गंगानगर रेलवे स्टेशन की रातें अलग होती हैं।
दिन की भीड़ थककर लौट जाती है, लेकिन प्लेटफॉर्म की बत्तियां और इंतज़ार जागते रहते हैं।
उस रात भी करीब दस बजे का समय था। प्लेटफॉर्म नंबर दो पर कुली अपनी लाल कमीज उतार रहे थे, चाय वाले आख़िरी उबाल दे रहे थे, और बाहर ऑटो स्टैंड पर लंबी लाइन में खड़े ऑटो जैसे उम्मीद की डोरी से बंधे थे।
उन्हीं ऑटो वालों में एक था — विजय सिंह।
उम्र करीब 33 साल। साधारण कपड़े। हल्की दाढ़ी। आंखों के नीचे थकान।
लेकिन चेहरे पर एक चीज साफ दिखती थी — आत्मसम्मान।
उसका दिन लंबा था, कमाई कम थी, और चिंता बड़ी।
उसके पिता अस्पताल में भर्ती थे। हर दिन की कमाई अब सिर्फ पैसे नहीं, दवाइयों की सांस बन चुकी थी।
एक छोटी मुलाकात
उसी रात उसकी नजर एक महिला पर पड़ी।
कंधे पर लैपटॉप बैग, हाथ में थैले, पीछे भारी सूटकेस।
वह कई ऑटो वालों से पूछ रही थी —
“सरिता नगर चलोगे?”
किसी ने सामान का बहाना बनाया, किसी ने रात का।
विजय कुछ पल सोचता रहा। फिर आगे बढ़ा।
“मैडम, आइए। सामान अब आपकी नहीं, मेरी जिम्मेदारी है।”
महिला ने उसे देखा — थकी हुई थी, लेकिन उसकी बात में सच्चाई थी। वह बैठ गई।
रास्ते भर हल्की बातचीत हुई।
“नई पोस्टिंग है,” महिला ने बताया।
“पुलिस सर्विस।”
विजय ने मुस्कुराकर कहा,
“अच्छा है मैडम। मेरा भी सपना था पढ़ने का… पर बाबूजी बीमार पड़ गए।”
सरिता नगर आ गया।
भाड़ा देते समय महिला ने उसका नाम पूछा।
“विजय सिंह।”
उसने नंबर सेव किया और कहा,
“कभी जरूरत पड़े तो कॉल करना।”
विजय ने सिर झुका दिया।
उसे क्या पता था — यह नंबर कभी उसकी किस्मत बदल देगा।
छह महीने बाद
जिंदगी बाहर से वही थी।
ऑटो, स्टेशन, सवारी।
लेकिन अंदर से सब बदल चुका था।
पिता की बीमारी बढ़ रही थी।
उधार बढ़ रहा था।
नींद घट रही थी।
ऊपर से पुलिस का हफ्ता।
विजय झगड़ालू नहीं था।
सीधा आदमी था।
और सिस्टम को ऐसे लोग आसान लगते हैं।
वह देता रहा।
कभी कम, कभी ज्यादा।
वह दिन
एक शाम दो हवलदारों ने उसे रोका।
“हफ्ता नहीं दिया दो हफ्ते से।”
विजय ने हाथ जोड़ लिए।
“साहब, बाबूजी अस्पताल में हैं…”
जवाब में थप्पड़ पड़ा।
भीड़ देखती रही।
कोई बोला नहीं।
उस शाम वह घर नहीं गया।
एक चाय की दुकान के पीछे बैठा रहा।
उसने बुदबुदाया —
“अब नहीं सहूंगा।”
जेब से पुराना टूटा फोन निकाला।
कॉन्टैक्ट लिस्ट खोली।
नाम चमका — प्रिया शर्मा।
उसने फोन बंद कर दिया।
अभी नहीं।
अगला थप्पड़
अगले दिन फिर रोका गया।
इस बार तीन पुलिस वाले।
“हफ्ता?”
“आज नहीं है,” विजय ने कहा।
इस बार थप्पड़ और जोर का था।
ऑटो की चाबी छीन ली गई।
ऑटो थाने ले जाया गया।
विजय सड़क पर खड़ा रह गया।
उसे पहली बार समझ आया —
गरीबी सिर्फ पैसों की कमी नहीं, आवाज़ की कमी भी होती है।
वह कॉल
उस रात उसने फिर फोन निकाला।
हाथ कांप रहे थे।
दिल तेज धड़क रहा था।
उसने कॉल लगा दी।
“हेलो?”
सख्त लेकिन शांत आवाज।
“मैडम… मैं विजय…”
कुछ सेकंड की चुप्पी।
“हां विजय, याद है। क्या हुआ?”
उसका बांध टूट गया।
सब बता दिया।
दूसरी तरफ आवाज बदल चुकी थी।
“तुम कहां हो?”
“स्टेशन के पास।”
“वहीं रहो। कहीं मत जाना।”
फोन कट गया।
सिस्टम हिल गया
करीब डेढ़ घंटे बाद सायरन की आवाज गूंजी।
जीपें थाने में दाखिल हुईं।
सबसे आगे — प्रिया शर्मा।
वर्दी में।
आंखों में सख्ती।
सीधे बोली —
“ऑटो चालक को किसने मारा?”
सन्नाटा।
कुछ ही मिनटों में निलंबन आदेश लिखे गए।
आंतरिक जांच शुरू।
“वर्दी सेवा के लिए है, डर फैलाने के लिए नहीं,” jobती प्रिया की आवाज पूरे थाने में गूंजी।
विजय की वापसी
उसका ऑटो वापस मिला।
चाबी उसके हाथ में दी गई।
प्रिया ने कहा,
“घर जाओ। और कल अपने पिता से मिलना।”
विजय ने डरते हुए पूछा,
“मैडम, मुझे परेशानी तो नहीं होगी?”
प्रिया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,
“जब तक मैं यहां हूं, सच बोलने वाले को परेशानी नहीं होगी।”
बदलाव
अगले दिन अखबारों में खबर थी।
स्टेशन पर लोग उसे पहचान रहे थे।
“भाई, हिम्मत दिखाई तूने।”
विजय मुस्कुरा देता।
यह मुस्कान सस्ती नहीं थी।
थाने में फाइलें खुलीं।
पुरानी शिकायतें निकलीं।
लोग संभल गए।
एक छोटी सीख
अस्पताल में पिता ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“तू झुका नहीं — यही मेरी जीत है।”
विजय ने आसमान की तरफ देखा।
वही शहर था, वही मेहनत।
लेकिन अब उसकी पीठ सीधी थी।
उसके फोन में सेव वह नंबर अब सिर्फ संपर्क नहीं था —
याद दिलाता था:
इज्जत मांगी नहीं जाती, कमाई जाती है।
अंत की बात
यह कहानी चमत्कार की नहीं है।
यह आवाज़ की है।
जब सही इंसान चुप रहता है, गलत मजबूत होता है।
जब वह बोलता है — सिस्टम हिलता है।
गरीब होना गुनाह नहीं।
हर बार चुप रह जाना कभी-कभी गुनाह बन जाता है।
और विजय ने वह गुनाह करना छोड़ दिया था।
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