ए. आर. रहमान का बयान: क्या वाकई बॉलीवुड में सांप्रदायिक भेदभाव है?
हाल ही में मशहूर संगीतकार ए. आर. रहमान द्वारा बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू ने बॉलीवुड और सोशल मीडिया में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस इंटरव्यू में रहमान ने कहा कि उन्हें पिछले कुछ वर्षों से हिंदी फिल्मों में अपेक्षाकृत कम काम मिल रहा है और इसके पीछे एक कारण उनका मुस्लिम होना भी हो सकता है। इस बयान को उन्होंने एक प्रकार से सांप्रदायिक संदर्भ में प्रस्तुत किया, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह पहली बार नहीं है जब ए. आर. रहमान ने बॉलीवुड में काम न मिलने की शिकायत की हो। जुलाई 2020 में एक रेडियो इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि बॉलीवुड में “गुटबाजी” (gang culture) है और उनके बारे में यह प्रचार किया गया है कि उनसे संपर्क करना या उन्हें किसी फिल्म के लिए साइन करना मुश्किल है। उस समय उन्होंने इसे पेशेवर राजनीति और म्यूजिक कंपनियों के बदलते प्रभाव से जोड़ा था, न कि धर्म से। लेकिन इस बार उनके बयान में सांप्रदायिक रंग साफ दिखाई देता है।

2014 के बाद का नैरेटिव
ए. आर. रहमान का कहना है कि पिछले 7–8 वर्षों में उनके साथ व्यवहार बदला है। इस बयान को कुछ लोग 2014 के बाद के राजनीतिक माहौल से जोड़कर देख रहे हैं, जहां हर विषय को मौजूदा सरकार और राजनीति से जोड़ दिया जाता है। हालांकि, यह सवाल उठता है कि क्या कला और सिनेमा की दुनिया वास्तव में धर्म के आधार पर काम करती है?
पहले भी लगे हैं ऐसे आरोप
ऐसे आरोप पहले भी लगाए गए हैं। अभिनेता इमरान हाशमी ने एक बार कहा था कि उन्हें मुंबई में सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से फ्लैट खरीदने में दिक्कत आई। क्रिकेटर मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने भी मैच फिक्सिंग के आरोपों को अपने धर्म से जोड़ने की कोशिश की थी, जिसके लिए उनके वकील महेश जेठमलानी ने उन्हें सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई थी।

फिल्म इंडस्ट्री की सच्चाई
अगर बॉलीवुड के इतिहास पर नजर डालें, तो यह कहना मुश्किल है कि यहां मुस्लिम कलाकारों को अवसर नहीं मिले।
नौशाद, ख़य्याम, मजरूह सुल्तानपुरी, मोहम्मद रफ़ी जैसे दिग्गजों ने हिंदी सिनेमा को अमर बनाया।
दिलीप कुमार (यूसुफ़ खान) दशकों तक हिंदी सिनेमा पर राज करते रहे।
आज के दौर में शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान, सैफ अली खान जैसे कलाकार न सिर्फ सफल हैं, बल्कि देश के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में गिने जाते हैं।
अगर सांप्रदायिकता वास्तव में निर्णायक होती, तो ये नाम इतने लंबे समय तक शिखर पर नहीं टिकते।
दूसरे कलाकारों की प्रतिक्रियाएं
इस मुद्दे पर कई दिग्गजों ने अपनी राय रखी:
जावेद अख्तर का मानना है कि ए. आर. रहमान का कद इतना बड़ा है कि कई निर्माता उनसे संपर्क करने में ही हिचकिचाते हैं।
गायक शान ने स्पष्ट कहा कि संगीत में कोई धर्म नहीं होता, वरना “तीन खान” पिछले 30 सालों से सुपरस्टार न होते।
लेखिका शोभा डे ने इस बयान को खतरनाक बताते हुए कहा कि बॉलीवुड हमेशा से समावेशी रहा है।
निर्देशक शेखर कपूर और रसूल पुकुट्टी ने “ऑस्कर कर्स” की बात कही—कि ऑस्कर जीतने के बाद बॉलीवुड के कुछ लोग यह मान लेते हैं कि कलाकार उनसे बड़ा हो गया है।
ए. आर. रहमान और विरोधाभास
दिलचस्प बात यह है कि ए. आर. रहमान को हाल ही में ‘पोन्नियिन सेलवन’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। इसी साल शाहरुख खान को भी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ऐसे में यह कहना कि केवल धर्म के कारण काम नहीं मिल रहा, कई लोगों को असंगत लगता है।
यह भी सच है कि बॉलीवुड में गुटबाजी हमेशा से रही है। यहां टिके रहने के लिए नेटवर्किंग और समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन हर पेशेवर असफलता को सांप्रदायिक चश्मे से देखना शायद समस्या को और जटिल बना देता है।
निष्कर्ष
ए. आर. रहमान भारतीय सिनेमा के महानतम संगीतकारों में से एक हैं। उनकी प्रतिभा पर कोई सवाल नहीं है। लेकिन उनके इस बयान ने कई लोगों को निराश किया है। भारतीय सिनेमा का इतिहास गवाह है कि यहां धर्म से ज्यादा प्रतिभा, लोकप्रियता और समय की मांग निर्णायक रही है।
जरूरत इस बात की है कि कला और कलाकार को राजनीति और सांप्रदायिकता से अलग रखा जाए। वरना ऐसे बयान न सिर्फ समाज को बांटते हैं, बल्कि उस विरासत को भी कमजोर करते हैं जिसे दशकों में बनाया गया है।
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