दिल की ठंडक
हल्की बारिश हो रही थी। बादल ऐसे झुके थे जैसे आसमान खुद किसी दर्द का बोझ उठाए खड़ा हो।
ग्रीन वैली कॉलोनी की सबसे आलीशान हवेली के बाहर काला गेट बंद था। ऊँची दीवारें, कैमरे, गार्ड—सब कुछ था वहाँ… सिवाय खुशियों के।
इस हवेली की मालकिन थी शालिनी वर्मा।
शहर उन्हें एक ही नाम से जानता था — विधवा करोड़पति।
पति की अचानक मौत के बाद उन्होंने दुनिया से नाता लगभग तोड़ लिया था।
दौलत थी, पर अपना कोई नहीं।

एक अनचाहा मेहमान
उसी सुबह एक दुबला-पतला लड़का गेट पर खड़ा था।
कंधे पर पुराना बैग, आँखों में सच्चाई।
नाम — राहुल।
उम्र — मुश्किल से तेईस।
वह एसी मैकेनिक था। दुकान के मालिक ने कहा था —
“बड़ी कोठी है, मालकिन अकेली है, संभलकर बात करना।”
राहुल के लिए हर ग्राहक बराबर था।
हवेली का सन्नाटा
अंदर कदम रखते ही उसे अजीब ठंडक महसूस हुई।
जैसे यहाँ हवा भी धीरे चलती हो।
ड्रॉइंग रूम में सफेद साड़ी में बैठी शालिनी बोलीं —
“एसी ऊपर है।”
आवाज़ सख्त थी, पर थकी हुई।
ऊपर कमरे में राहुल ने देखा —
दीवार पर पति-पत्नी की मुस्कुराती तस्वीर।
टेबल पर दवाइयाँ — नींद की गोलियाँ, एंटी-डिप्रेसेंट्स।
उसका हाथ रुक गया।
तभी नीचे से आवाज आई —
धड़ाम!
टूटन की पहली झलक
शालिनी फर्श पर गिरी थीं।
चेहरा पीला।
राहुल घबराया, पानी दिया, नब्ज़ देखी।
कुछ देर बाद उनकी आँख खुली…
और वो फूट-फूट कर रो पड़ीं।
“सब है… पैसा, बंगला… पर कोई अपना नहीं।”
फिर धीमे बोलीं —
“कल ज़हर खरीदने गई थी।”
राहुल के पास बड़े शब्द नहीं थे।
बस दिल था।
उसने कहा —
“मेरी माँ भी टूटी थीं, पर जी रही हैं… क्योंकि किसी को उनकी जरूरत है।”
शालिनी पहली बार उसे ध्यान से देखने लगीं।
दौलत का अकेलापन
धीरे-धीरे बात खुली।
पति के बाद रिश्तेदारों ने सहारा नहीं, जायदाद देखी।
देवर बिज़नेस माँगने लगा।
सास बोझ कहने लगी।
दोस्त दूर हो गए।
एक रात मदद माँगने गईं तो रिश्तेदार ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
“अकेली औरत आसान शिकार होती है,” उन्होंने कहा।
राहुल ने बस इतना कहा —
“पैसा सुरक्षा नहीं देता… इंसान देते हैं।”
शालिनी चुप हो गईं।
एक अजीब प्रस्ताव
चाय पीते-पीते शालिनी बोलीं —
“रोज आया करो। पैसे दूँगी… बस बात कर लिया करो।”
राहुल मुस्कुराया —
“मैं मैकेनिक हूँ, किराए का इंसान नहीं।”
उन्होंने चेकबुक बढ़ाई।
राहुल ने हाथ पीछे कर लिया।
“इंसानियत की कीमत नहीं होती।”
शालिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
एक रास्ता
राहुल बोला —
“एनजीओ जाइए। वहाँ और भी लोग मिलेंगे जिनका दर्द आप जैसा है।”
पहली बार उनके चेहरे पर उम्मीद की हल्की रेखा आई।
समाज की नजर
अगले दिन कॉलोनी में कानाफूसी शुरू।
“अकेली औरत… लड़का आता-जाता है…”
किसी ने कारण नहीं पूछा।
शालिनी ने पहली बार डर के बजाय फैसला किया।
एनजीओ को फोन लगाया।
आईना दिखाने का दिन
कम्युनिटी हॉल में मीटिंग बुलाई।
सब आए — वही लोग जो बातें करते थे।
शालिनी मंच पर खड़ी हुईं।
“हाँ, मैं विधवा हूँ।
पर इंसान भी हूँ।”
हॉल शांत।
“जिस लड़के पर शक किया… उसने मेरी जान बचाई।”
सबकी नजरें राहुल पर।
“उसने मुझसे कभी कुछ नहीं माँगा… इसलिए मैं उसे बेटा मानती हूँ।”
फिर ऐलान किया —
आधी संपत्ति विधवाओं के लिए ट्रस्ट में जाएगी।
कोई ताली नहीं बजी।
क्योंकि सच तालियों से नहीं, अंतरात्मा से सुना जाता है।
नई शुरुआत
अब शालिनी एनजीओ जातीं।
बैठतीं, सुनतीं, कहतीं —
“मैं भी तुम जैसी ही हूँ।”
राहुल अपना काम करता रहा।
टेक्निकल कोर्स जॉइन किया।
शालिनी ने फीस भरनी चाही — उसने मना कर दिया।
आखिरी संवाद
एक दिन राहुल जाते-जाते बोला —
“अगर मैं नहीं आता, कोई और आता।”
शालिनी मुस्कुराईं —
“नहीं बेटा… इंसान हमेशा नहीं आते।”
“मैडम नहीं… माँ कहो,” उन्होंने कहा।
राहुल ने झुककर कहा —
“हाँ माँ।”
उनकी आँखें भर आईं।
सीख
इस कहानी में न कोई हीरो करोड़पति है,
न गरीब।
हीरो वह है
जो किसी टूटे इंसान के पास
बिना लालच बैठ जाए।
सबसे महंगी चीज पैसा नहीं,
किसी को इंसान समझ लेना है।
क्योंकि एसी ठीक करने वाले बहुत मिलते हैं,
दिल ठीक करने वाले बहुत कम।
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