सबने समझा मामूली भिखारी… लेकिन उस बच्चे ने गाया 100 करोड़ का गाना!

कचरे के ढेर से संगीत की चोटी तक

प्रस्तावना

संगीत वह भाषा है जो रूह से निकलती है और सीधे रूह तक ही पहुंचती है। इसके लिए ना तो महलों की जरूरत होती है और ना ही रेशमी कपड़ों की। मगर समाज की सच्चाई यह है कि लोग हुनर को बाद में और इंसान की हैसियत को पहले देखते हैं। मुंबई की चिलचिलाती धूप, गाड़ियों का शोर, लोगों की भागदौड़ में 12 साल का दीपक अपने नन्हे कंधों पर अपनी उम्र से भी भारी बोरा टांगे चल रहा था। उसका चेहरा धूल और मिट्टी से सना, बाल बिखरे, बदन पर फटी टीशर्ट, अलग-अलग रंग की चप्पलें, उनमें से एक का फीता बार-बार निकल जाता था। वह कचरा बिनने वाला था, सरीदेवी की खचों, नालों और कचरे के ढेर से प्लास्टिक की बोतलें चुनता, ताकि शाम को कबाड़ी वाले को बेचकर अपने और अपनी बीमार मां के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर सके।

लेकिन इस धूल भरे चेहरे और मैले कपड़ों के पीछे एक ऐसा गला छिपा था जिसमें साक्षात सरस्वती का वास था। दीपक जब भी कचरा बीनता, वह धीमे स्वर में कुछ ना कुछ गुनगुनाता रहता था। संगीत ही उसका एकमात्र सहारा था जो उसे इस गरीबी के नरक में भी जिंदा रखे हुए था।

ग्रैंड मेलोडी स्टूडियो के बाहर

आज शहर के सबसे पौश इलाके में स्थित ग्रैंड मेलोडी स्टूडियो के बाहर कुछ अलग ही माहौल था। स्टूडियो के गेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—”फ्यूचर स्टार सिंगिंग ऑडिशन”। Mercedes और BMW जैसी बड़ी गाड़ियों की कतार, अच्छे घरों के बच्चे हाथों में महंगे गिटार लिए, स्टाइलिश कपड़े पहने, माता-पिता के साथ अंदर जा रहे थे। हवा में महंगे इत्र की खुशबू थी, जो दीपक के पसीने की बदबू से बिल्कुल अलग थी।

दीपक स्टूडियो के गेट के पास लगे कूड़ेदान में कुछ बोतलें तलाशने के लिए रुका। उसकी नजर उन बच्चों पर पड़ी जो कारों से उतर रहे थे। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई—एक सपना जो शायद उसके लिए देखना भी मना था। तभी एक कड़क आवाज ने उसका ध्यान तोड़ा।

“ए ओय चल हट यहां से!”
स्टूडियो के सिक्योरिटी गार्ड ने डंडा फटकारते हुए चिल्लाया, “यह जगह तेरे जैसों के लिए नहीं है। भाग यहां से वरना दो डंडे लगाऊंगा तो सारी एकड़ी निकल जाएगी।”

दीपक सहम गया। “साहब मैं बस इस कूड़ेदान से बोतल निकाल रहा था। मुझे अंदर नहीं जाना।”

तभी एक चमचमाती कार आकर रुकी। उसमें से एक अमीर महिला और उसका बेटा उतरे। उस लड़के के हाथ में कोल्ड ड्रिंक की कैन थी। उसने दो घूंट पीकर वो कैन दीपक के पैरों के पास फेंक दी और अपनी मां से कहा, “मॉ देखो यहां कितनी गंदगी है। ऐसे भिखारी लोग स्टूडियो के बाहर क्या कर रहे हैं? इनसे बीमारी फैलती है।”

