खामोशी की दीवारें

सुबह का समय था। गली में बच्चों की स्कूल बस का इंतज़ार, दूध वाले की घंटी, मंदिर की आरती—सब कुछ सामान्य था।
पर उस दोमंज़िला मकान के भीतर एक अजीब सी चुप्पी पसरी हुई थी।

नेहा रसोई में खड़ी थी। दाल उबल रही थी, पर उसका ध्यान दरवाज़े पर था। हर आहट पर उसका दिल धड़क उठता।

“नमक ज़्यादा मत डालना,” पीछे से भारी आवाज आई।

“जी पापा जी,” नेहा ने जवाब दिया—लेकिन ‘पापा जी’ कहते ही गला सूख गया।

यह रिश्ता अब सिर्फ नाम का रह गया था।

शुरुआत जो समझ नहीं आई

शादी को अभी दो साल भी नहीं हुए थे।
रोहन अच्छा पति था—शांत, काम में डूबा रहने वाला।
सास कम बोलती थीं।
ससुर विजय प्रताप घर के मालिक जैसे थे—उनका शब्द ही नियम था।

शुरू में सब सामान्य लगा।
फिर छोटी-छोटी बातें बदलने लगीं।

रसोई में अचानक आ जाना।
चुपचाप देखना।
अजीब टिप्पणियाँ—
“बहू होकर ऐसे कपड़े?”
“लड़कियों को मर्यादा में रहना चाहिए।”

नेहा ने पहले इसे सख्ती समझा।
फिर डर लगने लगा।

डर जो नाम नहीं लेता

एक दिन पूजा करते समय उसे साफ महसूस हुआ—कोई उसे देख रहा है।
सिर उठाया—विजय प्रताप खड़े थे।

उनकी आँखों में कुछ था…
जिसे वह समझ नहीं पाई,
पर डर गई।

रोहन देर से आता।
नेहा कहना चाहती—
पर कैसे कहे?

“तुम्हारे पापा मुझे अजीब तरह से देखते हैं…”
यह वाक्य उसके होंठों तक आकर रुक जाता।

अगर रोहन ने उस पर ही शक कर लिया तो?

उसने चुप रहना सीख लिया।

सीमाएँ टूटने लगीं

एक शाम घर में सिर्फ दो लोग थे—नेहा और विजय प्रताप।

“बैठो,” उन्होंने कहा।
“डरती हो क्या?”

उनकी मुस्कान में गर्मी नहीं, खतरा था।

“इस घर की इज़्ज़त तुम्हारे हाथ में है,” उन्होंने कहा।
यह सलाह नहीं—इशारा था।

उस रात नेहा सो नहीं पाई।

पहली बगावत

डर धीरे-धीरे समझ में बदला।
नेहा ने डायरी लिखनी शुरू की—
तारीख, समय, शब्द।

उसकी खामोश लड़ाई शुरू हो चुकी थी।

एक दिन सास शारदा देवी ने धीमे से पूछा—
“तू ठीक है ना?”

उनकी आँखों में भी डर था।
नेहा समझ गई—वह अकेली नहीं है।

सच का दिन

स्टोर रूम में विजय प्रताप ने रास्ता रोका।
“बहुत समझदार बन रही हो।”

नेहा ने पहली बार कहा—
“आप सीमाएँ पार कर रहे हैं।”

उसी पल पीछे से आवाज आई—
“यहाँ क्या हो रहा है?”

रोहन दरवाज़े पर खड़ा था।

कमरे में सन्नाटा।

नेहा ने डायरी उसके हाथ में दे दी—
“पहले इसे पढ़ो।”

रोहन पढ़ता गया।
उसका चेहरा बदलता गया।

यह कहानी नहीं थी—
उसकी पत्नी की खामोश चीखें थीं।

बेटे का फैसला

रोहन ने पिता से कहा—
“आप मेरे पिता हैं…
पर मेरी पत्नी के अपराधी भी।”

घर दो हिस्सों में बंट गया।

विजय प्रताप ने धमकी दी—
“यह घर मेरा है।”

रोहन बोला—
“मैं घर छोड़ सकता हूँ, इंसानियत नहीं।”

नई शुरुआत

छोटा सा किराए का फ्लैट।
पर पहली बार चैन की नींद।

कानूनी लड़ाई आसान नहीं थी।
समाज ने बातें बनाईं—
“घर की बात बाहर क्यों गई?”
“बहू ने घर तोड़ दिया।”

नेहा ने जवाब देना छोड़ दिया।

कोर्ट में

जब नेहा गवाही के लिए खड़ी हुई—
उसने सिर्फ सच कहा।
कोई नाटक नहीं, कोई आँसू नहीं।

“चुप्पी गलत को ताकत देती है,” उसने कहा।

जज का फैसला साफ था—
नेहा को सुरक्षा मिली।
और सच को मान्यता।

आगे की राह

कुछ महीनों बाद नेहा एक संस्था से जुड़ गई—
जहाँ वह ऐसी ही औरतों की मदद करती।

वह अब पीड़ित नहीं, सहारा थी।

एक शाम बालकनी में चाय पीते हुए उसने रोहन से कहा—
“अगर तुम साथ ना देते…”

रोहन मुस्कुराया—
“अगर तुम सच ना बोलतीं,
तो मैं भी गलत के साथ खड़ा होता।”

सीख

यह कहानी ससुर की नहीं,
एक औरत की है जो डरी—पर चुप नहीं रही।

और एक बेटे की
जिसने रिश्तों से पहले इंसानियत चुनी।