ठाणे की फैक्ट्री और एक अनदेखा हीरो

साल 2018। मुंबई की चकाचौंध से थोड़ा दूर, ठाणे-बेलापुर इंडस्ट्रियल एरिया की संकरी गलियों में मशीनों का शोर कभी थमता नहीं था। दिन-रात धुआँ उगलती चिमनियों के बीच हजारों मजदूर अपनी जिंदगी खपा रहे थे।

इसी इलाके में खड़ी थी वर्धन केमिकल्स प्राइवेट लिमिटेड—एक 40 साल पुरानी कंपनी। इसके साबुन और डिटर्जेंट भारत के लाखों घरों में इस्तेमाल होते थे।

कंपनी के मालिक थे हरीशवर्धन—अनुशासनप्रिय, सख्त और डिग्रियों पर अटूट विश्वास रखने वाले। उनके लिए बड़ी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई ही काबिलियत का पैमाना थी। कंपनी में नौकरी डिग्री के वजन से मिलती थी, हुनर से नहीं।

लेकिन वक्त बदल चुका था।

10वीं फेल लड़के ने करोड़पति से कहा– 3 महीने दो, कंपनी बदल दूँगा… वरना मुझे जेल भेज देना 😱 - YouTube

गिरती हुई बादशाहत

2017 के अंत तक कंपनी घाटे में जाने लगी। मार्च 2018 की एक सुबह जब हरीशवर्धन ने रिपोर्ट देखी, उनके चेहरे का रंग उड़ गया। करोड़ों का नुकसान। “सुरक्षा साबुन” की बिक्री गिर चुकी थी। नए ब्रांड सस्ते और बेहतर थे।

इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई।

एसी कॉन्फ्रेंस रूम में बैठे एमबीए मैनेजर ग्राफ और चार्ट दिखा रहे थे—ग्लोबल मंदी, कच्चे तेल के दाम, मार्केट ट्रेंड्स…

बहुत अंग्रेज़ी थी।
बहुत तर्क थे।
पर समाधान नहीं था।

हरीशवर्धन समझ रहे थे—सच कहीं और है।

फैक्ट्री का दूसरा सच

उसी फैक्ट्री के पिछले हिस्से में एक दूसरी दुनिया थी—गर्मी, केमिकल की गंध और मशीनों का शोर।

वहीं काम करता था मोहन—23 साल का हेल्पर।

दसवीं में फेल।
कोई डिग्री नहीं।
तेल से सने कपड़े।
लेकिन तेज दिमाग।

मोहन मशीनों को सिर्फ चलाता नहीं था—समझता था।

वह देखता था:

परफ्यूम वाल्व से टपककर बर्बाद हो रहा है
बोरियां गलत तरीके से रखी जा रही हैं
ट्रक घंटों खड़े रहते हैं
साबुन में केमिकल कम डाला जा रहा है

उसने बताया भी…
पर जवाब मिला—“अपना काम कर।”

बारिश वाली शाम

20 अप्रैल 2018।

तेज आंधी-बारिश।
शिफ्ट खत्म।
मजदूर घर भाग रहे थे।

हरीशवर्धन अपनी कार की ओर बढ़ रहे थे।
मोहन छज्जे के नीचे खड़ा था।

उसने सोचा—आज नहीं बोला तो कभी नहीं बोल पाऊंगा।

वह दौड़ा।
गार्ड्स ने रोका।
वह कार के सामने खड़ा हो गया।

गाड़ी रुकी।

“क्या चाहिए?” मालिक गरजे।

मोहन बोला:

“साहब, नौकरी नहीं चाहिए। बस बताना है—कंपनी क्यों डूब रही है।”

उसका आत्मविश्वास देखकर हरीशवर्धन ने उसे कार में बैठा लिया।

सच का खुलासा

मोहन ने एक-एक राज खोल दिया:

खराब बेल्ट से प्रोडक्शन रुकता है
गोदाम की छत से पानी टपकता है
साबुन की क्वालिटी जानबूझकर घटाई गई

हरीशवर्धन स्तब्ध थे।

“तुम कर क्या सकते हो?” उन्होंने पूछा।

मोहन बोला:

“90 दिन दीजिए। सैलरी नहीं चाहिए। बस फैसले लेने की छूट।
लागत 20% कम न हुई तो जेल भेज देना।”

यह जुआ था।
पर मालिक के पास विकल्प नहीं था।

भूचाल

अगले दिन नोटिस लगा:

“90 दिनों के लिए फैक्ट्री ऑपरेशंस की जिम्मेदारी मोहन को।”

एमबीए मैनेजर्स बौखला गए।

पर हरीशवर्धन बोले—“मुझे रिजल्ट चाहिए।”

मोहन का तरीका

मोहन ने:

केबिन छोड़ा, फ्लोर पर बैठा
अनुभवी मजदूरों को टीम में लिया
सस्ते टिकाऊ वाल्व लगाए
टोकन सिस्टम शुरू किया
क्वालिटी सुधारी
नीम-नींबू की खुशबू वाला नया फॉर्मूला बनाया

बचत शुरू हुई।
मजदूरों में जोश आया।

साजिश

मैनेजर्स ने सप्लायर्स को भड़काया।
कच्चा माल रुक गया।

मोहन खुद गया।
ईमानदारी से बात की।

सप्लायर्स मान गए।

फैसले का दिन

30 जुलाई 2018।
बोर्ड मीटिंग।

मैनेजर सक्सेना ने मोहन को फेल घोषित कर दिया।

तभी दरवाजा खुला।

रामदीन काका 50 मजदूरों के साथ अंदर आए।
हाथ में रजिस्टर और प्रोडक्ट।

“मालिक, यह असली रिपोर्ट है।”

25% लागत कम
30% मुनाफा ज्यादा
डीलरों के एडवांस चेक

कमरे में सन्नाटा।

ऐतिहासिक पल

हरीशवर्धन खड़े हुए।
मोहन के पास गए।

पूरे बोर्डरूम के सामने बोले:

“आज समझ आया—बिजनेस डिग्री से नहीं, ईमानदारी से चलता है।”

उन्होंने मोहन को बनाया:

चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर

तालियां गूंज उठीं।
मजदूर रो पड़े।

एक साल बाद

2019 तक कंपनी फिर नंबर वन।

मोहन रोज फ्लोर पर जाता।
मजदूरों संग चाय पीता।
उनकी सुनता।

कहानी का सच

यह कहानी सिखाती है:

नंबर नहीं, नजर जरूरी है
डिग्री नहीं, समझ जरूरी है
अंग्रेज़ी नहीं, ईमानदारी जरूरी है

असली हीरो वह है