दीपक ने चुपचाप वह कैन उठाई और अपने बोरे में डाल ली। उस अमीर लड़के की बात उसके दिल में तीर की तरह चुभ गई। उसकी आंखों में आंसू तैरने लगे लेकिन उसने उन्हें बहने नहीं दिया। वह अपना सिर झुकाकर स्टूडियो की दीवार से सटकर थोड़ा दूर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। भूख और अपमान की आग उसके पेट और सीने दोनों में जल रही थी।

संगीत की पुकार

दीपक पेड़ की छांव में बैठा अपनी फटी हुई चप्पल को ठीक करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मन कहीं और ही था। स्टूडियो की एक खिड़की थोड़ी सी खुली रह गई थी, जहां से अंदर चल रहे ऑडिशन की आवाजें बाहर छनकर आ रही थीं। अंदर कोई प्रतियोगी एक कठिन शास्त्रीय बंदिश गाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन बार-बार उसके सुर भटक रहे थे। संगीत के उस अपमान को सुनकर दीपक के अंदर का कलाकार बेचैन हो उठा। वह भूल गया कि कुछ पल पहले ही उसे वहां से दुत्कारा गया था। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और अनजाने में ही उस धुन को गुनगुनाने लगा।

सड़क पर गाड़ियों का शोर था, हॉर्न की आवाजें थीं, लेकिन दीपक के कानों में सिर्फ वो तान गूंज रही थी। धीरे-धीरे उसकी गुनगुनाहट एक स्पष्ट और सुरिली आवाज में बदल गई। उसका गला खुला और एक ऐसी तान निकली जो सीधे रूह को छू ले। वह राग यमन की एक पेचीदा हरकत थी जिसे बड़े-बड़े गायक भी साधने में घबराते हैं। उस कचरे के ढेर और धूल के गुब्बार के बीच बैठा वह मैला-कुचैला लड़का किसी सधे हुए उस्ताद की तरह गा रहा था। उसकी आवाज में दर्द था, वही दर्द जो उसकी गरीबी और संघर्ष की देन था, और यही दर्द उसके सुरों को सच्चा बना रहा था।

शेखर मल्होत्रा की खोज

उसी समय स्टूडियो का पिछला दरवाजा खुला और शेखर मल्होत्रा बाहर निकले। शेखर देश के सबसे बड़े संगीत निर्देशकों में से एक थे और इस शो के मुख्य जज भी थे। वे पिछले 3 घंटों से बेसुरे और सिफारिशी बच्चों को सुन-सुन कर थक चुके थे। उनका सिर दर्द से फट रहा था। वे ताजी हवा खाने और अपने गुस्से को शांत करने के लिए बाहर आए थे। वे अपनी जेब से फोन निकाल ही रहे थे कि अचानक उनके कानों में एक दिव्य आवाज पड़ी। शेखर का हाथ हवा में ही थम गया। “यह कौन गा रहा है?”

आवाज इतनी साफ, इतनी बुलंद और इतनी रूहानी थी कि एक पल के लिए उन्हें लगा कि शायद कोई बड़ा उस्ताद स्टूडियो के बाहर रियाज कर रहा है। वह सम्मोहित होकर आवाज की दिशा में आगे बढ़े। झाड़ियों के पीछे पेड़ के नीचे उन्होंने जो दृश्य देखा, उसने उनके होश उड़ा दिए। वहां कोई उस्ताद नहीं, बल्कि वह 12 साल का कचरा बिनने वाला लड़का बैठा था। आंखें बंद, चेहरा आसमान की तरफ, गले से बहती गंगा जैसी पवित्र आवाज।

शेखर अपनी जगह पर बुत बनकर खड़े रह गए। उन्होंने अपनी जिंदगी में हजारों आवाजें सुनी थीं, लेकिन ऐसी मासूमियत और ऐसा दर्द कभी महसूस नहीं किया था। लड़के के कपड़ों पर मैल थी, लेकिन उसकी आवाज आईने की तरह साफ थी।

