बेटी के साथ गलत हुआ और बाप ने रच दिया इतिहास/

विवशता की पराकाष्ठा: भीलवाड़ा का प्रतिशोध
राजस्थान की तपती धरती पर भीलवाड़ा जिले का एक छोटा सा गाँव ‘अजीतपुरा’ बसा है। यहाँ की हवाओं में धूल और गरीबी की महक थी, लेकिन यहाँ के लोग अपनी मर्यादा को लेकर बहुत सजग रहते थे। इसी गाँव के एक छोटे से कच्चे मकान में मानसिंह का परिवार रहता था। मानसिंह, जो जाति से सीधा-सादा और स्वभाव से अत्यंत मेहनती था, गाँव के जमींदारों के खेतों में मजदूरी करके अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा था।
मानसिंह का परिवार और खुशियाँ
मानसिंह के जीवन में खुशियाँ उसके छोटे से परिवार तक ही सीमित थीं। उसकी पत्नी संजना, जो अपनी आयु के हिसाब से कहीं अधिक सुंदर और /आ/क/र्ष/क/ थी, घर की मान-मर्यादा का पूरा ध्यान रखती थी। उनकी इकलौती संतान थी मनीषा। मनीषा ने 12वीं की पढ़ाई पूरी की थी और उसकी आँखें बड़े सपने देखती थीं, लेकिन मानसिंह की खाली जेब ने उन सपनों को घर की चौखट के भीतर ही कैद कर दिया था। मनीषा अब अपनी माँ के साथ घर के कामों और सिलाई में हाथ बँटाती थी। गाँव के लोग अक्सर संजना और मनीषा की खूबसूरती की चर्चा करते थे, जो अनजाने में ही उनके लिए काल बनने वाली थी।
वर्दी के पीछे का राक्षस: दरोगा प्रताप
मानसिंह के घर से कुछ ही दूरी पर एक पक्का और आलीशान मकान था, जो पुलिस दरोगा प्रताप सिंह का था। प्रताप सिंह नजदीकी थाने में तैनात था और पूरे इलाके में उसका खौफ था। वह एक ऐसा पुलिसकर्मी था जिसने अपनी वर्दी का उपयोग न्याय के लिए नहीं, बल्कि अपनी /ह/व/स/ और /भ्र/ष्टा/चा/र/ के लिए किया था। गाँव की कोई भी सुंदर महिला उसकी /गं/दी/ नज़रों से बच नहीं पाती थी। उसकी इन्हीं हरकतों की वजह से उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी, जिसके बाद वह और भी अधिक /म/र्या/दा/ही/न/ हो गया था। वह रात के समय अक्सर अपने घर में गैर-महिलाओं को बुलाता और शराब के नशे में /रा/तें/ रं/गी/न/ करता था।
भाग्य का क्रूर खेल: 5 जनवरी 2026
5 जनवरी की वह सुबह मानसिंह के परिवार के लिए तबाही का संदेश लेकर आई। मनीषा को रात से ही तेज बुखार था। मानसिंह के पास दवा के लिए एक रुपया भी नहीं था। वह उम्मीद लेकर जमींदार रूप सिंह के पास पहुँचा और अपनी पिछली मजदूरी के पैसे माँगे। लेकिन रूप सिंह ने न केवल पैसे देने से मना किया, बल्कि मानसिंह की पत्नी और बेटी के बारे में अत्यंत /घि/नो/नी/ और /अ/भ/द्र/ बातें कहीं। मानसिंह अपने परिवार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन सकता था; उसने आपा खो दिया और रूप सिंह को लहूलुहान कर दिया।
रूप सिंह ने अपनी पहुँच का फायदा उठाया और प्रताप सिंह को फोन कर दिया। प्रताप सिंह, जो पहले से ही संजना पर नज़र गड़ाए बैठा था, उसे एक सुनहरा मौका मिल गया। उसने मानसिंह को गिरफ्तार किया और थाने ले जाकर बुरी तरह पीटा।
संजना की पहली /ब/र्बा/दी/
जब संजना को पता चला कि मानसिंह जेल में है और उसे बुरी तरह प्रताड़ित किया जा रहा है, तो वह टूट गई। गाँव के किसी व्यक्ति ने उसे सलाह दी कि दरोगा प्रताप उसका पड़ोसी है, शायद वह मदद कर दे। संजना शाम के समय प्रताप के घर पहुँची। प्रताप उस समय शराब के नशे में डूबा हुआ था।
संजना को अपने सामने देखकर उसकी आँखों में /क/भा/म/ना/ जाग उठी। उसने कहा, “मानसिंह को छोड़ना मेरे हाथ में है, लेकिन तुम्हें मुझे संतुष्ट करना होगा।” संजना ने मिन्नतें कीं, पैरों में गिरी, लेकिन उस वर्दीधारी /भे/ड़ि/ये/ का दिल नहीं पसीजा। अंततः, अपने सुहाग की जान बचाने के लिए संजना को अपनी /अ/स्मि/ता/ का सौदा करना पड़ा। प्रताप ने संजना की विवशता का लाभ उठाते हुए उसके साथ /ज/ब/र/द/स्ती/ की और उसके /शा/री/रि/क/ शो/ष/ण/ को अपनी जीत माना।
छल और /ह/व/स/ का नया शिकार
अगले दिन मानसिंह रिहा होकर घर आया, लेकिन वह नहीं जानता था कि उसकी रिहाई की कीमत क्या थी। प्रताप अब मानसिंह के घर में एक ‘हितैषी’ बनकर आने लगा। उसने मानसिंह को एक कारखाने में काम दिलवाया और संजना को अपने घर की देखरेख के लिए नौकरी पर रख लिया। धीरे-धीरे उसकी नज़रें जवान होती मनीषा पर टिक गईं।
