कहानी: मां-बाप ही असली दौलत हैं

नोएडा की ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच संजय नाम का एक व्यक्ति रहता था। संजय 38 साल का था और एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर था। उसके पास शानदार 3 बीएचके फ्लैट, महंगी कार, सुंदर पत्नी राधा और दो प्यारे बच्चे थे। बाहर से उसकी जिंदगी बिल्कुल परफेक्ट लगती थी, लेकिन उसके घर में एक ऐसा कोना था जो उसे और राधा को हमेशा खटकता था—संजय का बूढ़ा पिता, विश्वनाथ शर्मा।

विश्वनाथ जी कभी एक सम्मानित स्कूल के प्रिंसिपल हुआ करते थे। उन्होंने संजय को बचपन से पढ़ाया, उसकी हर जरूरत पूरी की। लेकिन अब उम्र के साथ उनका शरीर कमजोर हो गया था। पत्नी का देहांत हो चुका था और वे बेटे के साथ ही रहते थे। वे हमेशा बच्चों के साथ खेलना चाहते, बातें करना चाहते, लेकिन उनकी खांसी की आवाज, उनका पुराना रेडियो और दवाइयों का खर्च संजय और राधा को परेशान करने लगा।

राधा अक्सर संजय से कहती, “तुम्हारे पापा की वजह से घर का माहौल ही बिगड़ जाता है। बच्चे भी डरते हैं उनकी खांसी सुनकर। हमारे दोस्त भी घर नहीं आते। किसी अच्छे वृद्धाश्रम में छोड़ दो इन्हें।” धीरे-धीरे ये बातें संजय के दिल में जहर घोलने लगीं। वह भूल गया कि वही पिता कभी उसकी उंगली पकड़कर उसे चलना सिखाते थे, रातों-रात जागकर उसे पढ़ाते थे।

एक दिन राधा ने साफ-साफ कह दिया, “या तो पापा रहेंगे या हमारी आज़ादी। अब फैसला तुम्हें करना है।” संजय पूरी रात सो नहीं पाया, लेकिन आखिरकार उसने पिता को वृद्धाश्रम छोड़ने का फैसला कर लिया।

अगली सुबह, संजय ने पिता से कहा, “पापा, शहर के पास एक बहुत अच्छा आश्रम है। वहाँ आपके जैसे और भी लोग रहते हैं। आपको अच्छा लगेगा।” विश्वनाथ जी भोलेपन से बेटे की बात मान गए और संजय उन्हें आनंद धाम वृद्धाश्रम छोड़ आया। जाते समय विश्वनाथ जी ने पूछा, “बेटा, कब आओगे मुझे लेने?” संजय ने आंखें चुराकर कहा, “जल्दी आऊंगा पापा। आप अपना ख्याल रखना।”

घर लौटकर संजय और राधा ने राहत की सांस ली। उन्हें लगा जैसे उनका बोझ उतर गया हो। उस रात उन्होंने पार्टी रखी, दोस्तों को बुलाया। लेकिन वृद्धाश्रम में विश्वनाथ जी पूरी रात सो नहीं पाए। उनकी आंखें छत को ताकती रहीं और दिल में एक ही सवाल था—क्या बेटा सच में मुझे लेने आएगा?

अगली सुबह वृद्धाश्रम के संचालक सुदीप मेहता विश्वनाथ जी से मिलने आए। जब उन्होंने विश्वनाथ जी का नाम सुना, तो चौंक गए। सुदीप वही अनाथ बच्चा था, जिसे विश्वनाथ जी ने फीस माफ कर पढ़ाया था, किताबें दिलाई थीं और आगे पढ़ने शहर भेजा था। आज वही बच्चा करोड़पति बन चुका था और वृद्धाश्रम का मालिक था।

सुदीप ने संजय की सारी बातें जान लीं और उसका खून खौल उठा। उसने तय किया कि संजय को आईना दिखाना है। अगले दिन वह संजय के घर गया और बताया कि जिस कंपनी में संजय मैनेजर है, वह उसकी है; जिस फ्लैट में वह रहता है, वह भी उसकी है; और यह सब उसके पिता की वजह से है। उसने संजय को 24 घंटे का समय दिया—या तो अपने पिता से माफी मांगो और उन्हें सम्मान के साथ घर वापस लेकर आओ, या फिर घर और नौकरी छोड़ दो।

संजय और राधा को अपनी गलती का एहसास हुआ। दोनों वृद्धाश्रम गए, पिता के पैरों में गिरकर माफी मांगी। विश्वनाथ जी ने उन्हें माफ कर दिया। राधा ने वादा किया कि वह अपने बच्चों को यही सिखाएगी कि दादा-दादी ही घर की असली नींव हैं।

उस दिन घर का खालीपन भर गया। संजय पूरी तरह बदल गया। अब वह दफ्तर से लौटते ही पिता के पास बैठता, उनकी बातें सुनता, उनका ख्याल रखता। राधा भी हर दिन उनका आदर करती। बच्चों के लिए अब दादा ही सबसे बड़े हीरो बन गए थे। सुदीप भी अक्सर गुरु जी से मिलने आता, लेकिन अब मालिक नहीं, बड़े बेटे की तरह।