तभी उसी सिक्योरिटी गार्ड की नजर शेखर साहब पर पड़ी। उसने देखा कि शेखर साहब उस भिखारी के पास खड़े हैं। गार्ड को लगा कि वह लड़का साहब को परेशान कर रहा है और भीख मांग रहा है। गार्ड घबरा गया कि कहीं उसकी नौकरी ना चली जाए। वह दौड़ता हुआ आया और चिल्लाया, “अरे ओ भिखारी तुझे कहा था ना यहां से भाग जा। तू साहब को तंग कर रहा है।”

गार्ड ने दीपक के कंधे पर जोर से डंडा मारा। दीपक की तान बीच में ही टूट गई। वह दर्द से बिलबिला उठा और सहम कर जमीन पर दुबक गया। उसका गाना चीख में बदल गया।

शेखर का ध्यान टूटा। उन्होंने गुस्से से गार्ड की तरफ देखा। उनकी आंखों में आग थी। “रुको!”
शेखर की आवाज में शेर जैसी दहाड़ थी। शेखर की दहाड़ सुनकर गार्ड के हाथ से डंडा छूट गया। वह हक्का-बक्का रह गया।

शेखर ने गार्ड की ओर उंगली उठाते हुए कड़े शब्दों में कहा, “खबरदार जो अब इसे हाथ भी लगाया। असली गंदगी इस बच्चे के कपड़ों में नहीं, तुम्हारी उस सोच में है जो किसी के हुनर को उसके कपड़ों से टोलती है।”

गार्ड शर्म से पानी-पानी हो गया और सिर झुका कर पीछे हट गया।

दीपक का असली ऑडिशन

शेखर तुरंत घुटनों के बल बैठकर दीपक के बराबर आ गए। उनके महंगे पैंट की परवाह किए बिना वे उस धूल भरी जमीन पर झुक गए। दीपक अभी भी थरथर कांप रहा था। उसने अपना फटा हुआ बोरा कसकर पकड़ रखा था जैसे वहीं उसकी एकमात्र ढाल हो। उसकी आंखों में डर का सैलाब था। “माफ कर दो साहब। माफ कर दो। मैं बस जा ही रहा था। मैं चोरी नहीं कर रहा था साहब। कसम से।”

शेखर ने बहुत प्यार से दीपक के कंधे पर हाथ रखा। उसी कंधे पर जहां गार्ड ने डंडा मारा था। “बेटा डरो मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। बस मुझे सच बताओ, अभी जो गा रहा था वह तुम ही थे ना?”

दीपक ने डरते-डरते अपनी नम पलकें उठाई और धीरे से सिर हिलाया।

शेखर की आंखों में एक उम्मीद जागी। उन्होंने अपनी जेब से पानी की बोतल निकाली और दीपक की ओर बढ़ाई। “पहले पानी पियो और फिर मुझे वही गाना दोबारा सुनाओ। वही तान जो तुम अभी ले रहे थे।”

आसपास खड़ी भीड़ जो अभी तक दीपक को हिकारत से देख रही थी, अब तमाशबीन बनकर खड़ी हो गई। वह अमीर महिला और उसका बेटा भी कार के पास रुक गए। सब हैरान थे कि देश का इतना बड़ा संगीतकार एक कचरे वाले से गाना क्यों सुनना चाहता है?

दीपक ने पानी के दो घूंट पिए। उसका गला तर हुआ। लेकिन मन में अभी भी घबराहट थी। उसने कांपती आवाज में गाना शुरू किया। शुरुआत में आवाज लड़खड़ाई। लेकिन जैसे ही उसने अपनी आंखें बंद की और अपनी मां का चेहरा याद किया उसका डर गायब हो गया। इस बार उसने वह बंदिश नहीं बल्कि अपनी मां के लिए बनाया हुआ एक दर्द भरा लोकगीत गाया—

“मांटी के पुतले तुझे कितना गुमान है
देख ले मुसाफिर, दो दिन की यह शान है…”

