शीर्षक: “खाकी और खामोशी” – एक आईपीएस की सबसे बड़ी हार

अध्याय १: धूल और खाकी का आगमन

झारखंड के धनबाद जिले से लगभग पचास किलोमीटर दूर बसा रामपुर गांव आज अपनी सामान्य सुस्ती में नहीं था। दोपहर की चिलचिलाती धूप में गांव की कच्ची सड़क पर अचानक धूल का एक गुबार उठा। एक सफेद सरकारी एसयूवी, जिसकी छत पर नीली बत्ती और नंबर प्लेट पर ‘झारखंड सरकार’ लिखा था, गांव के बरगद वाले चौराहे पर आकर रुकी।

गाड़ी का दरवाज़ा खुला और जैसे ही आरती सिंह बाहर उतरीं, पूरा गांव जैसे पत्थर का हो गया। खाकी वर्दी, कंधों पर तीन चमकते सितारे और चेहरे पर वह कठोरता जिसे पाने के लिए लोग अपना जीवन खपा देते हैं। आरती सिंह, इलाके की चर्चित आईपीएस अफसर। उनकी मौजूदगी में एक ऐसा सन्नाटा था जो किसी सायरन से भी ज़्यादा तेज़ था।

आरती की नज़र सामने की एक जर्जर झोपड़ी पर पड़ी। फूस की दीवारें, टेढ़ी-मेढ़ी चौखट। उन्होंने ड्राइवर को वहीं रुकने का इशारा किया और झोपड़ी की तरफ बढ़ीं। गांव के बुजुर्ग अपनी लाठियां टिकाकर खड़े हो गए, औरतें घूंघट की ओट से झांकने लगीं। वे सब जानते थे कि आरती इसी गांव की बेटी हैं, लेकिन आज वे यहाँ किसी उत्सव के लिए नहीं, बल्कि अपने अतीत के एक अधूरे हिसाब के लिए आई थीं।

झोपड़ी के अंदर मोहन था। वह आदमी, जो कभी आरती की दुनिया का केंद्र था और आज एक भूली हुई याद। आरती दरवाजे पर रुक गई। आज वह एक अपराधी के सामने नहीं, बल्कि अपने उस स्वरूप के सामने खड़ी थी जिसे उसने पाँच साल पहले ‘सफलता’ की बलि चढ़ा दिया था।

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अध्याय २: त्याग की नींव और सफलता का ज़हर

आरती और मोहन की शादी एक समझौते से नहीं, बल्कि एक सपने से शुरू हुई थी। मोहन एक साधारण किसान था, लेकिन उसका दिल पहाड़ों जैसा विशाल था। जब गांव की अन्य लड़कियां चूल्हा-चौका संभाल रही थीं, आरती रात भर लालटेन की रोशनी में यूपीएससी की किताबें पढ़ती थीं।

मोहन पास बैठा रहता। कभी लालटेन की बत्ती ठीक करता, कभी ठंडा पानी लाकर रखता। जब आरती पहली बार परीक्षा में असफल हुई और फूट-फूटकर रोई, तो मोहन ने कोई लंबा भाषण नहीं दिया। उसने बस इतना कहा था, “आरती, रात चाहे कितनी भी लंबी हो, सूरज उसे रोक नहीं सकता। तुम कल फिर पढ़ोगी।”

तीसरी बार में जब आरती का चयन आईपीएस के लिए हुआ, तो मोहन ने उस सरकारी लिस्ट को घंटों देखा था। उसकी आँखों में वह चमक थी जैसे सितारे आरती के कंधों पर नहीं, मोहन के दिल में जड़े गए हों।

लेकिन जैसे ही आरती का प्रशिक्षण शुरू हुआ और उसके बाद पदभार मिला, खाकी का रंग रिश्तों पर भारी पड़ने लगा। मसूरी की ठंडी हवाओं और पुलिस अकादमी के अनुशासन ने आरती के व्यक्तित्व में एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसे पार करना मोहन के लिए असंभव हो गया।

