चलती ट्रेन से कूदने जा रही थी… अजनबी लड़के ने बचाया, फिर जो हुआ
शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों के बीच एक पुराना रेलवे स्टेशन था, जहाँ दिन-रात गाड़ियाँ आती-जाती रहती थीं। उन्हीं पटरियों पर एक शाम एक एक्सप्रेस ट्रेन तेज़ रफ़्तार से दौड़ रही थी। ट्रेन के डिब्बे लगभग खाली थे, बस कुछ यात्री खिड़की से बाहर झांकते हुए अपने-अपने खयालों में डूबे हुए थे। उन्हीं डिब्बों में से एक के दरवाज़े पर खड़ी थी रीमा, बीस-बाईस साल की एक लड़की, जिसके चेहरे पर गहरी उदासी और आँखों में टूटे हुए सपनों की परछाई साफ झलक रही थी। हवा उसके खुले बालों को उड़ाती जा रही थी और वह लगातार नीचे भागती पटरियों को देख रही थी, जैसे किसी आख़िरी फ़ैसले पर पहुँच चुकी हो।
रीमा का दिल तेजी से धड़क रहा था। उसके दिमाग़ में बार-बार वही ख्याल घूम रहा था – “अब और सहा नहीं जाता, सब खत्म कर दूं, छलांग लगा दूं और दर्द से हमेशा के लिए आज़ाद हो जाऊं।” उसकी उंगलियाँ दरवाज़े की लोहे की छड़ को कसकर पकड़े हुए थीं और पैर धीरे-धीरे बाहर की ओर बढ़ रहे थे।
लेकिन तभी अचानक पीछे से किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया। झटके से उसका संतुलन बिगड़ा और वह पीछे की ओर गिर पड़ी। घबराकर उसने गुस्से से पीछे देखा तो वहाँ खड़ा था राजू, लगभग पच्चीस साल का एक साधारण सा युवक, जो रोज़ की तरह ट्रेन में मूंगफली और पानी बेच रहा था। दुबला-पतला, सांवला रंग, लेकिन चेहरे पर मेहनत और सच्चाई की चमक।
रीमा झल्लाते हुए बोली – “तुम होते कौन हो मेरा हाथ पकड़ने वाले? मुझे छोड़ दो, मुझे अपना काम करने दो।”
राजू ने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा – “नहीं, मैं तुम्हें ऐसा करने नहीं दूंगा। चाहे कैसी भी परेशानी हो, उसका हल जरूर होता है। ज़िंदगी इतनी सस्ती नहीं कि यूं खत्म कर दी जाए।”
रीमा ने तड़पते हुए जवाब दिया – “तुम नहीं जानते मेरी ज़िंदगी कैसी है। मेरी समस्या का कोई समाधान नहीं है।”
राजू का स्वर नरम हो गया। उसने धीमे से कहा – “मुझे नहीं पता तुम्हारा दर्द कितना बड़ा है, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि कोई भी मुश्किल इतनी बड़ी नहीं होती कि उसके लिए अपनी जान दे दी जाए। अगर चाहो तो मुझे बताओ, शायद मैं मदद कर पाऊं।”
रीमा कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसके होंठ कांप रहे थे और आँखों से आँसू बहते जा रहे थे। उसे पहली बार लगा कि कोई अजनबी भी सचमुच उसके दर्द को समझना चाहता है। लेकिन टूटे हुए दिल में निराशा इतनी गहरी थी कि वह फिर से बाहर की पटरी को देखने लगी।
राजू ने उसकी कलाई कसकर पकड़ ली और उसे अंदर खींचकर खिड़की वाली सीट पर बैठा दिया। खुद सामने बैठकर उसने गंभीर स्वर में कहा – “देखो, चुप रहना तुम्हारे दर्द को और बढ़ाएगा। अगर आज किसी को नहीं बताओगी तो यह बोझ तुम्हें भीतर ही भीतर खा जाएगा। मुझे दोस्त समझकर बता दो, आखिर क्यों तुम इतना बड़ा कदम उठाने जा रही थी?”

रीमा की आँखों से आँसू फिर छलक पड़े। उसने कांपती आवाज़ में कहा – “दोस्त जैसे शब्द मत कहो। जिस पर मैंने भरोसा किया था, उसी ने मुझे धोखा दिया है। अब भरोसा करने लायक कोई नहीं बचा।”
राजू ने उसकी ओर झुकते हुए पूछा – “धोखा किसने दिया, रीमा?”