जैसे-जैसे दीपक के सुर ऊंचे होते गए, स्टूडियो के बाहर का शोर गुल जैसे थम सा गया। उसकी आवाज में एक ऐसा रूहानी खिंचाव था जिसने वहां खड़े हर शख्स के दिल को जकड़ लिया। वह लड़का जो कुछ देर पहले तक अदृश्य था, अब सबके आकर्षण का केंद्र बन गया था।

रोशनी की ओर

वह अमीर लड़का जिसने कैन फेंकी थी, अब अपना मुंह खोले खड़ा था। गार्ड की आंखों में भी पछतावा झलकने लगा। दीपक का गाना खत्म हुआ तो कुछ पलों के लिए वहां सन्नाटा छाया रहा। फिर शेखर की आंखों से एक आंसू लुढ़क कर उनके गाल पर आ गिरा। उन्होंने आगे बढ़कर दीपक के मैले-कुचैले हाथों को अपने हाथों में थाम लिया।

“तुम्हारा नाम क्या है बेटा?” शेखर ने भारी आवाज में पूछा।

“दीपक साहब,” उसने धीमे से जवाब दिया।

शेखर मुस्कुराए। “दीपक, तुम बाहर अंधेरे में चमकने के लिए नहीं बने हो। तुम्हारी जगह वहां अंदर है रोशनी में।”

फिर शेखर ने वह कहा जिसकी कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं की थी। “चलो मेरे साथ, आज असली ऑडिशन शुरू होगा।”

उन्होंने दीपक का हाथ पकड़ा और उसे स्टूडियो के आलीशान गेट की तरफ ले चले।

स्टूडियो में प्रवेश

दीपक को लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में आ गया हो। अंदर की हवा बर्फीली थी, फर्श इतना चमकदार कि उसमें अपनी मैली सूरत और फटे कपड़े साफ दिखाई दे रहे थे। वह ठिठक गया। उसे डर था कि उसके गंदे पैरों से यह महल जैसा स्टूडियो गंदा हो जाएगा। उसने अपने कदम पीछे खींचने की कोशिश की। लेकिन शेखर की पकड़ मजबूत थी।

“चलो,” शेखर ने धीरे से कहा, “यह फर्श कलाकारों के कदमों से गंदा नहीं, बल्कि पवित्र होता है।”

लेकिन हर कोई शेखर जैसा नहीं सोचता था। जैसे ही वे अंदर लॉबी में पहुंचे, वहां मौजूद सजेधजे लोगों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई। लोग अपनी नाक सिकोड़ने लगे। रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने घृणा से मुंह फेर लिया।

तभी शो के प्रोड्यूसर मिस्टर खन्ना, जो महंगे सूट में थे, दौड़ते हुए आए। उन्होंने दीपक को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर शेखर की तरफ मुड़े।

“शेखर सर, यह क्या मजाक है? यह फ्यूचर स्टार है, कोई चैरिटी शो नहीं। हमारे स्पोंसर्स क्या सोचेंगे? यह लड़का इससे बदबू आ रही है। सिक्योरिटी ने इसे अंदर कैसे आने दिया?”

वह अमीर महिला जिसने बाहर दीपक का अपमान किया था, वह भी वहीं खड़ी थी। उसने तंज कसते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रहे हैं खन्ना जी। मेरा बेटा आर्यन यहां महीनों से तैयारी करके आया है और आप इस कचरे वाले को सीधे अंदर ले आए। यह हमारे बच्चों के साथ अन्याय है। इसे अभी बाहर निकालिए।”

दीपक का सिर शर्म से झुक गया। उसे लगा कि वह सच में गलत जगह आ गया है। उसे अपनी औकात याद आने लगी। वह वापस अपने कचरे के ढेर की तरफ भाग जाना चाहता था। लेकिन शेखर ने दीपक का हाथ नहीं छोड़ा।

