर सीधा नजदीकी पुलिस स्टेशन पहुँचा और अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने दरोगा को अपनी पूरी व्यथा और इस कदम के पीछे के कारणों को बताया।
पुलिस ने तुरंत मौके पर पहुँचकर शवों को कब्जे में लिया। अजय के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया और उसे जेल भेज दिया गया।
निष्कर्ष: यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ, तो न्याय की उम्मीद कहाँ की जाए? अजय का कृत्य कानून की नजर में अपराध था, लेकिन क्या समाज और नैतिकता की नजर में वह केवल एक अपराधी था या एक पीड़ित पति? इस घटना ने श्रवणखेड़ा गाँव को हमेशा के लिए बदल दिया और रिश्तों की पवित्रता पर एक गहरा सवालिया निशान छोड़ दिया।
कानून अब अजय के भविष्य का फैसला करेगा, लेकिन इस कहानी का सबसे दुखद पहलू यह है कि एक हंसता-खेलता परिवार वासना और प्रतिशोध की भेंट चढ़ गया।
हमें इस घटना से क्या सीख मिलती है?
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रिश्तों में मर्यादा का उल्लंघन विनाश का कारण बनता है।
चुप्पी हमेशा समाधान नहीं होती; समय पर आवाज उठाना जरूरी है।
कानून को हाथ में लेना किसी भी समस्या का अंतिम समाधान नहीं हो सकता।
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