बेटी के साथ गलत होने पर पिता ने कर दिया कारनामा/गांव वाले भी देख कर दंग रह गए/

न्याय का पथ: पिता का संघर्ष और बेटी का वकार

अध्याय 1: कमाजपुर की माटी और रामभज का संसार

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले की हलचल से दूर, एक शांत सा गांव बसा है—कमाजपुर। इस गांव की पहचान यहां के मेहनती किसान और उनके खेतों की हरियाली से है। इसी गांव के एक छोटे से कोने में रामभज का तीन एकड़ का खेत है। रामभज, जिसकी उम्र की लकीरें उसके चेहरे पर मेहनत की गवाही देती हैं, अपनी जमीन को सिर्फ मिट्टी नहीं, अपनी मां मानता था।

रामभज का परिवार छोटा था, पर खुशियों से भरा। उसकी पत्नी का देहांत बरसों पहले हो चुका था, और तब से उसकी पूरी दुनिया उसकी इकलौती बेटी मानसी के इर्द-गिर्द सिमट गई थी। मानसी, जो 11वीं कक्षा की छात्रा थी, गांव की सबसे होनहार और संस्कारी लड़की मानी जाती थी। उसके लिए रामभज पिता भी था और मां भी। मानसी सिर्फ पढ़ाई में ही तेज नहीं थी, बल्कि घर के कामकाज और खेतों में अपने पिता का हाथ बटाने में भी कभी पीछे नहीं रहती थी।

गांव वाले अक्सर कहते, “रामभज, किस्मत वाला है तू, जो तुझे मानसी जैसी बेटी मिली। ऐसी संतान तो भाग्य से ही मिलती है।” इन बातों को सुनकर रामभज का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। उसे लगता था कि उसकी सारी थकान मानसी की एक मुस्कुराहट देख कर मिट जाती है।

अध्याय 2: शिक्षक का मुखौटा और गंदी नीयत

उसी गांव के सरकारी विद्यालय में एक शिक्षक कार्यरत था—राकेश। राकेश दिखने में एक सभ्य और विद्वान पुरुष लगता था, लेकिन गांव के लोग उसके असली स्वभाव से अनजान थे। वह छुप-छुप कर नशा करता था और उसका चरित्र संदेह के घेरे में था। 10 दिसंबर 2025 का वह दिन, जब मानसी हमेशा की तरह सुबह 9:00 बजे स्कूल पहुंची, उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि नियति ने उसके लिए क्या जाल बुना है।

उस दिन राकेश उनकी कक्षा में आया। उसने कुछ कठिन सवाल पूछे, जिनका उत्तर कोई छात्र नहीं दे सका। लेकिन जब मानसी ने बारी-बारी से सभी सवालों के सटीक जवाब दिए, तो राकेश की आंखों में प्रशंसा की जगह एक गंदी चमक आ गई। वह मानसी की सादगी और उसकी आभा से प्रभावित तो हुआ, लेकिन उसकी नीयत डगमगा गई।

उसने मानसी के पास जाकर कहा, “मानसी, तुम बहुत प्रतिभाशाली हो। अगर तुम्हें थोड़ा अतिरिक्त मार्गदर्शन मिले, तो तुम जिले में नाम रोशन कर सकती हो। तुम शाम को मेरे पास ट्यूशन के लिए आया करो।”

मानसी ने सहजता से जवाब दिया, “सर, मुझे अपने पिताजी से पूछना होगा।” राकेश ने मुस्कुराते हुए कहा कि वह खुद रामभज से बात कर लेगा। उस शाम जब राकेश रामभज के घर पहुंचा, तो रामभज उसे देख कर गदगद हो गया। एक शिक्षक का उसके घर आना उसके लिए बड़े सम्मान की बात थी। राकेश ने उसे झांसा दिया कि वह मानसी को मुफ्त में पढ़ाएगा क्योंकि वह एक मेधावी छात्रा है। रामभज ने अपनी गरीबी और बेटी के भविष्य को देखते हुए तुरंत हां कर दी।