रीमा की आवाज़ टूटने लगी। उसने कहा – “मैं घर से भागी हूँ। क्योंकि जिस इंसान से मैंने सच्चा प्यार किया था, उसने मुझे बीच रास्ते छोड़ दिया। उसने कहा था कि वह हमेशा मेरे साथ रहेगा। लेकिन जब मैंने सब छोड़कर उसका साथ दिया, तो उसने मेरा नंबर तक ब्लॉक कर दिया। अब घर भी नहीं लौट सकती, वहाँ सिर्फ ताने और अपमान मिलेंगे।”
राजू ने ध्यान से उसकी हर बात सुनी और गहरी सांस लेकर बोला – “रीमा, अगर किसी ने तुम्हें छोड़ दिया तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारी ज़िंदगी भी खत्म हो गई। जो इंसान सच्चा होता है, वह कभी साथ नहीं छोड़ता। शायद वह तुम्हारे लायक था ही नहीं।”
रीमा ने रोते हुए कहा – “तुम समझ नहीं सकते। मैंने उसे अपनी पूरी दुनिया मान लिया था। अब जब वही छोड़कर चला गया, तो मेरे पास बचा ही क्या है?”
राजू ने उसकी आँखों में गहराई से देखते हुए कहा – “तुम्हारे पास ज़िंदगी है, रीमा। और यही सबसे बड़ी चीज़ है। सोचो अगर तुम आज हार मान लोगी तो कल का खूबसूरत मौका कभी नहीं आएगा। हो सकता है ऊपर वाले ने मुझे तुम्हारे रास्ते में सिर्फ इसलिए भेजा हो कि मैं तुम्हें यह समझा सकूं।”
रीमा पहली बार बिना रोए उसकी तरफ देखने लगी। चेहरे पर अब भी दर्द था, लेकिन कहीं ना कहीं उम्मीद की हल्की सी किरण भी दिखने लगी। उसने धीमे से कहा – “लेकिन मैं कल तक पहुंचूंगी कैसे? घर जाने की हिम्मत नहीं है और जिसे मैंने सबकुछ माना था उसने साथ छोड़ दिया। अब मेरे लिए बचा ही क्या है?”
राजू ने गहरी सांस ली और बोला – “घर के लोग गुस्सा कर सकते हैं, डांट सकते हैं, लेकिन उनका गुस्सा हमेशा नहीं रहता। माँ-बाप चाहे जितने नाराज़ हों, अंत में बच्चे की सलामती ही चाहते हैं। अगर तुम लौटोगी तो शायद एक दिन वही तुम्हारा सबसे बड़ा सहारा बन जाएंगे।”
रीमा फूट-फूटकर रोने लगी। उसने कहा – “तुम नहीं जानते मेरे पापा कितने सख्त हैं। उनकी डांट, उनका गुस्सा सहना मुश्किल है। गुस्से में आकर ही तो मैं घर छोड़कर भागी और उस इंसान के पास पहुँची जिसने मुझे अपनाने से इंकार कर दिया। अब मैं कहाँ जाऊँ?”

राजू ने उसका हाथ थाम लिया और गंभीर स्वर में कहा – “दुनिया में हर धोखा अंत नहीं होता। कभी-कभी धोखे ही हमें सिखाते हैं कि असली इंसान कौन है। तुम्हारा दर्द सच्चा है, लेकिन उसका प्यार झूठा था। भरोसा करो खुद पर, और उस भगवान पर जिसने तुम्हें इस वक्त गिरने से बचाया। हो सकता है तुम्हारे लिए कोई और बेहतर रास्ता लिखा हो।”
रीमा चुप हो गई। उसके आँसू थमने लगे। उसके मन में पहली बार ऐसा लगा कि शायद यह अजनबी सचमुच सही कह रहा है। वह खिड़की से बाहर देखने लगी। ट्रेन तेज़ी से भाग रही थी, लेकिन उसके मन में अब कूदने की जिद नहीं थी।
शाम धीरे-धीरे गहराने लगी थी। डिब्बे में सन्नाटा था। रीमा ने अचानक धीमे स्वर में कहा – “राजू, अगर भगवान ने सचमुच तुम्हें मेरे रास्ते में इसलिए भेजा हो कि तुम मेरे साथी बनो, तो क्या तुम… तुम मेरे साथ ज़िंदगी बिताओगे?”
राजू चौंक गया। उसके हाथ से मूंगफली का थैला गिर पड़ा। उसने हकलाते हुए कहा – “क्या? क्या कहा तुमने?”
रीमा की आँखों में आँसू चमक रहे थे, लेकिन उनमें उम्मीद थी। उसने दोहराया – “क्या तुम मुझसे शादी करोगे? अगर तुमने हां कहा, तो मैं ज़िंदगी से लड़ने की हिम्मत जुटा लूंगी। अगर तुमने इंकार किया तो शायद मैं खुद को रोक नहीं पाऊंगी।”
राजू का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह असमंजस में पड़ गया। उसने कहा – *“रीमा, हम दोनों एक-दूसरे को जानते तक नहीं। तुम अमीर घर की लड़की लगती हो और मैं तो बस एक गरीब मूंग
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