असली सितारा

उन्होंने खन्ना और उस महिला की आंखों में आंखें डालकर कहा, “मिस्टर खन्ना, हम यहां फ्यूचर स्टार ढूंढ रहे हैं। फ्यूचर मॉडल नहीं। संगीत गले से निकलता है, कपड़ों से नहीं। और रही बात बदबू की, तो मुझे इस बच्चे के पसीने की गंध आप लोगों के महंगे इत्र और अहंकार की बदबू से कहीं ज्यादा पवित्र लग रही है।”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। शेखर ने एक भी शब्द और नहीं कहा और दीपक को लेकर सीधे रिकॉर्डिंग रूम की तरफ बढ़ गए।

रिकॉर्डिंग रूम की परीक्षा

रिकॉर्डिंग रूम के अंदर दुनिया और भी अलग थी। बड़े-बड़े स्पीकर्स, हजारों बटन वाले मिक्सर और बीच में एक चमचमाता हुआ माइक। शेखर ने दीपक को माइक के सामने खड़ा किया। वह माइक शायद दीपक की पूरी जिंदगी की कमाई से भी महंगा था। दीपक के हाथ-पांव ठंडे पड़ रहे थे। सामने कांच के उस पार खन्ना, वह अमीर महिला और अन्य जज बैठे थे। जिनके चेहरों पर साफ लिखा था कि वे दीपक के फेल होने का इंतजार कर रहे हैं।

शेखर ने हेडफोन दीपक के कानों पर लगाए और कांच के उस पार से इशारा किया। “दीपक, भूल जाओ कि यहां कोई और है। बस सोचो कि तुम अकेले हो और भगवान सुन रहे हैं। बेटा, आज अपनी किस्मत खुद लिखो।”

म्यूजिक शुरू हुआ। यह एक धीमा भावुक ट्रैक था। दीपक ने अपनी आंखें बंद की। एक पल के लिए उसे लगा कि आवाज नहीं निकलेगी। उसका गला सूख गया था। लेकिन फिर उसे अपनी मां की खांसी याद आई, टूटी हुई छत याद आई जिससे बारिश का पानी टपकता था और लोगों की वह दुत्कार याद आई। उस सारे दर्द को उसने अपनी छाती में समेटा और जैसे ही उसने पहला सुर लगाया—

टूटे हुए ख्वाबों के टुकड़ों को जोड़कर
मैंने बनाया है आशियाना
आंसू निचोड़ कर…

दीपक गा नहीं रहा था, वह रो रहा था लेकिन सुरों में। उसकी आवाज में वह कंपन थी जो रूह को झकझोड़ देती है।

स्टूडियो के अंदर का वातावरण बदल गया। जो ऐसी की ठंडक पहले चुभ रही थी, अब दीपक की आवाज की गर्मी ने उसे पिघला दिया था। कांच के उस पार बैठे मिस्टर खन्ना जो उसे बाहर निकालने के लिए उतावले थे, अब अपनी कुर्सी पर बुत बनकर बैठे थे। उनके हाथ से पेन छूट गया। वह अमीर महिला जो अपने बेटे की शान में मग्न थी, उसकी आंखों से अनजाने में ही आंसू बह निकले। उसने अपने बेटे आर्यन का हाथ कसकर पकड़ लिया। आर्यन भी मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। उसे पहली बार समझ आया कि असली टैलेंट क्या होता है।

रिकॉर्डिंग रूम में मौजूद साउंड इंजीनियर के रोंगटे खड़े हो गए थे। उसने अपने करियर में कई बड़े गायकों को रिकॉर्ड किया था, लेकिन ऐसा रॉ और सच्चा टैलेंट आज तक नहीं देखा था। उसने लेवल्स एडजस्ट करना भी छोड़ दिया क्योंकि दीपक की आवाज को किसी तकनीक की जरूरत नहीं थी। वह कुदरती तौर पर ही इतनी सुरीली और पावरफुल थी।

शेखर की आंखों में विजय की चमक थी। उन्होंने अपनी आंखें बंद कर रखी थी और दीपक के हर एक सुर को महसूस कर रहे थे। उन्हें यह पता था कि उन्होंने आज हीरे को कोयले की खान से ढूंढ निकाला है।

