दुनिया का सबसे बड़ा सौदा
अमृतसर की गलियों में दो यतीम भाई, अमन (15 साल) और रोहन (8 साल), भूख और लाचारी में दिन गुजार रहे थे। उनके माता-पिता एक भयानक बाढ़ में सब कुछ खो बैठे थे। गांववालों ने कुछ दिन सहारा दिया, लेकिन गरीबी में कोई किसी का बोझ कब तक उठाता? आखिरकार दोनों भाई अमृतसर आ गए, उम्मीद थी कि यहां शायद कोई सहारा मिल जाए।
अमन अपने छोटे भाई के लिए दिन-रात मेहनत करता, खुद भूखा रहकर भी रोहन के लिए रोटी का इंतजाम करता। पर किस्मत इतनी बेरहम थी कि कई दिनों से दोनों के पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं गया था। रोहन की हालत इतनी खराब हो गई थी कि वह चल भी नहीं पा रहा था। अमन ने हर जगह मदद मांगी, लेकिन किसी ने उनकी तरफ ध्यान तक नहीं दिया।
एक दिन, अमृतसर के सबसे बड़े कपड़ा बाजार के बाहर एक चमचमाती मर्सिडीज आकर रुकी। उसमें से शहर के मशहूर उद्योगपति सरदार जोगिंदर सिंह निकले। उनके पास दौलत थी, शोहरत थी, लेकिन दिल में एक गहरा खालीपन था—20 साल पहले अपने बेटे को खोने का दर्द।
अमन ने सरदार जी को देखा और अपने बेसुध भाई को पीठ पर लादकर उनके पास दौड़ा। वह उनके पैरों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला,
“साहब, मेरे भाई को खरीद लीजिए। चार दिन से भूखा है। मैं इसका पेट नहीं भर सकता। आप चाहे तो इसे नौकर बना लीजिए, बस इसे दो वक्त की रोटी दे दीजिए।”
यह सुनकर वहां सन्नाटा छा गया। सरदार जोगिंदर सिंह की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें उन बच्चों में अपना खोया हुआ बेटा नजर आया। उन्होंने रोहन को अपनी गोद में उठा लिया और बोले,
“नहीं बेटा, मैं तुम्हारे भाई को नहीं खरीदूंगा। मैं तुम दोनों को अपना बेटा बनाऊंगा।”

सरदार जी दोनों भाइयों को अपने घर ले गए। उनकी पत्नी सतवंत कौर ने भी दोनों को दिल से अपनाया। डॉक्टर बुलवाए गए, रोहन को इलाज मिला, अमन को प्यार मिला। धीरे-धीरे दोनों भाइयों की जिंदगी बदल गई। उन्हें नया घर, नया नाम, नया परिवार मिला। अमन सिंह और रोहन सिंह अब सिंह एंपायर के वारिस बन चुके थे।
समय बीता। अमन ने लंदन से एमबीए किया, रोहन आर्किटेक्ट बन गया। सरदार जोगिंदर सिंह और सतवंत कौर ने अपने बेटों को सिर्फ दौलत ही नहीं, सेवा और इंसानियत के उसूल भी दिए। अमन और रोहन ने अमृतसर में सबसे बड़ा चैरिटेबल हॉस्पिटल और लंगर हॉल बनवाया, जहाँ हर गरीब का इलाज और भोजन मुफ्त था।
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