नेहा की दर्द भरी दास्तान
दोस्तों, कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया जहाँ एक मासूम औरत की जिंदगी अचानक उजड़ जाती है। उसके सारे सपने टूट जाते हैं और वह अपनी नन्ही सी बेटी के साथ सड़कों पर भटकने को मजबूर हो जाती है। लेकिन फिर एक अनजान शख्स की इंसानियत उसकी पूरी किस्मत बदल देती है।
नेहा नाम की महिला, उम्र बस 24 साल। एक सामान्य घरेलू औरत, अपने छोटे से गाँव में खुशहाल जीवन जी रही थी। उसका पति राजेश उसके लिए सब कुछ था। दोनों की जिंदगी की रौनक थी उनकी 4 साल की बेटी दिव्या।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक राजेश को गंभीर बीमारी ने घेर लिया। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए, और कुछ ही दिनों में वह इस दुनिया से चला गया। नेहा की दुनिया उजड़ गई। वह रोती रही, सोचती रही कि अब वह और उसकी बेटी कैसे जिएंगी।
राजेश के जाने के बाद नेहा के पास न कोई सहारा था, न कमाई का जरिया। सबसे बड़ा सदमा तब लगा जब उसके ससुराल वाले, जो कभी उसे बेटी कहते थे, अब उसे बोझ समझने लगे। उन्होंने साफ कह दिया कि हमारे घर में अब तेरी कोई जगह नहीं है। अगर तेरे पेट से बेटा होता तो शायद हम तुझे रख लेते, लेकिन तू तो सिर्फ बेटी की माँ है।
नेहा का दिल टूट गया। उसने दिव्या को सीने से लगाकर खूब रोया। लेकिन ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल दिया, जैसे वह कोई अनचाही चीज हो।
अब नेहा के पास कोई ठिकाना नहीं था। उसने सोचा शायद मायके में कुछ राहत मिलेगी। वह अपनी बूढ़ी माँ और पिता के पास दिल्ली के छोटे से घर पहुँची, जहाँ उसका बचपन बीता था। लेकिन वहाँ भी हालात अच्छे नहीं थे। माता-पिता खुद गरीबी से जूझ रहे थे। भाई-भाभी का व्यवहार और भी क्रूर था। भाभी रोज ताने मारती, “कितने दिन यहाँ पड़ी रहेगी? हम पर बोझ क्यों बन रही है?” नेहा यह सब सुनकर चुपचाप आँसू पी जाती, लेकिन अंदर ही अंदर टूट रही थी।
नेहा ने सोचा, “अगर मैं यहाँ रही तो मेरे माँ-बाप को भी तानों का सामना करना पड़ेगा। क्यों न मैं खुद ही निकल जाऊँ और किसी का बोझ न बनूँ?”
एक रात, जब सब सो चुके थे, नेहा ने दिव्या को गोद में उठाया, आँसू पोछे और चुपचाप घर से निकल पड़ी। उसने ठान लिया कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, वह अपनी बेटी को हर हाल में बड़ा करेगी। उसे अच्छी जिंदगी देगी, चाहे इसके लिए कितना भी संघर्ष क्यों न करना पड़े।
कुछ दिनों तक भटकने के बाद नेहा दिल्ली के एक व्यस्त इलाके में पहुँची। वहाँ उसने एक छोटा सा किराए का कमरा लिया, जो बस चार दीवारों का था। कोई सुविधा नहीं, लेकिन वहीं रहकर गुजारा करने लगी। अपनी और दिव्या की पेट भरने के लिए वह घर-घर जाकर काम करने लगी। सुबह से शाम तक लोगों के घरों में बर्तन मांजती, झाड़ू-पोछा करती, कपड़े धोती और जो थोड़े पैसे मिलते, उसी से दिव्या को खाना खिलाती।
यह काम आसान नहीं था। लोग उसे नीची नजर से देखते, बच्चे चिढ़ाते कि “अरे, ये तो हमारी नौकरानी है।” नेहा हर अपमान सहती, आँसू पी जाती। लेकिन दिव्या के चेहरे को देखकर वह सब भूल जाती क्योंकि वही उसकी जीने की वजह थी।

दिन गुजरते गए, मुश्किलें बढ़ती गईं। किराया चुकाना मुश्किल हो गया। कई बार सोचती कि दिव्या के लिए दूध लाऊँ या मकान मालिक को किराया दूँ। इन्हीं हालातों में एक दिन उसका मकान मालिक, जो एक बुजुर्ग आदमी था, उसके कमरे में आया और बोला, “बेटी, अगर तुम्हें और काम की जरूरत है तो मैं एक जगह जानता हूँ, वहाँ एक अमीर आदमी रहता है, उसके घर में नौकरानी की जरूरत है।”
नेहा की आँखों में उम्मीद की एक छोटी सी चमक आई। उसने सोचा शायद यह उसके और दिव्या के लिए नया रास्ता हो सकता है। लेकिन उसे क्या पता था कि वह घर उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल देगा।
