झाड़ू-पोछा करती मिली तलाकशुदा पत्नी, फिर जो हुआ…
दिल्ली की चमकती शाम थी। रेस्टोरेंट की रंगीन लाइटें, भीड़ की हलचल और खाने की खुशबू से माहौल गुलजार था। अजय अपने तीन दोस्तों के साथ उसी रेस्टोरेंट में बैठा था, जहां शहर के अमीर लोग अक्सर आते हैं। सब हंसी-मजाक कर रहे थे, मेन्यू देखकर स्पेशल डिश ऑर्डर कर रहे थे। वेटर खाना लेकर आया ही था कि पीछे से एक महिला झाड़ू लगाते हुए आई।
उसकी पोशाक साधारण थी, कमर झुकी हुई, चेहरे पर थकान और आंखों में गहरी उदासी। अजय ने उसकी तरफ देखा, चेहरा जाना-पहचाना सा लगा। दिल की धड़कन तेज हो गई। कहीं यह रिया तो नहीं? वही रिया, जो कभी उसकी पत्नी थी, लेकिन दो साल पहले उसे छोड़कर चली गई थी। अजय ने खुद को समझाया, “नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है?” लेकिन शक दिल में बैठ गया।
महिला ने भी नजरें उठाईं, टेबल पर बैठे अजय को देखा, उसकी सांसें थम गईं। आंखों में आंसू झलक आए, चेहरा सफेद पड़ गया। वह बिना कुछ कहे मुड़ गई और दूसरे कोने में झाड़ू लगाने लगी। अजय बार-बार उसकी तरफ देखता रहा, लेकिन दोस्तों की बातों में खुद को उलझाने की कोशिश करता रहा।
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खाना खत्म हुआ, बिल चुकाया गया, सब बाहर निकल गए। लेकिन अजय का दिल बेचैन था। क्या वाकई वो रिया थी? अगर हां, तो इस हालत में कैसे? पूरी रात करवटों में कट गई। अगली सुबह अजय ने एक पल भी देर नहीं की, सीधे उसी रेस्टोरेंट पहुंच गया।
रिसेप्शन पर जाकर पूछा, “भाई साहब, कल शाम जो महिला झाड़ू-पोछा कर रही थी, उसका नाम क्या है?” रिसेप्शनिस्ट ने जवाब दिया, “वो प्रिया नाम की महिला है। सफाई का काम करती है।” अजय की सांसें अटक गईं। शादी से पहले रिया को उसके परिवार वाले यही नाम से पुकारते थे। अजय ने और जानकारी मांगी, तो कविता नाम की एक सफाई वाली ने एक पुराना सा पता थमा दिया।
वह पता था शहर की सबसे पिछड़ी बस्ती का। अजय कार लेकर वहां पहुंचा। तंग गलियां, कीचड़, नंगे पैर दौड़ते बच्चे और जिंदगी की जद्दोजहद। एक झोपड़ी के सामने अजय की नजर पड़ी, जहां एक महिला सिर झुकाए पुराने कपड़े में सिलाई कर रही थी। अजय चुपचाप खड़ा रहा। महिला ने सिर उठाया, आंखें फटी रह गईं। कपड़ा हाथ से छूट गया, वह अजय के सामने आकर जमीन पर गिर गई और फूट-फूट कर रोने लगी।
“अजय, तुम सच में हो ना?”
वो वही रिया थी, जो कभी सुंदर घर की बहू थी, सोने के गहनों से सजी थी, जिसने एक वक्त कहा था – “तुम्हारा घर छोटा है, मैं वहां नहीं रह सकती।” आज वो एक झोपड़ी में थी, फटे कपड़े, थका चेहरा और टूटी आत्मा लिए।
अजय वहीं खड़ा रहा। दिल के भीतर सैलाब उमड़ रहा था। धीरे-धीरे वो झुक कर उसके पास बैठ गया और बोला, “रिया, यह क्या हाल बना लिया है तुमने? वो लड़का कहां है जिसके लिए तुम मुझे छोड़ गई थी?”
रिया बस सुबकती रही। अजय ने खुद को संभाला, “बताओ सच-सच, तुम यहां कैसे आई?”

