दुकानदार का ₹25 का कर्ज चुकाने 12 साल बाद विदेश से लौटे हालत देख रो पड़े और फिर||

२५ रुपये का कर्ज और सात बेटों का पश्चाताप

यह कहानी मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के एक छोटे से परिवार की है, जो अपनी जड़ों से दूर जाकर भी अपनी नैतिकता और संस्कारों को नहीं भूला। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि वक्त भले ही बदल जाए, लेकिन ईमानदारी और माता-पिता का स्थान कभी नहीं बदलता।

१२ साल बाद वतन वापसी

छिंदवाड़ा का वह पुराना मोहल्ला आज भी वैसा ही था, जैसा १२ साल पहले राकेश और नेहा ने छोड़ा था। राकेश अब एक सफल नौजवान बन चुका था और उसकी छोटी बहन नेहा भी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थी। पिछले १२ वर्षों से यह परिवार विदेश में रह रहा था। राकेश के पिता ने वहां कड़ी मेहनत कर अच्छा मुकाम हासिल किया था।

अब राकेश की शादी तय हो चुकी थी और पूरा परिवार भारत लौटा था। उनका इरादा था कि यदि यहां सब कुछ अच्छा रहा, तो वे यहीं बस जाएंगे, अन्यथा वापस विदेश चले जाएंगे। घर पहुँचते ही यादों का कारवां शुरू हो गया। नेहा ने चहकते हुए कहा, “भैया, क्या हम एक बार अपने पुराने स्कूल की तरफ चलें?” राकेश मुस्कुराया और बोला, “क्यों नहीं! वहां की गलियां और वह फुटपाथ वाली दुकानें, सब याद आ रहा है।”

दोनों भाई-बहन गाड़ी लेकर अपने पुराने स्कूल की ओर निकल पड़े।

प्रकाश अंकल की वह छोटी सी दुकान

जैसे ही वे स्कूल के सामने पहुँचे, उनकी नजरें सड़क के उस पार फुटपाथ पर बनी एक छोटी सी दुकान को ढूंढने लगीं। १२ साल पहले, जब वे स्कूल में पढ़ते थे, तो प्रकाश अंकल की दुकान उनकी पसंदीदा जगह हुआ करती थी। स्कूल की आधी छुट्टी (लंच टाइम) में वे अक्सर वहां से मूंगफली, गज्जक और छोटी-मोटी खाने की चीजें खरीदते थे।

दुकान तो वहीं थी, लेकिन वहां बैठने वाला चेहरा बदल चुका था। प्रकाश अंकल की जगह एक अपरिचित बुजुर्ग व्यक्ति दुकान चला रहा था। राकेश और नेहा के चेहरे की रौनक गायब हो गई।

राकेश ने आगे बढ़कर पूछा, “अंकल, यहां प्रकाश अंकल बैठते थे, वे कहां हैं?”

बुजुर्ग दुकानदार ने उनकी ओर देखा और रुआंसे स्वर में कहा, “बेटा, प्रकाश तो अब इस दुनिया में नहीं रहे। ३ साल पहले उनका देहांत हो गया।”

यह सुनकर दोनों भाई-बहन स्तब्ध रह गए। नेहा की आँखों में आँसू आ गए। दुकानदार ने आगे बताया, “उनके जाने के बाद उनके सातों बेटों ने यह दुकान मुझे बेच दी और अपने-अपने परिवारों के साथ शहर के अलग-अलग कोनों में जाकर बस गए। लेकिन बेटा, तुम दोनों इतने परेशान क्यों हो?”

राकेश ने भारी आवाज में कहा, “अंकल, हम पर उनका कुछ कर्ज बकाया था। हम वही लौटाने आए थे।”

दुकानदार ने उन्हें एक पता दिया और कहा, “अगर कर्ज लौटाना है, तो उनकी पत्नी ‘शांति देवी’ से मिलो। वे एक पुरानी बस्ती के जर्जर मकान में अकेली रहती हैं। वहां जाकर तुम्हें सब समझ आ जाएगा।”

शांति देवी की ममता और अकेलापन

राकेश और नेहा उस पते पर पहुँचे। वह एक अत्यंत गरीब बस्ती थी। एक पुराना, टूटा-फूटा मकान जिसके दरवाजे की रंगत उड़ चुकी थी। जब राकेश ने दरवाजा खटखटाया, तो काफी देर बाद अंदर से एक कमजोर आवाज आई, “आ रही हूं बेटा, थोड़ा सब्र करो, पैरों में तकलीफ है।”

दरवाजा खुला और सामने छड़ी के सहारे खड़ी एक वृद्ध महिला थी। शांति देवी ने उन्हें अंदर बुलाया। घर की हालत देखकर राकेश का दिल बैठ गया। सातों बेटे अच्छी नौकरियों में थे, फिर भी माँ इस जर्जर हालत में रह रही थी? दीवारों का पेंट उखड़ चुका था और घर में उदासी छाई थी।

शांति देवी ने उनके लिए चाय बनाई। बातों-बातों में नेहा ने पूछ लिया, “आंटी, आपके बच्चे कहां हैं?”