अध्याय 3: विश्वासघात की पहली काली छाया

28 दिसंबर 2025 की वह सर्द शाम। मानसी अपनी किताबें लेकर राकेश के घर पहुंची। अमूमन वहां अन्य छात्र भी होते थे, पर उस दिन सन्नाटा था। मानसी के पूछने पर राकेश ने बहाना बनाया कि बाकी छात्र आज नहीं आए। जैसे ही मानसी अंदर गई, राकेश ने घर का मुख्य दरवाजा बंद कर दिया।

उस कमरे की दीवारों ने वह चीखें सुनीं जो बाहर नहीं जा सकीं। राकेश ने अपनी ताकत और नशीली प्रवृत्ति के प्रभाव में मानसी के साथ घोर दुर्व्यवहार किया। उसने न केवल मानसी के शारीरिक अस्तित्व को चोट पहुंचाई, बल्कि उसके आत्मसम्मान को भी कुचल दिया। जाते-जाते उसने उसे डराया, “अगर किसी को बताया, तो मैं तुम्हें परीक्षा में फेल कर दूंगा और तुम्हारे पिता को भी नुकसान पहुंचाऊंगा। मेरे पास पैसा है और पावर भी।”

मानसी उस दिन मरी हुई आत्मा के साथ घर लौटी। उसने अपने पिता को कुछ नहीं बताया। यह उसकी पहली और सबसे बड़ी भूल थी। वह नहीं चाहती थी कि उसके पिता की बदनामी हो या वह गुस्से में आकर कोई ऐसा कदम उठाएं जिससे उनका जीवन बर्बाद हो जाए। लेकिन इस चुप्पी ने राकेश के हौसले बढ़ा दिए।

अध्याय 4: स्कूल का त्याग और चुप्पी का बोझ

अगले दिन से मानसी का व्यवहार बदल गया। उसने स्कूल जाने से साफ मना कर दिया। रामभज हैरान था। “बेटी, तू तो पढ़ाई में इतनी तेज थी, फिर अचानक यह क्या हुआ?” मानसी ने सिर्फ इतना कहा, “पिताजी, अब मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता। अगर आप मुझे जबरदस्ती भेजेंगे, तो मैं कुछ गलत कर बैठूंगी।”

बेटी की आंखों में छाई दहशत देख कर रामभज मजबूर हो गया। उसने सोचा शायद पढ़ाई का दबाव ज्यादा है। मानसी अब घर पर रहने लगी और खेतों में पिता की मदद करने लगी। लेकिन उसका मन कहीं और खोया रहता था। वह उदास रहने लगी और उसकी हंसी जैसे गायब हो गई थी।

अध्याय 5: ईख के खेत में दोबारा दुस्साहस

जनवरी 2026 की शुरुआत हुई। 5 जनवरी का दिन मानसी के जीवन में एक और गहरा घाव लेकर आया। रामभज खेत पर काम कर रहा था और उसने मानसी को दोपहर का खाना लेकर आने को कहा। गांव से खेत का रास्ता करीब एक किलोमीटर लंबा था और बीच में घने ईख (गन्ने) के खेत पड़ते थे।

राकेश कई दिनों से मानसी पर नजर रख रहा था। जैसे ही उसने देखा कि मानसी अकेली रास्ते पर जा रही है, उसने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की। सुनसान रास्ते पर उसने मानसी को रोका और चाकू की नोक पर उसे ईख के खेत के अंदर खींच ले गया। वहां उसने फिर से अपनी पाशविकता का प्रदर्शन किया।

इतना ही नहीं, उसने अपने एक और नशेड़ी दोस्त मोनू को फोन कर वहां बुला लिया। मोनू, जो गांव का एक छोटा-मोटा अपराधी था, वहां पहुंचा और उन दोनों ने मिलकर मानसी की गरिमा को तार-तार कर दिया। उन्होंने उसे फिर से धमकी दी कि अगर मुंह खोला तो उसके पिता की लाश गिरेगी। मानसी बेजान होकर खेत से बाहर निकली, अपना टिफिन उठाया और पिता के पास पहुंची। उसने वहां भी कुछ नहीं कहा, बस खाली बर्तन लेकर घर लौट आई और कमरे में बंद होकर रोने लगी।