रिया ने कांपती आवाज में जवाब देना शुरू किया, “अजय, जब मैं तुम्हारे घर आई थी, सब ठीक था। तुम्हारा प्यार, माता-पिता का स्नेह… लेकिन मुझ में ही कमी थी। मैं लालची थी, दिखावे की शौकीन। गांव के ही एक लड़के ने बड़े सपने दिखाए, मैं उसकी बातों में आ गई। गहने चुराए, पैसे लिए और तुम्हें धोखा देकर भाग गई।”
“शहर के रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही वो लड़का मुझे छोड़कर भाग गया, सारा पैसा लेकर। मैं अकेली रह गई। ना पैसे थे, ना ठिकाना, और सबसे बड़ी बात, किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं बची थी। घर लौटने की हिम्मत नहीं थी। सब कुछ खो दिया था मैंने। सिर्फ तुम्हें नहीं, खुद को भी।”
अजय की आंखें भी अब भर आई थीं। रिया बोली, “छोटे-बड़े घरों में बर्तन धोने लगी, फिर रेस्टोरेंट में सफाई करने लगी। और कल तुम्हें वहां देखा… चाहा कि बात करूं, पर डर गई। सोचा तुमने मुझे माफ नहीं किया।”
अजय ने रिया को उठाया, “मैंने तुम्हें पहचाना जरूर था, पर यकीन नहीं हुआ। जो मेरे घर को छोटा कहकर गई थी, आज झोपड़ी में कैसे हो सकती हो?”
रिया फूट-फूट कर रोने लगी, “मुझे माफ कर दो। चाहो तो पत्नी की जगह मत देना, लेकिन नौकरानी बनाकर अपने घर में रख लो। बस दो रोटी दे देना, तन्हाई से निकाल लो।”
अजय ने गहरी सांस ली, “माफ करना आसान नहीं होता, रिया। तुम्हारा गुनाह छोटा नहीं था, लेकिन शायद तुम्हारा पछतावा उससे बड़ा है।”
“मैं तुम्हें माफ कर सकता हूं, लेकिन एक शर्त पर – पहले अपने माता-पिता से बात करूंगा। सबसे बड़ा जख्म उन्हें लगा था। अगर वह हां कहेंगे, तभी तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा।”
अजय अपने किराए के फ्लैट पर लौटा, उसी शाम मां-बाबूजी को फोन किया। “मां, आज मैं रिया से मिला। वह बहुत पछता रही है।”
मां-बाबूजी बोले, “अगर तू माफ करना चाहता है, तो ला बेटा। लेकिन भरोसे की दीवार टूटने के बाद हर ईंट दोबारा जोड़नी पड़ती है।”
अगली सुबह अजय फिर उस झुग्गी में गया। कार की पिछली सीट पर नए कपड़े, खाने का सामान और एक छोटी चादर थी। रिया ने देखा तो फूट पड़ी, “क्या तुमने मां-बाबूजी से बात कर ली?”
अजय मुस्कुराया, “हां, उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की।”
रिया ने अजय के पैर पकड़ लिए, “अब कभी तुम्हारा भरोसा नहीं तोडूंगी।”
अजय ने उसे उठाया, “अब हम फिर से शुरुआत करेंगे, लेकिन सब धीरे-धीरे साबित करना होगा – मां-बाबूजी को, मुझे और खुद को।”
शाम को अजय रिया को अपने फ्लैट पर ले आया। शुरू के कुछ दिन अजीब थे, मौन बहुत था, लेकिन हर दिन के साथ कुछ बदलने लगा। रिया अब हर सुबह मां के साथ रसोई में काम करती, बाबूजी का ध्यान रखती, घर की सफाई करती। उसकी आंखें कहती थीं, “अब जो मिला है, उसे कभी खोना नहीं है।”
समय बीतने लगा, अजय का बिजनेस फिर से चल पड़ा। दिल्ली के बाहरी इलाके में एक नया घर बनवाया। परिवार फिर से एक हो गया।
रिया अब एक पत्नी, बहू, बेटी और इंसान की जिम्मेदारी निभा रही थी, जो अपनी गलती का प्रायश्चित पूरे जीवन करना चाहती थी।
कहानी यही पूरी होती है, लेकिन एक सवाल छोड़ जाती है – जब कोई इंसान सच्चे दिल से अपनी गलती मानकर लौटना चाहता है, क्या उसे मौका मिलना चाहिए?
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