शहर के बड़े घर, अर्दली, सलाम ठोकते सिपाही और सफेदपोश लोगों की महफिलें। मोहन इन सबमें एक ‘अजनबी’ की तरह था। वह आज भी वही सूती कुर्ता और धोती पहनता था। आरती को अब मोहन की सादगी ‘शर्मिंदगी’ लगने लगी थी। एक दिन एक ऑफिशियल डिनर के बाद आरती ने अपना आपा खो दिया और कह दिया, “मोहन, तुम मेरे इस स्तर (level) में फिट नहीं बैठते। लोग पूछते हैं कि मेरा पति क्या करता है, तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता।”

मोहन की चुप्पी उस रात चीख बन गई थी। उसने बस इतना पूछा था, “आरती, क्या सफलता का मतलब अपनों को छोटा देखना है?”

पाँच साल पहले हुए उस तलाक ने केवल एक रिश्ता नहीं तोड़ा था, बल्कि एक विश्वास का कत्ल किया था। मोहन चुपचाप वापस गांव लौट आया, बिना एक पैसा मांगे, बिना कोई शिकायत किए।


अध्याय ३: खामोश गवाही और गांव का आक्रोश (नया विस्तार)

आरती जब झोपड़ी के अंदर पहुंची, तो मोहन एक टूटी हुई चारपाई पर बैठा था। वह और भी पतला और कमजोर हो गया था।

“बैठिए, मैडम,” मोहन ने बिना आँखें मिलाए कहा।

आरती को वह ‘मैडम’ शब्द किसी गोली की तरह लगा। उसने चारों तरफ देखा। दीवार पर आज भी उसकी वह पुरानी फोटो टंगी थी जो ट्रेनिंग पर जाने से पहले ली गई थी। आरती ने पानी मांगा। मोहन ने स्टील के एक पुराने गिलास में पानी दिया।

तभी झोपड़ी के बाहर हलचल हुई। गांव की सबसे उम्रदराज़ महिला, सरोज काकी, अंदर आईं। उनकी आँखों में आरती के लिए सम्मान नहीं, बल्कि एक अजीब सा क्रोध था।

“मैडम, आप यहाँ अपनी वर्दी दिखाने आई हैं या मोहन का हाल देखने?” काकी ने सीधे लहजे में पूछा।

आरती ने हिचकिचाते हुए कहा, “काकी, मैं… मैं बस देखना चाहती थी कि मोहन कैसा है।”

काकी ने एक कड़वी हंसी हँसते हुए कहा, “कैसा होगा? जिस आदमी ने अपनी पूरी जवानी तुम्हें अफसर बनाने में लगा दी, उसे तुमने ‘दो कौड़ी’ का कहकर छोड़ दिया। पाँच साल पहले जब यह वापस आया, तो इसके पास न पैसे थे, न हिम्मत। पर जानते हो इसने क्या किया? इसने गांव के स्कूल के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना शुरू किया। इसने कहा कि वह नहीं चाहता कि इस गांव की कोई और आरती सफलता के नशे में अंधी हो जाए।”

आरती सन्न रह गई। उसे पता चला कि मोहन ने इन पाँच सालों में उन सभी लोगों की कानूनी मदद की, जिन्हें पुलिस परेशान करती थी। वह आरटीआई (RTI) लगाता, छोटे किसानों के लिए लड़ता, लेकिन कभी किसी को नहीं बताया कि उसकी पूर्व पत्नी ज़िले की बड़ी पुलिस अधिकारी है।


अध्याय ४: सिस्टम का प्रहार और मोहन का मौन (नया अध्याय)

आरती को गांव वालों से एक ऐसी सच्चाई पता चली जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी। तीन साल पहले, धनबाद के एक बाहुबली ठेकेदार ने मोहन पर एक झूठा केस दर्ज करवाया था। ठेकेदार चाहता था कि मोहन किसानों की जमीन हड़पने में उसकी मदद करे, लेकिन मोहन अडिग रहा।

मोहन को तीन दिनों तक थाने में रखा गया। वहां के थानेदार ने, जो आरती का ही जूनियर था, मोहन को बहुत प्रताड़ित किया। थानेदार ने हंसते हुए कहा था, “अरे ओ कलेक्टर के पति! एक बार अपनी जोरू को फोन लगा ले, छोड़ दूंगा।”