जब दीपक ने अंतिम आलाप लिया और गाना समाप्त किया तो एक पल के लिए स्टूडियो में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। दीपक ने डरते-डरते अपनी आंखें खोली। उसे लगा शायद उसने कुछ गलत कर दिया है। वह खामोशी उसे काटने को दौड़ रही थी।

तभी अचानक मिस्टर खन्ना अपनी कुर्सी से उछल पड़े। “अनबिलीवेबल! अद्भुत!” वह चिल्लाए, “यह लड़का तो सोना है, नहीं हीरा है!”

पहचान और बदलाव

खन्ना दौड़ते हुए रिकॉर्डिंग रूम के अंदर आए। उनकी आंखों में अब घृणा नहीं बल्कि लालच चमक रहा था। उन्होंने दीपक को गले लगाने की कोशिश की। जिसे देखकर दीपक थोड़ा पीछे हट गया।

“बेटा, तुमने तो कमाल कर दिया। मैं तुम्हें स्टार बना दूंगा। यह गाना इंटरनेट पर आग लगा देगा। हम इसे कल ही रिलीज करेंगे। यह 100 करोड़ का गाना साबित होगा।”

लेकिन शेखर बीच में आ गए। उन्होंने खन्ना को रोका और शांत भाव से कहा, “खन्ना साहब, अभी तो आप इसे बदबूदार कह रहे थे। अब यह 100 करोड़ का हो गया?”

खन्ना थोड़ा झेप गए। “अरे शेखर, बिजनेस में जज्बात नहीं देखे जाते। इस लड़के की आवाज में जादू है। हम इसके साथ अभी कॉन्ट्रैक्ट साइन करेंगे।”

तभी दीपक ने धीरे से अपना सिर उठाया और मासूमियत से एक सवाल पूछा—जिसने वहां मौजूद सभी बड़ों को शर्मिंदा कर दिया।

“साहब, क्या इस गाने के बदले मुझे ₹500 मिल सकते हैं? मेरी मां की दवाई लानी है।”

करोड़ों के स्टूडियो में करोड़ों की बात करने वाले प्रोड्यूसर के सामने उस बच्चे की यह छोटी सी मांग गूंज उठी। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। क्योंकि दीपक की किस्मत का फैसला एक कागज के टुकड़े पर होने वाला था और एक पुरानी सच्चाई सामने आने वाली थी।

पुरानी सच्चाई का खुलासा

दीपक की ₹500 की मांग ने स्टूडियो के भारीभरकम माहौल को पिघला कर रख दिया था। शेखर की आंखों से आंसू छलक आए। उन्होंने तुरंत अपनी जेब से अपना बटुआ निकाला और उसमें जितने भी पैसे थे, हजारों रुपए सब निकालकर दीपक के नन्हे हाथों में रख दिए।

“यह सब तुम्हारे हैं बेटा।” शेखर ने भावुक होकर कहा, “लेकिन मुझे एक बात सच-सच बताओ। यह गाना, यह बंदिश, यह अदायगी। तुम्हें यह सब किसने सिखाया? कोई साधारण इंसान इतना बारीक काम नहीं सिखा सकता।”

दीपक ने नोटों को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। जैसे उसे डर हो कि यह सपना टूट जाएगा। उसने मासूमियत से जवाब दिया, “मेरी मां ने। वह बहुत अच्छा गाती थी। लेकिन अब वह बहुत बीमार है। खांसती रहती हैं, इसीलिए गा नहीं पाती। मैं बस उन्हें ही सुन-सुनकर सीख गया।”

शेखर के माथे पर लकीरें उभर आईं। “तुम्हारी मां?” उन्होंने खन्ना की तरफ देखा। खन्ना भी हैरान थे।

शेखर ने तुरंत फैसला लिया। “चलो दीपक, हमें अभी तुम्हारी मां के पास ले चलो।”

