फुटपाथ का कटोरा और जिलाधिकारी की लाल बत्ती: जब भीख मांगते माता-पिता के सामने रुकी DM बेटी की गाड़ी
प्रस्तावना: एक खामोश मुलाकात जिसने सिस्टम को हिला दिया कहा जाता है कि वक्त का पहिया जब घूमता है, तो राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है। लेकिन जब यह बदलाव अपनों के दिए गहरे घावों से होकर गुजरता है, तो वह एक ऐसी दास्तान बन जाता है जो पत्थरों को भी रुला दे। उत्तर प्रदेश के एक व्यस्त शहर की सड़क पर हाल ही में एक ऐसी ही घटना घटी, जिसने ‘सफलता’ और ‘इंसानियत’ के नए मायने लिख दिए। यह कहानी है जिले की नई जिलाधिकारी (DM) आरती और सड़क किनारे भीख मांगने को मजबूर उनके बुजुर्ग माता-पिता की।
अध्याय 1: सोनपुर की मिट्टी और आरती के बड़े सपने
आरती सोनपुर गाँव की एक बेहद साधारण लड़की थी। उसके पिता रामदीन मजदूरी करते थे और माँ शांति देवी गाँव के घरों में बर्तन माँझती थीं। फटे कपड़े और आधी रोटी के बावजूद, रामदीन ने कभी आरती की पढ़ाई नहीं रुकने दी। आरती रात में लालटेन की रोशनी में पढ़ती और उसके पिता टपकती छत के नीचे बैठकर उसके सुनहरे भविष्य के सपने देखते। आरती ने वादा किया था— “बाबूजी, मैं अफसर बनकर लौटूँगी।”
.
.
.
अध्याय 2: 7 साल का अज्ञातवास और भाई का विश्वासघात
आरती पढ़ाई के लिए शहर चली गई। उन 7 सालों में उसने जो संघर्ष किया, वह किसी तपस्या से कम नहीं था। लेकिन गाँव में उसके पीछे एक खौफनाक साजिश रची जा रही थी। आरती का भाई, जो शहर में रहता था, गाँव लौटा और उसने अपनी माँ और बूढ़े पिता को धोखे से घर और ज़मीन बेचने पर मजबूर कर दिया।
जब रामदीन और शांति देवी बेघर हो गए, तो उनके पास न कोई ठिकाना बचा और न ही अपनी ‘अफसर बेटी’ तक पहुँचने का जरिया। भाई ने उन्हें सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया। अपनी बेटी की इज़्ज़त के डर से कि कहीं लोग यह न कहें कि “डीएम के माँ-बाप भीख मांगते हैं”, वे खामोशी से फुटपाथ पर दिन काटने लगे।

अध्याय 3: नियति का खेल – जब ‘साहब’ उतरीं सड़क पर
एक सुबह, शहर की मुख्य सड़क पर जिले की नई डीएम की गाड़ी रुकी। लाल-नीली बत्ती की चमक और पुलिस का पहरा। आरती अपने आधिकारिक दौरे पर थीं। तभी उनकी नज़र सड़क के किनारे बैठी एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी जो सूखे गले से बोल रही थी— “बेटी कुछ दे दो, भगवान भला करेगा।”
आरती के कदम ठिठक गए। वह आवाज़… वह चेहरा… धूल और गरीबी के पीछे छिपा वह मातृत्व। आरती ने जब पास जाकर देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सामने उसके माँ-बाप बैठे थे—वही हाथ जो कभी उसे आशीर्वाद देते थे, आज कटोरा थामे कांप रहे थे।
अध्याय 4: वर्दी का अहंकार हटा, बेटी का प्यार जागा
सड़क पर सन्नाटा छा गया। पुलिस वाले और आम जनता सन्न रह गए जब जिले की सबसे बड़ी अधिकारी ज़मीन पर बैठकर उन बुजुर्ग भिखारियों के पैरों में गिर पड़ी। आरती फूट-फूट कर रोने लगी।
“हम मर गए थे बिटिया, लेकिन आज फिर जी गए,” रामदीन के इन शब्दों ने वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें नम कर दीं।
आरती ने प्रोटोकॉल तोड़ दिया। उसने अपनी सरकारी गाड़ी वहीं छोड़ी और अपने माँ-बाप का हाथ थामकर पैदल ही सरकारी विश्राम गृह (Rest House) की ओर चल पड़ी। वह सड़क, जो कुछ देर पहले उनके अपमान की गवाह थी, अब एक बेटी के प्रायश्चित और सम्मान की साक्षी बन रही थी।