अध्याय 6: जब सब्र का बांध टूटा

10 जनवरी 2026। रामभज ने गौर किया कि मानसी अब पहले जैसी नहीं रही। वह पीली पड़ गई थी और उसके चेहरे पर मौत जैसी खामोशी थी। उसने बड़े प्यार से मानसी का सिर अपने गोद में रखा और पूछा, “मानसी, मेरी बच्ची, तुझे किसकी नजर लग गई? तू बोलती क्यों नहीं?”

पिता का स्पर्श पाकर मानसी के सब्र का बांध टूट गया। वह लिपटकर बिलख-बिलख कर रोने लगी। उसने एक महीने से सह रहे सारे जुल्मों की दास्तां सुना दी। उसने बताया कि कैसे राकेश और मोनू ने उसे जीते-जी मार दिया है।

रामभज के कानों में जैसे पिघला हुआ सीसा उतर गया। उसके अंदर का बाप मर गया और एक प्रतिशोधी ज्वालामुखी जाग उठा। उसने सोचा कि पुलिस के पास जाने से शायद इन रईस और रसूखदार दरिंदों का कुछ न बिगड़े, क्योंकि वे गवाहों को खरीद सकते थे। उसने खुद न्याय करने का फैसला किया।

अध्याय 7: अंतिम न्याय और प्रतिशोध

शाम के वक्त रामभज ने अपनी ‘कसी’ (मिट्टी खोदने का तेज धार वाला औजार) उठाई। उसने अपने भतीजे राजेश को उन दोनों की लोकेशन पता करने भेजा। राजेश ने खबर दी कि राकेश और मोनू गांव के पुराने खंडर में बैठकर शराब पी रहे हैं।

रात के अंधेरे में रामभज काल बनकर वहां पहुंचा। दोनों नशे में इतने धुत्त थे कि उन्हें अपनी मौत की आहट भी सुनाई नहीं दी। रामभज ने पहले राकेश पर वार किया, वही हाथ जिससे उसने मानसी की गरिमा को छुआ था, उन्हें अलग कर दिया। फिर मोनू की बारी आई। रामभज ने उन दोनों का अंत उसी जगह कर दिया जहां वे अपनी अगली साजिशें बुन रहे थे।

जब वह खून से लथपथ कसी लेकर बाहर निकला, तो कुछ मजदूरों ने उसे देख लिया। उन्होंने पुलिस को सूचना दी।

अध्याय 8: पुलिस स्टेशन और समाज का सवाल

पुलिस ने रामभज को गिरफ्तार कर लिया। जब थाने में पूछताछ हुई, तो रामभज ने बिना किसी डर के पूरी कहानी बयां कर दी। पुलिस वाले भी सन्न रह गए। कानून की नजर में रामभज एक कातिल था, लेकिन गांव के लोगों की नजर में वह एक मजबूर पिता था जिसने अपनी बेटी के सम्मान के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

रामभज पर मुकदमा चला और उसे जेल भेज दिया गया। मानसी अब अकेली थी, लेकिन उसके मन से वह खौफ निकल चुका था। गांव की गलियों में आज भी यह बहस होती है कि क्या रामभज ने सही किया? कानून कहता है गलत, लेकिन एक पिता का दिल कहता है कि न्याय यही था।

निष्कर्ष: यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे समाज में आज भी मानसी जैसी कितनी बेटियां चुप्पी साधे जुल्म सह रही हैं? और कितने राकेश शिक्षक के भेष में घूम रहे हैं? रामभज का कदम कानूनी रूप से अपराध था, लेकिन यह व्यवस्था की विफलता पर एक बड़ा सवालिया निशान भी है।

समाप्त