खन्ना ने नाक भौं सिकोड़ते हुए कहा, “क्या शेखर, अब हम झुग्गी झोपड़ी में जाएंगे? हम यहीं से किसी को भेजकर मदद कर सकते हैं।”

लेकिन शेखर ने उनकी एक ना सुनी। “संगीत की देवी वहां कष्ट में है और तुम आराम की बात कर रहे हो। आना है तो आओ, वरना मैं अकेला जा रहा हूं।”

मजबूरन खन्ना को भी अपने कॉन्ट्रैक्ट के लालच में साथ जाना पड़ा।

सुनंदा राव की वापसी

महंगी गाड़ियां जब उस गंदी बस्ती के बाहर रुकीं तो पूरा मोहल्ला तमाशा देखने जमा हो गया। दीपक आगे-आगे दौड़ा और शेखर, खन्ना उसके पीछे-पीछे कीचड़ और संकरी गलियों से होते हुए एक टूटी फूटी झोपड़ी के पास पहुंचे। वहां बदबू और अंधेरा था।

“मां, देख मैं दवाई के पैसे ले आया!” दीपक झोपड़ी में घुसते ही चिल्लाया।

अंदर एक पुरानी खाट पर एक महिला लेटी हुई थी जो लगातार खांस रही थी। उसके बाल बिखरे थे और चेहरा पीला पड़ चुका था। झोपड़ी में इतना अंधेरा था कि कुछ साफ नहीं दिख रहा था। शेखर ने अपने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई और धीरे से अंदर कदम रखा।

“नमस्ते जी,” शेखर ने कहा, “आपका बेटा बहुत अद्भुत गाता है।”

रोशनी उस महिला के चेहरे पर पड़ी। वह रोशनी से अपनी आंखें बचाने के लिए थोड़ा कसमसाई और उसने अपना चेहरा घुमाया।

जैसे ही शेखर ने उस चेहरे को गौर से देखा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके हाथ से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। वह चेहरा भले ही वक्त और बीमारी ने बर्बाद कर दिया था, लेकिन शेखर उसे पहचानते थे। 15 साल पहले वह आवाज इंडस्ट्री पर राज करने वाली थी, लेकिन अचानक गायब हो गई थी। गंदी राजनीति और झूठे स्कैंडल्स ने उसका करियर खत्म कर दिया था।

शेखर के मुंह से बस एक ही शब्द निकला, एक चीख की तरह—”सुनंदा!”

खाट पर लेटी महिला ने अपना नाम सुनकर चौंक कर देखा। उसकी पथराई आंखों में भी पहचान की एक चमक जागी और फिर शर्म से उसने अपना मुंह चादर में छिपा लिया।

पीछे खड़े मिस्टर खन्ना जो रुमाल से अपनी नाक बंद किए हुए थे, सुनंदा नाम सुनते ही पत्थर के हो गए। उनके चेहरे का रंग उड़ गया। यह वही सुनंदा राव थी जिसे सालों पहले अपनी कंपनी से निकालकर उन्होंने बर्बाद कर दिया था। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने खन्ना की गलत शर्तों को मानने से इंकार कर दिया था।

खन्ना का चेहरा पड़ गया था। 15 साल पुराना पाप आज उनके सामने जिंदा होकर खांसते हुए एक खाट पर पड़ा था। जिस फ्यूचर स्टार को वह आज लॉन्च करने का सपना देख रहे थे, उसकी मां की जिंदगी बर्बाद करने में उनका भी परोक्ष रूप से हाथ था। इंडस्ट्री की राजनीति ने एक देवी जैसी गायिका को कचरा बिनने वाले की मां बना दिया था।

दीपक हैरान होकर कभी शेखर को तो कभी अपनी मां को देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह बड़े साहब उसकी मां को कैसे जानते हैं।

नई शुरुआत

शेखर घुटनों के बल सुनंदा की खाट के पास बैठ गए। उनकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे। उन्होंने सुनंदा का हाथ अपने हाथों में ले लिया।