अध्याय 5: इंसाफ की रात और भाई का सामना
विश्राम गृह में आरती ने अपने माँ-बाप को नहलाया, उन्हें साफ कपड़े पहनाए और अपने हाथों से खाना खिलाया। जब उसे पूरी सच्चाई पता चली कि उसके भाई ने उनके साथ क्या किया है, तो उसकी आँखों में पहली बार अपनी वर्दी का गौरव और गुस्सा दिखा। उसने उसी वक्त अपने भाई को फोन किया और उसे सामने बुलाया।
दोपहर तक भाई पहुँचा, उसकी आँखों में अभी भी घमंड था। लेकिन जैसे ही उसने डीएम की कुर्सी पर अपनी बहन को और पास में अपने माँ-बाप को देखा, उसका सारा अहंकार पानी हो गया। आरती ने उसे कोई कानूनी सजा नहीं दी, बल्कि उसकी आत्मा को झकझोर दिया।
“सजा तुम्हारी आत्मा देगी,” कहकर आरती ने उसे अपनी ज़िंदगी से हमेशा के लिए बेदखल कर दिया।
अध्याय 6: ‘कर्तव्य’ – एक नई सरकारी योजना
अगले दिन आरती ने जिले में एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया। उन्होंने “कर्तव्य” नामक योजना की शुरुआत की, जिसके तहत सड़क किनारे रहने वाले हर बेसहारा बुजुर्ग के लिए आश्रय, भोजन और मुफ्त इलाज का प्रबंध किया गया। जब पत्रकारों ने पूछा कि यह अचानक क्यों? तो आरती ने सादगी से जवाब दिया— “क्योंकि कल मैंने अपने माँ-बाप को सड़क पर देखा था।”
निष्कर्ष: असली सफलता क्या है?
आज आरती के माता-पिता उनके साथ डीएम बंगले में रहते हैं। माँ रोज़ सुबह दीया जलाती है और पिता शाम को दरवाज़े पर बैठकर अपनी ‘अफसर बेटी’ का इंतज़ार करते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि पद और प्रतिष्ठा तब तक मिट्टी के समान हैं जब तक वे आपके माता-पिता के आँसू पोंछने के काम न आएं।
लेखक का संदेश: ज़िंदगी में चाहे आप कितने भी ऊँचे पद पर पहुँच जाएं, अपनी जड़ों को कभी मत भूलिए। माँ-बाप के पैरों में ही असली स्वर्ग है। अगर आरती ने उस दिन सिर्फ अपनी ‘इज्जत’ सोची होती, तो आज वह एक सफल अधिकारी तो होती, लेकिन एक असफल इंसान बनकर रह जाती।
News
क्यों भीड़ के बीच अचानक झुक गईं IPS मैडम एक गोलगप्पे वाले के सामने?
पीली साड़ी में ‘आम औरत’ बनकर निकलीं एसपी मैडम, बीच बाजार जब भ्रष्ट इंस्पेक्टर ने जड़ दिया तमाचा, तो हिला…
खूबसूरत विधवा महिला मुंबई जा रही थी, स्टेशन पर मिला गरीब लड़का….सफर में जो हुआ, इंसानियत रो पड़ी
इंसानियत का सफर: जब ट्रेन की एक सीट ने बदल दी दो अजनबियों की तकदीर प्रस्तावना: नर्मदापुरम की वह भारी…
जिस पति को बेरोज़गार कहकर छोड़ गई पत्नी… वही 7 साल बाद IPS बनकर पहुँचा पत्नी की झोपड़ी, फिर…
बेरोज़गारी का कलंक और वर्दी का गौरव: जब 7 साल बाद ‘साहब’ बनकर पत्नी की झोपड़ी पहुँचा ठुकराया हुआ पति…
पति 5 साल बाद डीएम बनकर लौटा तो देख पत्नी रेलवे स्टेशन पर कुली का काम कर रही है फिर जो हुआ…
संघर्ष की लाल वर्दी और सफलता का गौरव: जब जिलाधिकारी पति को रेलवे स्टेशन पर कुली के रूप में मिली…
आखिर क्यों बड़े बड़े पुलिस अफसर सेब बेचने वाली लड़की की आगे हाथ जोड़ने लगे….
वर्दी का अहंकार और पटरियों का इंसाफ: जब एक आईपीएस बहन ने बीच सड़क पर सिखाया भ्रष्ट इंस्पेक्टर को सबक…
7 साल बाद बेटी IAS बनकर लौटी… माँ-बाप को टूटी झोपड़ी में देखकर रो पड़ी | फिर जो हुआ…
सोनपुर की बेटी: झोपड़ी से ‘लाल बत्ती’ तक का सफर और स्वाभिमान की वापसी प्रस्तावना: एक कड़वा सच और एक…
End of content
No more pages to load