15 दिन बीतते-बीतते प्रताप ने कई बार संजना का फायदा उठाया, लेकिन अब वह मनीषा को हासिल करना चाहता था। 30 जनवरी को उसने एक नई चाल चली। उसने संजना को फोन कर कहा कि वह बीमार है और आज वह नहीं, बल्कि मनीषा काम के लिए आए। संजना ने विरोध किया, तो प्रताप ने धमकी दी कि वह मानसिंह को फिर से झूठे केस में फँसाकर उम्रकैद दिला देगा। संजना की एक और भूल ने मनीषा को उस /द/रिं/दे/ के सामने लाकर खड़ा कर दिया।
मनीषा के साथ /अ/न्या/य/
मनीषा जब प्रताप के घर पहुँची, तो उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उसने रसोई का चाकू मनीषा की गर्दन पर रखकर उसे शोर न मचाने की चेतावनी दी। प्रताप ने उस मासूम बच्ची को बेडरूम में ले जाकर उसके हाथ-पैर बाँध दिए और उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। उस रात प्रताप ने मनीषा के साथ /पा/श/वि/क/ दु/ष्क/र्म/ किया। मनीषा की आँखों से आँसू बहते रहे, लेकिन उस /रा/क्ष/स/ ने एक न सुनी। काम खत्म होने के बाद उसने मनीषा को धमकी दी कि यदि उसने मुँह खोला, तो वह उसके पिता के टुकड़े-टुकड़े कर देगा।
मनीषा घर लौटी और माँ के गले लगकर फूट-फूटकर रोई। जब संजना को सच पता चला, तो वह अपनी किस्मत को कोसने लगी। दोनों माँ-बेटी ने मानसिंह को कुछ नहीं बताया, क्योंकि वे जानती थीं कि मानसिंह सच सुनते ही अपनी जान जोखिम में डाल देगा।
अंतिम कांड: 15 फरवरी 2026
15 फरवरी को प्रताप की नीचता की सारी सीमाएं टूट गईं। वह दिनदहाड़े मानसिंह की गैरमौजूदगी में उनके घर में घुस गया। मनीषा सामने बैठी थी। उसने संजना को बालों से पकड़ा और मनीषा के सामने ही उसके साथ /अ/भ/द्र/ कृ/त्य/ करने लगा। जब मनीषा ने बीच-बचाव करना चाहा, तो उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर मनीषा की कनपटी पर रख दी। संजना अपनी बेटी की जान की भीख माँगती रही और प्रताप अपनी /गं/दी/ प्यास बुझाता रहा।
प्रतिशोध की ज्वाला और खूनी अंत
शाम को जब मानसिंह काम से लौटा, तो उसने देखा कि संजना और मनीषा एक कोने में सिमटी हुई रो रही थीं। उनकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि जीवन के प्रति नफरत थी। मानसिंह के बार-बार पूछने पर मनीषा ने सब कुछ उगल दिया। उसने बताया कि कैसे उस दरोगा ने माँ और बेटी दोनों की /इ/ज्ज/त/ को मिट्टी में मिला दिया है।
मानसिंह के भीतर का धैर्य ज्वालामुखी बनकर फट पड़ा। वह अब एक लाचार मजदूर नहीं, बल्कि एक घायल शेर था। उसने आँगन से एक भारी लाठी उठाई और सीधा प्रताप के घर में घुस गया। प्रताप नशे में धुत सोफे पर पड़ा था। मानसिंह ने जैसे ही उसे ललकारा, प्रताप अपनी रिवॉल्वर की तरफ लपका, लेकिन मानसिंह की लाठी का प्रहार उसके हाथ पर इतनी तेजी से हुआ कि रिवॉल्वर दूर जा गिरी।
मानसिंह ने फुर्ती से वह रिवॉल्वर उठा ली। प्रताप गिड़गिड़ाने लगा, “मानसिंह, मुझे माफ कर दो, मैं तुम्हें बहुत पैसा दूँगा।” लेकिन मानसिंह के कानों में उसकी पत्नी और बेटी की चीखें गूँज रही थीं। उसने ट्रिगर दबाया—’ठाँय-ठाँय-ठाँय-ठाँय’। चार गोलियाँ प्रताप के सीने और सिर के पार निकल गईं। वह /वर्दी/धारी/ द/रिं/दा/ तड़प-तड़प कर वहीं ढेर हो गया।
कानून और समाज का न्याय
गोलियों की आवाज़ से पूरा गाँव थर्रा उठा। श्याम सुंदर नामक पड़ोसी ने पुलिस को सूचित किया। पुलिस आई और मानसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। थाने में मानसिंह ने शांत स्वर में कहा, “साहब, मैंने एक इंसान को नहीं, एक /शै/ता/न/ को मारा है जिसने मेरे घर की पवित्रता को नष्ट किया था।”
आज मानसिंह जेल में है। भीलवाड़ा की अदालत में मुकदमा चल रहा है। गाँव के लोग मानसिंह के परिवार के साथ खड़े हैं और उसकी रिहाई की माँग कर रहे हैं। पुलिस विभाग के लिए यह एक शर्मनाक अध्याय था, लेकिन मानसिंह के लिए यह अपने परिवार के स्वाभिमान को बचाने का एकमात्र रास्ता था।
निष्कर्ष: क्या एक पिता और पति का अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए कानून हाथ में लेना सही था? यह सवाल आज भी अजीतपुरा की गलियों में गूँज रहा है।
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