पटना जंक्शन की फुटपाथ से रेस्टोरेंट तक: एक भिखारी महिला की प्रेरक कहानी
पटना जंक्शन के बाहर फुटपाथ पर एक 25 साल की महिला बैठी थी। उसका चेहरा थका हुआ, आंखों के नीचे काले घेरे, होठ सूखे और कपड़े मैले-कुचैले थे। खूबसूरत तो थी, लेकिन हालात ने उसकी खूबसूरती को छुपा दिया था। वह राहगीरों से भीख मांगती, कभी पानी के लिए गुहार लगाती। लोग अक्सर उसे अनदेखा कर चले जाते, कोई सिक्का फेंक देता और कोई तिरस्कार से देखता।
इसी भीड़ में एक दिन एक चमचमाती गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक 30 साल का युवक उतरा — साधारण कपड़े, चेहरे पर गंभीरता और आंखों में अपनापन। वह सीधा महिला के पास गया और बोला,
“तुम्हें पैसों की जरूरत है ना? मैं तुम्हें 5 लाख दूंगा, लेकिन मेरे साथ होटल चलो।”
यह सुनते ही भीड़ में खुसरपुसर शुरू हो गई। किसी ने घृणा से देखा, किसी ने तिरछी नजरों से। महिला के शरीर में सिहरन दौड़ गई, उसकी सांसें तेज हो गईं। पर युवक की आंखों में कोई लालच या हवस नहीं, बल्कि कुछ अलग था। वह गंभीरता से बोला,
“डरने की जरूरत नहीं, बस चलो।”
महिला डरते-डरते गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी एक होटल के सामने रुकी। युवक ने उसे एक साफ-सुथरे कमरे में ले जाकर कहा,
“यह कमरा तुम्हारे लिए है। आराम करो, पेट भर खाना खाओ। मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा।”
महिला की आंखों से आंसू बह निकले। शायद सालों बाद किसी ने उससे बिना शर्त इंसान की तरह बात की थी। उसने पूछा,
“तुम यह सब क्यों कर रहे हो? तुम्हें मुझसे क्या चाहिए?”
युवक मुस्कुराकर बोला,
“मुझे बस तुम्हारी कहानी सुननी है। शायद उसमें मुझे वो सच्चाई मिले, जिसकी तलाश मैं कर रहा हूं।”

महिला ने अपनी पूरी कहानी सुनाई — कैसे कम उम्र में शादी हुई, पति ने मारपीट की, छोड़कर चला गया, मायके में जगह नहीं मिली, शहर आकर काम ढूंढा, लेकिन हर जगह उसकी मजबूरी का फायदा उठाया गया। कई बार आत्महत्या का मन हुआ, लेकिन हर बार दिल ने कहा, शायद एक दिन हालात बदलेंगे।
युवक चुपचाप सुनता रहा। फिर बोला,
“अब तुम्हारी जिंदगी ऐसे नहीं कटेगी। मैं तुम्हें एक इज्जत वाली नौकरी दिलाऊंगा।”
अगले दिन युवक उसे एक छोटे से रेस्टोरेंट में ले गया। मालिक से बात की और महिला को बर्तन धोने का काम दिलाया।
“मेहनत करो, धीरे-धीरे किचन का काम भी सीख सकती हो,” युवक ने कहा।
महिला ने काम शुरू किया। अब वह भीख नहीं मांगती थी, बल्कि मेहनत से कमाती थी। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास लौटने लगा। कपड़े साफ रहने लगे, चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। लोग अब उसे इज्जत से देखने लगे। युवक भी कभी-कभी आकर हालचाल पूछता, मदद करता, लेकिन कभी उसकी मेहनत में दखल नहीं देता।
कुछ महीनों में महिला ने किचन का काम भी सीख लिया। मालिक ने उसकी लगन देखकर कहा,
“तुम्हारे हाथों में स्वाद है।”
महिला की जिंदगी बदलने लगी। युवक ने उसे पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया, किताबें लाकर दीं, बेसिक गणित और अंग्रेजी सिखाई। महिला हैरान थी कि कोई अजनबी उसके लिए इतना क्यों कर रहा है, लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि यही इंसानियत है।
6 महीने में महिला का आत्मविश्वास लौट आया। अब वह सिर झुकाकर नहीं, सीना तानकर चलती थी। लोग उसकी इज्जत करने लगे। पटना की वही सड़कें, जो कभी उसके लिए दर्द का आईना थीं, अब नई कहानी बन गई थीं।
एक शाम युवक ने महिला से कहा,
“तुम्हारे हाथ का स्वाद अलग है। क्यों न हम अपना खुद का रेस्टोरेंट खोलें?”
महिला हैरान रह गई। उसने धीरे से कहा,
“मेरे पास तो कुछ नहीं…”
युवक बोला,
“तुम्हारे पास मेहनत है, लगन है। बाकी सब मैं देख लूंगा।”
कुछ ही समय में दोनों ने मिलकर एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोला। महिला ने हर थाली में अपने संघर्ष और मेहनत का स्वाद घोल दिया। धीरे-धीरे रेस्टोरेंट चल निकला। लोग कहने लगे, “यहां का खाना घर जैसा है, लेकिन स्वाद अनोखा।” अखबारों में महिला का नाम छपने लगा — फुटपाथ से रेस्टोरेंट तक का सफर!
युवक हर पल उसके साथ था। दोनों का रिश्ता अब साझेदारी से बढ़कर अपनापन बन गया। एक रात युवक ने कहा,
“जब पहली बार तुम्हें देखा था, तो बस मदद करनी थी। अब लगता है, तुम्हारे बिना अधूरा हूं।”
महिला की आंखों में आंसू आ गए। उसने सिर झुका कर कहा,
“अब लगता है, यह सफर अकेले का नहीं है। हां, मैं तैयार हूं।”
कुछ समय बाद दोनों ने सादगी से शादी की। महिला ने लाल साड़ी पहनी, चेहरे पर चमक और आंखों में खुशी के आंसू थे। आज वह सिर्फ एक पत्नी नहीं, बल्कि एक सफल बिजनेस वूमेन भी है। उसका रेस्टोरेंट अब शहर की पहचान बन चुका है।
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