सच्चे भरोसे की जीत
भैरवपुर गाँव की सुबह हमेशा की तरह धीरे-धीरे जाग रही थी। खेतों से आती मिट्टी की खुशबू, कच्चे रास्तों पर चलते बैलों की घंटियों की आवाज और दूर मंदिर की घंटी की मधुर ध्वनि मिलकर पूरे गाँव को एक अलग ही शांति दे रही थी।
गाँव के किनारे एक छोटा सा कच्चा घर था। उसी घर में रहता था रंजीत।
रंजीत कोई अमीर परिवार से नहीं था। उसके पिता रामनारायण गाँव में मजदूरी करते थे और उसकी माँ कमला देवी घर और खेत दोनों संभालती थीं। घर की हालत साधारण थी, लेकिन उस घर में एक चीज बहुत कीमती थी — ईमानदारी और अच्छे संस्कार।
रंजीत बचपन से ही मेहनती था। सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता, पिता के साथ खेत में काम करता और फिर जल्दी से नहा-धोकर स्कूल चला जाता। उसके पास ज्यादा कपड़े नहीं थे। उसका स्कूल बैग भी पुराना था और किताबें भी कई बार इस्तेमाल की हुई मिलती थीं।
लेकिन उसके दिल में कुछ कर दिखाने का जज्बा था।
भैरवपुर से लगभग चार किलोमीटर दूर एक और गाँव था — सोनगढ़। वहीं रहती थी सोनी।
सोनी अपने गाँव की सबसे होशियार लड़कियों में गिनी जाती थी। उसकी आँखों में आत्मविश्वास था और मन में बड़े सपने। उसके पिता हरिराम किसान थे और माँ सावित्री देवी एक समझदार और स्नेही महिला थीं।
सोनी बचपन से ही पढ़ाई में बहुत तेज थी। स्कूल के मास्टर भी उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे।
भैरवपुर और सोनगढ़ के बीच एक सरकारी इंटर कॉलेज था। दोनों गाँवों के बच्चे वहीं पढ़ने आते थे।
यही वह जगह थी जहाँ पहली बार रंजीत और सोनी की मुलाकात हुई।
स्कूल का पहला दिन था। रंजीत अपनी पुरानी साइकिल से स्कूल पहुँचा और चुपचाप क्लास की आखिरी बेंच पर जाकर बैठ गया।
कुछ देर बाद क्लास का दरवाजा खुला। एक लड़की अंदर आई। हल्का गुलाबी सूट, कंधों तक बाल और चेहरे पर हल्की झिझक।
वह सोनी थी।

शिक्षक ने उसे सामने वाली बेंच पर बैठने को कहा। क्लास शुरू हुई।
लेकिन रंजीत का ध्यान बार-बार उस नई लड़की की तरफ जा रहा था। वह बड़ी लगन से पढ़ रही थी। जब भी मास्टर जी कोई सवाल पूछते, वह पूरे आत्मविश्वास से जवाब देती।
धीरे-धीरे दिन बीतने लगे और दोनों की बातचीत शुरू हो गई।
पहले पढ़ाई की बातें होतीं। फिर किताबों की। फिर धीरे-धीरे जिंदगी की बातें होने लगीं।
एक दिन स्कूल के बाद दोनों स्कूल के पीछे वाले बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे। हल्की हवा चल रही थी और खेतों से आती खुशबू माहौल को और सुहाना बना रही थी।
सोनी ने अचानक पूछा—
“रंजीत, तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”
रंजीत कुछ पल चुप रहा। फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—
“मुझे नहीं पता मैं क्या बनूँगा। लेकिन इतना जरूर है कि मैं अपने माँ-बाप को कभी दुखी नहीं देखना चाहता।”
सोनी ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ कोई दिखावा नहीं था, बस सच्चाई थी।
उसी दिन से सोनी के मन में रंजीत के लिए एक खास जगह बन गई।
धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होती गई। स्कूल का हर दिन अब दोनों के लिए खास होने लगा। परीक्षा के समय दोनों साथ पढ़ते, छुट्टी के बाद रास्ते में बातें करते और कभी-कभी गाँव के बाहर पुराने पेड़ के नीचे बैठकर अपने सपनों के बारे में बात करते।
वक्त धीरे-धीरे बीतता गया।
दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों को खुद भी पता नहीं चला।
लेकिन गाँव में प्यार ज्यादा दिन छुपा नहीं रहता।
कुछ लोगों की नजर उन पर पड़ गई और धीरे-धीरे यह बात दोनों गाँवों में फैलने लगी।
एक शाम जब रंजीत घर लौटा तो उसके पिता रामनारायण ने गंभीर आवाज में पूछा—
“रंजीत, लोग कह रहे हैं कि तू सोनगढ़ की सोनी के साथ घूमता है। क्या यह सच है?”