“हमें माफ कर दो सुनंदा। हम तुम्हें ढूंढते रहे लेकिन तुम ऐसे ओझल हुई कि किसी को खबर तक नहीं लगी। अगर मुझे पता होता कि तुम इस नर्क में जी रही हो…”
शेखर का गला रंध गया।

सुनंदा ने कांपते हाथ से शेखर के सिर पर हाथ रखा। “जो बीत गया वो बीत गया। शेखर, मेरा वक्त तो खत्म हो चुका है लेकिन मेरा दीपक… यह मेरा आखिरी सुर है। इसे वो सब देना जो दुनिया ने मुझसे छीन लिया। बस यही मेरी आखिरी इच्छा है।”

शेखर ने सुनंदा के हाथ को चूमते हुए कसम खाई, “मैं वादा करता हूं सुनंदा। दीपक सिर्फ स्टार नहीं बनेगा, वह एक लीजेंड बनेगा। उसकी आवाज पूरी दुनिया पर राज करेगी और उसे वह इज्जत मिलेगी जो इस इंडस्ट्री ने तुम्हें नहीं दी।”

पीछे खड़े खन्ना ने अपनी जेब से कॉन्ट्रैक्ट के पेपर्स निकाले और उन्हें फाड़ कर फेंक दिया। उन्होंने आगे बढ़कर कहा, “नहीं शेखर, यह पुराना कॉन्ट्रैक्ट नहीं चलेगा। आज से दीपक मेरी कंपनी का पार्टनर होगा, मुलाजिम नहीं। उसकी कमाई का हर एक पैसा उसका होगा। और सुनंदा जी का इलाज मुंबई के नहीं, दुनिया के बेस्ट डॉक्टर्स करेंगे। यह मेरी तरफ से प्रायश्चित है।”

दीपक को समझ नहीं आया कि पार्टनर क्या होता है। लेकिन उसने देखा कि उसकी मां मुस्कुरा रही थी। सालों बाद एक सुकून भरी मुस्कान।

संगीत की जीत

अगले दिन सोशल मीडिया पर दीपक का वीडियो वायरल हो चुका था। लेकिन कैप्शन में लिखा था—”एक खोई हुई आवाज की वापसी। सुनंदा राव का बेटा दीपक राव।” दुनिया हैरान रह गई। दीपक रातोंरात स्टार बन गया। उसे और उसकी मां को उस झोपड़ी से निकालकर एक अच्छे घर में शिफ्ट किया गया। सुनंदा का इलाज शुरू हुआ और धीरे-धीरे उनकी सेहत सुधरने लगी।

कुछ महीनों बाद ग्रैंड मेलोडी स्टूडियो में एक भव्य कॉन्सर्ट हुआ। हजारों लोगों की भीड़ थी। स्टेज पर दीपक खड़ा था। लेकिन आज वह फटे हुए कपड़ों में नहीं, बल्कि एक शानदार कुर्ते में था। शेखर ने पियानो पर धुन छेड़ी। दीपक ने माइक संभाला और अपनी आंखें बंद की। सामने वीआईपी सीट पर सुनंदा बैठी थी, व्हीलचेयर पर ही सही लेकिन सिर ऊंचा करके।

जैसे ही दीपक ने अपनी मां का वही अधूरा गीत पूरा किया, पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दीपक की आंखों से आंसू बहे, लेकिन यह खुशी के आंसू थे। कचरे के ढेर से मिले उस हीरे ने साबित कर दिया था कि हुनर की चमक को कीचड़ छुपा सकता है, लेकिन मिटा नहीं सकता।

उस दिन सिर्फ दीपक की जीत नहीं हुई थी, बल्कि संगीत की जीत हुई थी। एक मां के बलिदान की जीत हुई थी और उस ₹500 की मासूम मांग ने 100 करोड़ के घमंड को हराकर अनमोल इंसानियत को जीत लिया था।

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