मजबूरी से मंज़िल तक – समीरा और राजीव की कहानी
कभी-कभी जिंदगी इंसान को वहीं लाकर खड़ा कर देती है, जहां से उसकी सबसे बड़ी कहानी शुरू होती है।
समीरा ने भी कभी नहीं सोचा था कि जिस आदमी ने उसे बेकार समझकर तलाक दे दिया, वही एक दिन उसकी किस्मत का मालिक बन जाएगा।
एक नई सुबह, पुराना दर्द
सुबह के 5:30 बजे थे। शहर अभी सो रहा था, मगर समीरा की नींद सालों पहले ही उससे दूर जा चुकी थी। टीन की छत वाले छोटे से किराए के कमरे में ठंडी हवा घुस रही थी। बगल में उसकी बीमार मां सो रही थीं।
समीरा चुपचाप उठी। बासी आटे की दो रोटियां सेंकी। एक मां के लिए रखी, एक खुद खाई। चाय में दूध नहीं था, सिर्फ पानी और पत्ती।
आज नौकरी का पहला दिन था।
महीनों तक रिजेक्शन, ताने — “तलाकशुदा औरत को कौन काम देगा?”
आज आखिर उसे काम मिला था।
उसने मां के पैर छुए। मां ने बस कहा,
“हिम्मत मत हारना।”

किस्मत का झटका
एक घंटे की बस यात्रा के बाद वह इंडस्ट्रियल एरिया पहुंची। सामने बड़ी फैक्ट्री थी।
उसने गेट पर लिखा नाम पढ़ा —
“मल्होत्रा इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड”
उसका दिल धड़क उठा।
रिसेप्शन पर गोल्डन अक्षरों में लिखा था —
Owner & MD: Rajeev Malhotra
जॉइनिंग लेटर उसके हाथ से गिर गया।
राजीव… उसका तलाकशुदा पति।
वही आदमी जिसने कभी उस पर शक किया, उसे छोड़ दिया, और अपनी दुनिया से बाहर कर दिया।
एक पल को वह भाग जाना चाहती थी।
लेकिन फिर मां की दवा, किराया, भूख याद आई।
उसने आंसू पोंछे।
और अंदर चली गई।
जब प्यार सच्चा था
कभी राजीव ऐसा नहीं था।
कॉलेज लाइब्रेरी में किताब को लेकर बहस से उनकी दोस्ती शुरू हुई थी। दोस्ती प्यार में बदली, प्यार शादी में।
छोटा सा घर, साथ में मैगी, बारिश में भीगना, सपने देखना —
वह जिंदगी किसी फिल्म जैसी थी।
राजीव कहता —
“एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा, तुम्हें रानी बनाकर रखूंगा।”
समीरा हंसकर कहती —
“मुझे बस तुम्हारा साथ चाहिए।”
पैसा और बदलता इंसान
फिर बिजनेस चला।
पैसे आए।
गाड़ी आई।
बड़े लोग आए।
और साथ ही आया अहंकार।
अब “हम” की जगह “मैं” ने ले ली।
पार्टियों में लोग समीरा का मजाक उड़ाते —
“थोड़ा मॉडर्न बनिए।”
राजीव मुस्कुरा देता, साथ नहीं देता।
फिर उसके पार्टनर विक्रम ने आग में घी डाला।
झूठ, शक, गलतफहमियां।
एक दिन राजीव ने कह दिया —
“काश मैंने तुमसे शादी ही न की होती।”
वो शब्द सब खत्म कर गए।
तलाक हो गया।
समीरा ने जाते-जाते कहा था —
“एक दिन मेरी कीमत समझोगे।”
फैक्ट्री की दुनिया
अब वही समीरा वर्कर थी।
पैकिंग सेक्शन में घंटों खड़े रहना, बॉक्स उठाना, पसीना, दर्द —
मगर उसने हार नहीं मानी।
एक दिन राजीव फ्लोर विजिट पर आया।
उनकी नजरें मिलीं।
पहचान थी।
चुप्पी भी।
सुपरवाइजर ने समीरा को डांटा।
तभी पीछे से आवाज आई —
“नई है, ट्रेनिंग दो।”
राजीव था।
वह सामने अनजान बनता,
पीछे से उसकी मदद करता।
फर्स्ट एड, मेडिकल रीइंबर्समेंट, बोनस —
सब चुपचाप।
सच का खुलासा
एक दिन समीरा ने उसे उसकी फाइल देखते पकड़ लिया।
अब उसे यकीन हो गया —
वह उसे पहचान चुका है।
फिर बुलावा आया।
केबिन नंबर 301।
राजीव बोला —
“मैंने तुम्हें बहुत ढूंढा।”
उसने सच बताया।
विक्रम ने झूठ बोले थे।
फर्जी सबूत दिए।
धोखा किया।
राजीव ने भरोसा नहीं किया — और उसे खो दिया।
विक्रम बाद में फ्रॉड में पकड़ा गया।
राजीव बोला —
“मैं आज तक अकेला हूं।”
पहली बार समीरा ने उसे टूटा हुआ देखा।
आग और एहसास
उसी दिन फैक्ट्री में शॉर्ट सर्किट हुआ।
एक मजदूर अंदर फंस गया।
समीरा बिना सोचे अंदर दौड़ी।
उसे बचाकर लाई।
राजीव चिल्लाया —
“पागल हो गई हो?”
समीरा बोली —
“किसी को अकेला छोड़ना नहीं आता।”
ये सुनकर राजीव की आंखें भर आईं।
क्योंकि उसने ही उसे कभी अकेला छोड़ा था।
धीरे-धीरे पिघलता दिल
राजीव ने उसे मजबूर नहीं किया।
बस दूर से मदद करता रहा।
समीरा को पता चला —
वह तलाकशुदा औरतों की मदद करने वाली NGO को सालों से दान देता है।
उसे पछतावा था।
सच्चा वाला।
फैसले का दिन
एक दिन समीरा खुद उसके केबिन पहुंची।
बोली —
“माफ पूरी तरह नहीं कर पाई हूं… मगर कोशिश करना चाहती हूं।”
राजीव की आंखों में उम्मीद लौट आई।
उसने उसका हाथ पकड़ा।
राजीव बोला —
“इस बार बराबरी से चलेंगे।”
नई शुरुआत
समीरा ने नौकरी छोड़ने की बात की।
राजीव मुस्कुराया —
“वर्कर नहीं, पार्टनर बनो।”
उसके नाम से महिलाओं के लिए स्किल ट्रेनिंग यूनिट शुरू हुई।
अब वह मजदूर नहीं, कई औरतों की ताकत थी।
सब उसे इज्जत से “मैम” कहते।
फिर से वही माला
कुछ महीनों बाद फैक्ट्री में छोटा सा समारोह हुआ।
मां मौजूद थीं।
करीबी लोग थे।
राजीव ने फिर से उसके गले में माला डाली।
इस बार भरोसा साथ था।
अंत जो शुरुआत बना
शाम को दोनों फैक्ट्री की छत पर खड़े थे।
सूरज ढल रहा था।
राजीव बोला —
“सपना पूरा हुआ — अपनी फैक्ट्री।”
समीरा मुस्कुराई —
“इस बार मैं रानी नहीं… पार्टनर हूं।”
दोनों हंस पड़े।
कभी-कभी किस्मत इंसान को तोड़ती है,
ताकि दोबारा जोड़े तो रिश्ता पहले से मजबूत हो।
और उस दिन साफ दिख रहा था —
सच्चा प्यार देर से सही, रास्ता ढूंढ ही लेता है।
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