नेहा अपने मकान मालिक के साथ उस घर पहुँची। दिल्ली के शांत इलाके में, बड़े-बड़े बंगले। एक आलीशान मकान के सामने खड़ी हो गई। बाहर बड़ा सा गेट, ऊँची दीवारें, अंदर वीरान सन्नाटा।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला, सामने एक युवक खड़ा था—लंबा, गोरा, लेकिन चेहरे पर गहरी उदासी। उसकी उम्र मुश्किल से 27 साल होगी।
मकान मालिक ने कहा, “साहब, यह नेहा है, बहुत मजबूर है, घर-घर काम करती है। अगर आप चाहें तो यह आपके घर का काम संभाल सकती है।”
युवक ने नेहा को देखा, फिर उसकी गोद में सिमटी दिव्या पर नजरें ठहर गईं। जैसे वह बच्ची उसे अपनी कोई याद दिला रही हो। नेहा ने झिझकते हुए कहा, “साहब, अगर आप कहें तो मैं आपके घर का झाड़ू-पोछा, खाना बनाना, सब काम कर दूँगी। बस इतना कर दीजिए कि मुझे और मेरी दिव्या को यहाँ रहने और खाने की जगह मिल जाए।”
युवक कुछ देर चुप रहा, फिर दरवाजा खोलकर बोला, “अंदर आओ।”
नेहा अंदर गई, घर की विशालता देखकर हैरान रह गई, लेकिन हर कोने में धूल जमी थी। सामान बिखरा हुआ, दीवार पर एक तस्वीर थी जिसमें युवक अपनी पत्नी और बेटी के साथ मुस्कुराता नजर आ रहा था। नेहा समझ गई कि इस तस्वीर के पीछे कोई बड़ा दर्द छुपा है।
युवक ने कहा, “मेरा नाम रोहन है। मैं कभी अपने माता-पिता, पत्नी और बेटी के साथ बहुत खुश था। लेकिन कुछ महीने पहले एक भयानक एक्सीडेंट में सब कुछ छिन गया। सिर्फ मैं अकेला बचा हूँ।”
यह कहते-कहते रोहन की आँखें भर आईं।
नेहा चुपचाप सुनती रही, अपनी दिव्या को और कसकर लगाया। रोहन की नजरें बार-बार दिव्या पर जा रही थीं, उसे लग रहा था जैसे उसकी अपनी बेटी लौट आई हो।
धीरे से वह बोला, “तुम्हारी बच्ची का नाम क्या है?”
नेहा ने कहा, “दिव्या।”
रोहन मुस्कुराया, “वह बिल्कुल मेरी परी जैसी है।”
नेहा ने पहली बार उस घर में थोड़ी सी गर्माहट महसूस की। रोहन ने तुरंत कहा, “तुम यहीं रहो, घर का काम संभालो। तुम्हें और दिव्या को अब किसी चीज की कमी नहीं होगी।”
नेहा की आँखों से आँसू छलक पड़े।
वह सोचने लगी कि शायद यह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा पल है। लेकिन उसे क्या पता था कि यह रिश्ता मालिक-नौकरानी का नहीं रहेगा, बल्कि इंसानियत से बढ़कर प्यार और परिवार का रूप ले लेगा।
नेहा ने उस घर में काम शुरू कर दिया। सुबह उठकर झाड़ू-पोछा करती, रसोई में खाना बनाती, घर के हर कोने को साफ करती। धीरे-धीरे वह वीरानी मिटाने लगी। लेकिन यह सिर्फ काम तक नहीं रहा, दिव्या की मासूमियत ने पूरे घर को बदल दिया।
दिव्या छोटी थी, उसकी हँसी घर भर देती। वह आंगन में खेलती, कमरों में दौड़ती, खिलखिलाती। रोहन चुपचाप उसे देखता रहता, उसकी आँखों में आँसू आ जाते, चेहरे पर खोई हुई मुस्कान लौट आती। उसे लगता जैसे उसकी बेटी फिर से जीवित हो गई हो।
एक दिन दिव्या खेलते-खेलते गिर गई, उसके घुटने से खून निकलने लगा। नेहा घबराकर दौड़ी, लेकिन रोहन पहले पहुँचा। उसने दिव्या को गोद में उठाया, बोला, “कुछ नहीं होगा मेरी परी को, बिल्कुल कुछ नहीं।”
नेहा यह सुनकर चौंक गई। पहली बार रोहन ने दिव्या को अपनी बेटी की तरह पुकारा। नेहा की आँखें भर आईं। वह देख रही थी कि जो आदमी अपना सब कुछ खो चुका था, अब फिर से जीने की वजह ढूंढ रहा है।
धीरे-धीरे रोहन का लगाव सिर्फ दिव्या तक नहीं, नेहा तक भी फैलने लगा। वह नेहा को देखकर सोचता, “यह औरत कितनी मजबूत है—पति खो दिया, ससुराल ने ठुकराया, मायके ने बोझ कहा, फिर भी अपनी बच्ची के लिए लड़ रही है।”
एक शाम नेहा रसोई में काम कर रही थी, रोहन आया और बोला, “नेहा, तुम्हें नहीं लगता कि यह घर अब पहले जैसा नहीं रहा?”
नेहा ने पूछा, “कैसे साहब?”