मोहन ने लॉकअप की सलाखों के पीछे से खून थूकते हुए कहा था, “वह अब मेरी नहीं है। और उसका नाम अपनी गंदी जुबान पर मत लाना।”

आरती के हाथ कांपने लगे। उसे याद आया कि उस दौरान वह एक वीआईपी ड्यूटी में व्यस्त थी और उसे ज़रा भी भनक नहीं लगी कि उसका अपना पति पुलिस की बर्बरता का शिकार हो रहा था। मोहन ने ज़मानत ली, जेल काटी, लेकिन कभी आरती तक खबर नहीं पहुँचने दी। उसने अपना स्वाभिमान नहीं बेचा।


अध्याय ५: अंतहीन पश्चाताप और मोहन का निर्णय

आरती ने मोहन का हाथ पकड़ने की कोशिश की। “मोहन, मुझे माफ कर दो। मैं सब ठीक कर दूंगी। मैं तुम्हें शहर ले चलूंगी, तुम्हारा इलाज कराऊंगी।”

मोहन ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया। उसकी आँखों में नफरत नहीं थी, बस एक गहरी थकान थी।

“आरती, माफी बहुत छोटी चीज़ है। जो बीत गया, उसे आप अपनी सत्ता से नहीं खरीद सकतीं। आपने मुझे तब छोड़ा जब मैं आपके ‘स्तर’ का नहीं था। आज आप यहाँ इसलिए आई हैं क्योंकि आपके अंदर का ‘इंसान’ जाग गया है। पर मेरा क्या? मैंने उस दिन अपनी आवाज़ खो दी थी जब आपने मुझे शर्मिंदगी कहा था।”

मोहन ने उसे दरवाज़े की तरफ इशारा किया। “आप बहुत बड़ी अफसर हैं। गांव के लोगों को आपसे डर लगता है। लेकिन मुझे आपसे सहानुभूति है। आप ऊपर तो पहुँच गईं, पर अकेले।”

आरती झोपड़ी से बाहर निकली। पूरा गांव उसे देख रहा था। खाकी वर्दी का वह रुतबा आज उसे किसी कफन जैसा महसूस हो रहा था। सरकारी गाड़ी में बैठते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा। मोहन फिर से स्कूल के बच्चों की कॉपियाँ चेक करने लगा था।


अध्याय ६: खाकी के पीछे का खालीपन (नया विस्तार)

महीने बीत गए। आरती अपनी ड्यूटी पर लौट आई। उसने उस ठेकेदार और उस थानेदार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की, जिन्होंने मोहन को परेशान किया था। उसने अपनी पूरी सैलरी का एक हिस्सा गांव के स्कूल के नाम कर दिया। लेकिन वह कभी दोबारा रामपुर गांव नहीं जा सकी।

वह अब बड़ी-बड़ी मीटिंग्स में ‘महिला सशक्तिकरण’ पर भाषण देती है, लोग तालियाँ बजाते हैं। लेकिन हर ताली की गूंज में उसे मोहन के उस स्टील के गिलास की खनखनाहट सुनाई देती है। उसे अहसास हुआ कि उसने ‘पावर’ तो पा ली, पर वह ‘आधार’ खो दिया जिस पर वह पावर टिकी थी।

मोहन आज भी उसी झोपड़ी में रहता है। गांव वाले अब उसे ‘मोहन भाई’ नहीं, ‘गुरुजी’ कहते हैं। उसने कभी दूसरी शादी नहीं की। वह कहता है कि उसने अपना हिस्सा जी लिया है।


निष्कर्ष: मानवता का संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि पद, प्रतिष्ठा और वर्दी केवल बाहरी आवरण हैं। असली ‘अफसर’ वह नहीं है जिसके कंधों पर सितारे हों, बल्कि वह है जिसके चरित्र में अडिगता हो। मोहन गरीबी में भी अमीर रहा, जबकि आरती आईपीएस होकर भी दरिद्र निकली।

रिश्तों का मूल्यांकन कभी ‘सफलता’ के पैमाने से नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब आप शिखर पर पहुँचते हैं, तो वहाँ की ठंडक सहन करने के लिए केवल अपनों का ही साथ काम आता है।


समाप्त