इतना पूछते ही शांति देवी फूट-फूट कर रो पड़ीं। उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई, “बेटा, हमने सातों बेटों को अपनी भूख मारकर पढ़ाया-लिखाया। कई बार मैं और मेरे पति भूखे सो जाते थे ताकि बच्चों का पेट भर सके। लेकिन उनकी शादी होते ही सब बदल गए। एक-एक करके सातों बेटे अपनी पत्नियों को लेकर अलग हो गए। मेरे पति इसी गम में दुनिया छोड़ गए। अब बेटे महीने के ३००० रुपये भेज देते हैं, जिससे मेरा गुजारा होता है। पैसे तो हैं, पर अपनों का साथ नहीं।”

२५ रुपये का वह ‘अनमोल’ कर्ज

शांति देवी की कहानी सुनकर राकेश और नेहा की आँखों में आँसू आ गए। फिर राकेश ने अपनी बात शुरू की, “आंटी, १२ साल पहले हम इसी स्कूल में पढ़ते थे। प्रकाश अंकल हमें बहुत प्यार करते थे। कभी-कभी पैसे कम होने पर वे हमें उधार सामान दे देते थे। जब हम अचानक विदेश गए, तो हम पर उनके २५ रुपये उधारे रह गए थे।”

शांति देवी मुस्कुराईं, “बेटा, बस २५ रुपये? इसके लिए तुम इतनी दूर से आए हो?”

राकेश ने भावुक होकर कहा, “आंटी, यह सिर्फ २५ रुपये नहीं, हमारा संस्कार है। विदेश में हमने एक लड़के को देखा जो अपने पिता का कर्ज चुकाने आया था, तब हमें अपनी गलती का अहसास हुआ। हमने तय किया था कि हम इन २५ रुपये के बदले अंकल को २५,००० रुपये देंगे और उनकी मदद करेंगे। लेकिन यहाँ आकर पता चला कि आपको पैसों से ज्यादा अपनों की जरूरत है।”

शांति देवी ने पैसे लेने से मना कर दिया, “बेटा, इस उम्र में पैसों का क्या करूंगी? मुझे तो बस अपने बच्चों का साथ चाहिए।”

राकेश का मास्टर प्लान

राकेश और नेहा वहां से निकल तो गए, लेकिन उनके मन में एक योजना चल रही थी। राकेश ने अपनी मेहनत और प्रभाव का इस्तेमाल किया। उसने शांति देवी के सातों बेटों की कंपनियों का पता लगाया। वह उन कंपनियों के बड़े अधिकारियों से मिला और उन्हें पूरी सच्चाई बताई कि कैसे ये लोग अपनी वृद्ध माँ को अकेला छोड़ चुके हैं।

राकेश ने सातों कंपनियों के मालिकों के साथ मिलकर एक योजना बनाई।

अगले दिन, सातों भाई अचानक अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ शांति देवी के घर पहुँचे। माँ हैरान रह गई! जो बच्चे त्योहार पर भी नहीं आते थे, वे सब एक साथ कैसे?

सबसे छोटे बेटे ने कहा, “माँ, मेरी कंपनी ने कहा है कि अगर मैं आपको कल दफ्तर लेकर आऊं, तो मुझे ५०,००० रुपये का बोनस मिलेगा।” बाकी भाई भी चिल्लाने लगे, “नहीं, मेरी कंपनी ने भी यही कहा है! माँ मेरे साथ चलेगी।”

वे सब माँ के लिए नहीं, बल्कि उन ५०,००० रुपयों के लालच में आए थे। तभी वहां राकेश और नेहा की एंट्री हुई।

सबक और पश्चाताप

राकेश ने सातों भाइयों के सामने खड़े होकर कहा, “शर्म आनी चाहिए तुम लोगों को! तुम अपनी माँ को लेकर इसलिए नहीं आए कि तुम्हें उसकी चिंता है, बल्कि इसलिए आए क्योंकि तुम्हें लगा कि तुम्हें ५०,००० रुपये मिलेंगे। मैंने तुम्हारी कंपनियों में यह बात कहलवाई थी ताकि देख सकूँ कि तुम में अभी भी इंसानियत बची है या नहीं।”

राकेश ने सबके सामने शांति देवी के त्याग और उनके पिता के संघर्ष की कहानी सुनाई। उसने वह २५ रुपये का किस्सा भी सुनाया कि कैसे एक अजनबी बच्चा १२ साल बाद कर्ज चुकाने आ सकता है, पर उनके अपने खून ने उन्हें भुला दिया।

जब बेटों के बच्चों (पोते-पोतियों) ने यह सुना, तो वे अपने माता-पिता से सवाल करने लगे, “पापा, क्या आपने सच में दादी को अकेला छोड़ दिया था?”

अपने ही बच्चों के सामने शर्मिंदा होकर सातों भाइयों का सिर झुक गया। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। वे सब रोते हुए अपनी माँ के चरणों में गिर पड़े और माफी मांगने लगे।

उन्होंने फैसला किया कि अब से वे अपनी माँ को अकेला नहीं छोड़ेंगे। तय हुआ कि हर ३ महीने माँ एक बेटे के पास रहेगी और सब मिलकर उनकी देखभाल करेंगे।

उपसंहार

राकेश ने अपना २५ रुपये का कर्ज चुका दिया था, लेकिन उससे भी बड़ा काम उसने यह किया कि एक बिखरते परिवार को जोड़ दिया। शांति देवी की आँखों में अब दुख के नहीं, बल्कि सुख के आँसू थे।

सीख: माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। आप जीवन में कितने भी सफल हो जाएं, लेकिन जिन कंधों पर बैठकर आपने दुनिया देखी है, उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

जय हिन्द, जय भारत