रोहन ने कहा, “पहले यह घर वीरान था, लेकिन अब यहाँ हँसी है। दिव्या की बातें मुझे ताकत देती हैं और तुम्हारी हिम्मत मुझे इंसानियत पर यकीन दिलाती है।”
नेहा चौंक गई, उसकी आँखें नम हो गईं। उसके दिल में यह बात घर कर गई कि रोहन सिर्फ मालिक नहीं, बल्कि एक ऐसा इंसान है जो उसके दर्द को समझता है।
दिन बीतते गए। रोहन अब दिव्या को स्कूल छोड़ने खुद जाता, शाम को उसके लिए खिलौने लाता, कभी-कभी उसे गोद में झुलाता। नेहा यह सब देखकर भावुक हो जाती।
वह सोचती, “क्या यह वही जिंदगी है जिसके लिए मैं तरस रही थी? क्या रोहन सच में हमारे लिए सहारा बन सकता है?”
कुछ महीनों में घर का माहौल बदल गया। जो कभी उदास था, अब वहाँ खुशियाँ गूंजती थीं। दिव्या की खिलखिलाहट, नेहा की मुस्कान, सब कुछ नया लगता।
एक रात दिव्या सो चुकी थी, नेहा कपड़े सिल रही थी। रोहन पास आकर बैठा, बोला, “नेहा, क्या तुम्हें नहीं लगता कि जिंदगी ने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया है?”
नेहा ने नजरें झुका ली, “हाँ साहब, कभी-कभी लगता है, लेकिन दिव्या का चेहरा देखकर सोचती हूँ कि अगर मैं हार गई तो उसकी दुनिया भी खत्म हो जाएगी। इसलिए मैं जी रही हूँ, सिर्फ उसके लिए।”
रोहन की आँखें भीग गईं, बोला, “जब मैंने दिव्या को पहली बार देखा, तो लगा मेरी बेटी लौट आई। अब तुम दोनों के बिना यह घर अधूरा लगता है।”
नेहा ने चौंककर देखा, उसकी आँखों में अपनापन था। धीरे-धीरे उनके बीच की दूरियाँ मिट गईं। रोहन अब दिव्या के लिए पिता जैसा बन गया। लोग यही कहते कि यह उसकी ही बेटी है। नेहा खुश होती, सोचती भगवान ने रोहन को फरिश्ता बनाकर भेजा है।
इसी बीच एक दिन नेहा बीमार पड़ गई। तेज बुखार से कांप रही थी। रोहन ने पूरे दिन घर संभाला, नेहा के सिर पर पट्टी रखी, दवा दी और बोला, “अब तुम्हें कोई तकलीफ अकेले नहीं सहनी पड़ेगी।”
नेहा के आँसू निकल पड़े, “आपने जो किया, वह मैं कभी नहीं भूलूंगी।”
रोहन ने कहा, “नेहा, यह इंसानियत से आगे बढ़ चुका है। मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ।”
समय गुजरता रहा। घर अब एक परिवार जैसा लगने लगा। दिव्या हँसती-खेलती, रोहन उसे झुलाता, नेहा की आँखें भर आती। उसे लगता कि दिव्या को वह पिता मिल गया जिसकी कमी वह हमेशा महसूस करती थी।
एक शाम नेहा मंदिर से लौट रही थी, हाथ में फूल, माथे पर चंदन। रोहन ने देखा और बोला, “नेहा, अगर मैं कहूँ कि यह घर अब सिर्फ मेरा नहीं, तुम्हारा भी है, तो क्या तुम इसकी मालकिन बनोगी?”
नेहा रुक गई, बोली, “साहब, मैं तो बस नौकरानी हूँ, आप जैसे अमीरों के लायक कहाँ।”
रोहन ने उसका हाथ थामा, “नहीं नेहा, तुम मेरे घर की रौनक हो, मेरी जिंदगी को पूरा करने वाली हो। और दिव्या अब मेरी बेटी है। मैं चाहता हूँ हम तीनों परिवार बनकर रहें।”
नेहा के आँसू बह निकले। उसे याद आया कैसे ससुराल ने ठुकराया, मायके ने बोझ कहा, लेकिन आज वह किसी की जरूरत बन गई।
कुछ दिनों बाद दिल्ली के छोटे से मंदिर में सादी शादी हुई। नेहा ने हल्की साड़ी पहनी, रोहन ने कुर्ता। जब फेरे हो रहे थे, दिव्या ने कहा, “पापा!”
रोहन ने उसे सीने से लगाया, “हाँ मेरी परी, आज से मैं सच में तुम्हारा पापा हूँ।”
लोग यह देखकर भावुक हो गए।
जो नेहा को बोझ कहा जाता था, वह अब किसी की जिंदगी बन गई।
यह कहानी सिर्फ नेहा की नहीं, उन सभी औरतों की है जिन्हें समाज ठुकरा देता है।
लेकिन इंसानियत का एक छोटा सा कदम उनकी जिंदगी बदल सकता है।
कभी किसी की मदद करने से पीछे न हटें, आपकी इंसानियत किसी की पूरी दुनिया रोशन कर सकती है।
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