रंजीत कुछ पल चुप रहा। फिर उसने सिर झुका लिया और धीरे से बोला—
“बाबा… मैं उससे प्यार करता हूँ। और उससे शादी करना चाहता हूँ।”
घर में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।
माँ कमला देवी ने बेटे की तरफ देखा। उनकी आँखों में चिंता भी थी और ममता भी।
उधर सोनगढ़ में भी यही चर्चा चल रही थी।
जब सोनी के पिता हरिराम को यह बात पता चली तो पहले उन्हें गुस्सा आया। लेकिन जब उन्होंने अपनी बेटी से पूछा और उसकी आँखों में सच्चाई देखी तो उनका गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो गया।
कई दिनों तक दोनों परिवारों में बातचीत चलती रही। गाँव के बुजुर्ग भी बीच में आए।
आखिरकार एक दिन फैसला हो गया।
अगर दोनों एक-दूसरे को सच में चाहते हैं, तो उनकी शादी कर दी जाए।
गाँव के मंदिर में बहुत सादगी से शादी हुई।
न ज्यादा शोर, न ज्यादा भीड़। बस कुछ रिश्तेदार और गाँव के लोग।
सात फेरों के समय जब सोनी ने रंजीत का हाथ थामा, तो उसकी आँखों में एक भरोसा था — कि यह इंसान उसे जिंदगी भर संभालेगा।
शादी के बाद सोनी भैरवपुर आ गई।
शुरू के कुछ दिन बहुत अच्छे बीते। दोनों छोटी-छोटी खुशियों में खुश हो जाते थे। कभी साथ बैठकर चाय पीते, कभी खेतों में घूमने निकल जाते और कभी भविष्य के सपने देखते।
लेकिन धीरे-धीरे जिंदगी की असली परीक्षा शुरू हो गई।
रंजीत ने कई जगह नौकरी ढूँढी। शहर की फैक्ट्री में गया, दुकानों पर पूछा, ट्रांसपोर्ट कंपनी में भी कोशिश की।
लेकिन हर जगह से एक ही जवाब मिला—
“अभी काम नहीं है।”
उधर सोनी भी पढ़ी-लिखी थी, लेकिन गाँव में उसके लिए भी कोई काम नहीं था।
धीरे-धीरे घर की हालत खराब होने लगी।
एक रात दोनों अपने छोटे से कमरे में बैठे थे। बाहर हल्की बारिश हो रही थी और छत से पानी की बूंदें टपक रही थीं।
मिट्टी के दीये की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी।
सोनी चुपचाप बैठी थी। उसकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
रंजीत ने उसकी तरफ देखा और धीरे से कहा—
“सोनी, तुम परेशान मत हो।”
सोनी ने धीमी आवाज में कहा—
“रंजीत, मुझे बुरा लगता है… तुम्हें इतना मेहनत करते देखकर।”
रंजीत मुस्कुराया।
फिर बोला—
“मेहनत से डरना नहीं चाहिए। लेकिन सपनों को छोड़ना नहीं चाहिए।”
सोनी ने उसकी तरफ देखा।
रंजीत ने आगे कहा—
“तुम पढ़ाई में बहुत तेज हो। तुम अफसर बन सकती हो। तुम्हें पढ़ाई जारी रखनी चाहिए।”
सोनी हैरान रह गई।
“लेकिन पैसे?”
रंजीत ने दृढ़ आवाज में कहा—
“पैसों की चिंता मत करो। मैं मजदूरी करूँगा। दिन-रात मेहनत करूँगा। लेकिन तुम्हें जरूर पढ़ाऊँगा।”
सोनी की आँखों में आँसू आ गए।
“क्या तुम सच में इतना सब करोगे मेरे लिए?”
रंजीत मुस्कुराया।
“तुम्हारे लिए नहीं… हमारे सपनों के लिए।”
उस रात दोनों ने एक बड़ा फैसला लिया।
सोनी शहर जाएगी। आगे पढ़ाई करेगी। और आर्मी ऑफिसर बनने की तैयारी करेगी।
और रंजीत गाँव में रहकर मेहनत करेगा।
उसे तब भी अंदाजा नहीं था कि उनका यह फैसला उनकी जिंदगी को किस दिशा में ले जाएगा…
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