नियति का खेल – कोमल और आर के चौहान की कहानी

मुंबई की एक ट्रैफिक सिग्नल पर नियति ने दो बिल्कुल अलग दुनिया के लोगों को मिलाया। एक तरफ था करोड़पति आर के चौहान, जिनके पास सब कुछ था – दौलत, नाम, रुतबा। दूसरी तरफ थी कोमल, दस साल की एक छोटी बच्ची, जिसके पास सिर्फ बेबसी थी और किस्मत को कोसने के सिवा कुछ भी नहीं।

क्या किसी की जिंदगी बदलने के लिए लाखों रुपये दान देना जरूरी है? या आत्मसम्मान की एक छोटी सी चिंगारी ही काफी है?

यह कहानी है उस मासूम कोमल की, जिसके फैले हाथों में दुनिया सिर्फ एक भिखारी देखती थी। और एक ऐसे पत्थर दिल करोड़पति की, जिसके लिए इंसान सिर्फ बाजार का सामान था। लेकिन जब उस करोड़पति ने कोमल को भीख की जगह 50 पेन थमाए और व्यापार का पहला पाठ पढ़ाया, तो उसे भी नहीं पता था कि वह एक ऐसा बीज बो रहा है, जो सालों बाद इतना बड़ा पेड़ बन जाएगा कि उसकी छांव में उसे खुद आकर खड़ा होना पड़ेगा।

मुंबई – सपनों और विषमताओं का अनूठा संगम। एक तरफ अरब सागर के किनारे आलीशान अपार्टमेंट्स, दूसरी तरफ उन्हीं इमारतों की परछाई में झुग्गी बस्तियां। इन दोनों दुनियाओं के बीच ट्रैफिक से भरी सड़कें। नरिमन पॉइंट की एक ऐसी ही सड़क जहाँ सुबह से शाम तक महंगी गाड़ियों का तांता लगा रहता था। इन्हीं गाड़ियों के बीच कोमल अपनी छोटी सी दुनिया समेटे भीख मांगती थी।

कोमल की दुनिया ट्रैफिक सिग्नल की लाल और हरी बत्ती के साथ चलती थी। लाल बत्ती होते ही वह नंगे पैर तपती सड़क पर दौड़ पड़ती, गाड़ियों के शीशे के पास जाकर अपने छोटे-छोटे मैले हाथ फैला देती। उसकी आंखों में बेबसी और मासूमियत होती। कभी कोई ₹10-₹20 दे देता, ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते।

हरी बत्ती होते ही वह वापस फुटपाथ पर आकर बैठ जाती और अपनी छोटी सी कमाई गिनती। कोमल भीख अपनी मर्जी से नहीं मांगती थी। उसकी मां टीबी से बीमार थी और इलाज के लिए महंगी दवाइयां चाहिए थीं। उसका छोटा भाई राजू भी था। कोमल दिनभर भीख मांगकर जो भी कमाती, उससे मां के लिए दवा और भाई के लिए रोटी खरीदती।

उसने कई दिनों से पेट भर खाना नहीं खाया था, लेकिन उसकी चिंता सिर्फ अपनी मां और भाई के लिए थी।

दूसरी तरफ था आर के चौहान – आर के ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज का मालिक। सेल्फ मेड इंसान। शून्य से शुरुआत करके हजारों करोड़ का साम्राज्य खड़ा किया। लेकिन इस सफर ने उन्हें इतना सख्त बना दिया कि लोग उन्हें ‘पत्थर दिल चौहान’ कहते थे। उनके लिए भावनाएं कमजोरी थीं। भीख मांगना सबसे बड़ा अपराध था।

उनका ऑफिस नरिमन पॉइंट की सबसे ऊंची इमारत के टॉप फ्लोर पर था। रोज अपनी Rolls Royce में ऑफिस आते-जाते थे। रास्ता उसी ट्रैफिक सिग्नल से गुजरता था, जहां कोमल भीख मांगती थी। उन्होंने कई बार कोमल को देखा, लेकिन हमेशा उपेक्षा और गुस्से से।

एक दिन मुंबई की उमस भरी दोपहर में आर के चौहान की गाड़ी उसी सिग्नल पर रुकी। वह किसी बड़ी डील को लेकर परेशान थे। तभी कोमल आई – “साहब, ₹2 दे दो, भगवान भला करेगा, मां बीमार है, दवा लानी है।”
आर के चौहान ने गुस्से से देखा, मन किया डांटकर भगा दें। लेकिन उस दिन कोमल की आंखों में बेबसी के साथ जिद और गहरी ईमानदारी दिखी। एक पल के लिए उन्हें अपनी बेटी की याद आ गई, जो अगर जिंदा होती तो कोमल की उम्र की होती। उनकी बेटी भी बीमारी से गई थी।