बलवंत सिंह की कहानी: एक सच्चे देशभक्त की देशभक्ति
भारत की सरहदों पर तैनात सैनिकों की सेवा करना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि यह एक कर्तव्य और सम्मान की बात है। लेकिन जब एक आम नागरिक, बलवंत सिंह, ने अपने ढाबे पर भूखे फौजियों को खाना खिलाने का फैसला किया, तो उसने देशभक्ति की एक नई परिभाषा स्थापित की। यह कहानी है बलवंत सिंह की, एक बूढ़े ढाबे वाले की, जिसने न केवल अपने दिल से बल्कि अपने कर्मों से भी देशभक्ति को जिया।
एक साधारण ढाबा
पठानकोट से जम्मू की ओर जाने वाले नेशनल हाईवे पर एक छोटा सा ढाबा था, जिसका नाम था “शेर ए पंजाब फौजी ढाबा।” यह कोई आलीशान रेस्टोरेंट नहीं था, बल्कि बांस के खंभों पर टिकी एक साधारण छत, पुरानी लकड़ी की मेजें और एक कोने में धुएं से काली रसोई थी। लेकिन इस ढाबे में एक खास बात थी – यहाँ का खाना और यहाँ का अपनापन। बलवंत सिंह, 70 साल के बुजुर्ग, ढाबे के मालिक और एकमात्र रसोइए थे। उनकी सफेद दाढ़ी और नीली पगड़ी में जीवन के अनुभवों की गहरी लकीरें थीं, लेकिन उनकी आंखों में एक चमक थी, जो किसी फौजी की आंखों में ही देखने को मिलती है।

बलवंत सिंह का संघर्ष
बलवंत सिंह का जीवन संघर्ष और स्वाभिमान की कहानी थी। जवानी में वह खुद फौज में भर्ती होना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उन्हें रोक दिया। उनका सपना उनके इकलौते बेटे विक्रम ने पूरा किया, जो भारतीय सेना में कैप्टन था। लेकिन चार साल पहले कश्मीर में आतंकियों से हुई मुठभेड़ में विक्रम शहीद हो गए। उस हादसे में उनकी पत्नी भी चल बसी, और अपने पीछे छोड़ गई अपनी 5 साल की बेटी प्रिया। अब बलवंत सिंह का जीवन प्रिया के चारों ओर घूमता था।
फौजियों की मेहमाननवाज़ी
एक दिन, जब बलवंत सिंह अपने ढाबे पर रोटियाँ सेंक रहे थे, तभी सेना के तीन बड़े ट्रक ढाबे के सामने आकर रुके। 20-25 फौजी उतरे, जिनकी वर्दियाँ धूल से सनी हुई थीं। बलवंत सिंह ने उन्हें देखते ही अपनी रसोई से बाहर आकर उनका स्वागत किया। सूबेदार मेजर गुरमीत सिंह ने उनसे पूछा, “बाऊजी, खाना मिलेगा? जवान बहुत भूखे हैं।” बलवंत सिंह का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्होंने तुरंत खाना तैयार करना शुरू किया।
एक घंटे बाद, फौजियों ने गरमा-गरम खाना खाया। जब सूबेदार गुरमीत सिंह ने खाने का बिल चुकाने के लिए बलवंत सिंह से पूछा, तो उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “नहीं पुत्तर, पैसे नहीं। तुम लोग इस देश की रखवाली के लिए अपनी जान देने जा रहे हो। मैं एक बूढ़ा बाप तुम लो
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