**रामपुर की लता – एक खोई हुई बेटी की कहानी**
रामपुर के पुराने बस अड्डे पर सुबह की हलचल शुरू हो चुकी थी। धूल भरी सड़क के किनारे एक दस साल की लड़की बैठी थी, उसके पास एक पॉलिश का डिब्बा, दो-तीन ब्रश और एक मैला कपड़ा था। हर आने-जाने वाले से वह गुहार लगाती, “भैया, जूते साफ करवा लो, सिर्फ दस रुपये।” लोग उसे देखते, आगे निकल जाते, कोई ताना देता, कोई नाक-भौं सिकोड़ लेता। लेकिन लता हार नहीं मानती थी। उसे पता था कि आज पैसे नहीं कमाए तो शाम को खाना नहीं मिलेगा।
लेकिन एक अमीर बाप की बेटी यहां कैसे पहुंची? इतनी छोटी उम्र में उसे यह सब क्यों करना पड़ा? असल में लता का असली नाम मनीषा था। तीन साल पहले जब वह सात साल की थी, अपनी मां के साथ मेले में गई थी। भीड़ में कहीं खो गई। घंटों रोती रही। एक बुढ़िया कमला ने उसे उठा लिया और अपनी झुग्गी में ले जाकर खाना खिलाया। मनीषा को लगा, अच्छी औरत है। लेकिन जल्दी ही असलियत सामने आ गई। कमला बोली, “तू यहां मुफ्त में खाएगी क्या? देख, मैं बूढ़ी हो गई हूं, अब काम नहीं कर सकती, तू जूते पॉलिश करके पैसे ला, तभी खाना मिलेगा।” कमला ने उसे पॉलिश का डिब्बा थमा दिया। तब से लता का वह बस अड्डा ही घर बन गया था। जितने पैसे कमाती, कमला सब छीन लेती, खाने के नाम पर बस रोटी दे देती।
लता भागना चाहती थी, पर जाती कहां? उसे अपने घर का पता याद नहीं था। मां-बाप का नाम याद था, पर शहर कौन सा, गली कौन सी, कुछ याद नहीं था। कभी-कभी रात को आसमान देखकर सोचती, मां मुझे याद करती होगी, पापा ढूंढते होंगे।
इसी रामपुर शहर में कभी विनय शर्मा का बड़ा नाम था। कपड़े की दुकानें, जमीन-जायदाद, अच्छा खासा कारोबार। लेकिन तीन साल पहले एक हादसे ने सब बदल दिया। विनय की इकलौती बेटी मनीषा मेले में गुम हो गई थी। पुलिस में रिपोर्ट लिखाई, पोस्टर छपवाए, हर जगह खोजा पर कोई सुराग नहीं मिला। विनय की पत्नी अनीता इस सदमे को झेल नहीं पाई, खाना-पीना छोड़ दिया, दो महीने में इतनी कमजोर हो गई कि दिल का दौरा पड़ गया और अस्पताल पहुंचते-पहुंचते जान चली गई।
उस दिन से विनय टूट गया। कारोबार चौपट हो गया, घर बार बेचना पड़ा। अब बस एक छोटा सा मकान बचा था। विनय की जिंदगी का मकसद बस बेटी को ढूंढना रह गया था। रामपुर में हर जगह देख चुके थे, कोई सुराग नहीं मिला। फिर सोचा, शायद कोई बच्ची को दूसरे शहर ले गया हो। नौकरी की तलाश में लखनऊ चले गए। छह महीने वहां रहे, अलग-अलग इलाकों में जाकर छोटी बच्चियों को देखते, पर कोई फायदा नहीं हुआ। इसी तरह कानपुर, इलाहाबाद, मेरठ, जहां भी काम मिला, चले गए। हर शहर में उम्मीद लेकर जाते, निराश होकर लौटते।
तीन साल बाद दिवाली पर विनय अपने रामपुर वाले घर लौटे। आते ही पुराने दोस्तों से मिलने गए। एक दोस्त रमेश ने कहा, “विनय, यहां बस अड्डे पर कई छोटे बच्चे काम करते हैं, कभी वहां गया नहीं?” विनय चौंक गया, “नहीं यार, मैंने तो रेलवे स्टेशन देखा था, बस अड्डे पर नहीं गया। चल एक बार देखते हैं, शायद तेरी मनीषा वहीं हो।”
अगले दिन सुबह विनय अपनी स्कूटी लेकर बस अड्डे पहुंचे। भीड़ में नजरें दौड़ाने लगे। तभी उन्हें एक लड़की दिखी—फटा फ्रॉक, उलझे बाल, धूल भरा चेहरा। लेकिन वो नाक, वो आंखें! विनय का दिल धड़क उठा। वो पास गए। लता ने उन्हें देखा तो तुरंत उठी, “साहब, जूते साफ करवा लो ना।” विनय ने उसके चेहरे को गौर से देखा, माथे पर एक छोटा तिल था, बिल्कुल उसी जगह, जहां मनीषा के था। उनका गला सूख गया। “बेटी, तेरा नाम क्या है?” लता बोली, “मुझे नहीं पता साहब, बस इतना याद है कि मां मुझे ‘मनी’ बुलाती थी।” ये सुनते ही विनय के आंसू निकल आए। “मनी” मनीषा का प्यारा नाम था।
“बेटी, तू कहां रहती है?” “यहीं पास में, कमला काकी के यहां।” “वो कौन है?” “जिसने मुझे पाला है।” “लेकिन साहब, आप इतने सवाल क्यों पूछ रहे हो?” विनय ने खुद को संभाला, “कुछ नहीं बेटा, बस यूं ही। चल, मेरे जूते साफ कर दे।” लता ने जूते पॉलिश करने शुरू किए। विनय उसे देखते रहे—हर हरकत, हर भाव मनीषा जैसा था। पर अभी कुछ कहना ठीक नहीं लगा। विनय ने दस की जगह पचास का नोट दिया। “रख ले बेटा।” “नहीं साहब, मैं ज्यादा पैसे नहीं लेती।” “अरे, ले ले, तूने अच्छा काम किया।” लता ने झिझकते हुए पैसे रख लिए।
रात भर विनय सोए नहीं। सुबह होते ही फिर बस अड्डे पहुंच गए। अगले दिन भी वही, लता बैठी थी। विनय का दिल भर आया। आज उन्होंने मन बना लिया था कि बात करेंगे। “बेटी, कल तूने बताया था ना, कि कमला काकी के यहां रहती है, मुझे उनसे मिलना है।” लता घबरा गई, “क्यों साहब? काकी गुस्सा हो जाएगी, कहेगी मैं काम छोड़कर बातें कर रही हूं।” “नहीं बेटा, मैं तुझे अपने साथ लेकर जाना चाहता हूं।” विनय की आवाज कांप रही थी। लता सहम गई। उसने दो कदम पीछे हटते हुए कहा, “नहीं साहब, आप झूठ बोल रहे हो। काकी कहती है बाहर वाले लोग बच्चों को भगाकर बेच देते हैं। मुझे आपके साथ नहीं जाना।”
“बेटी, सुन तो…” विनय ने हाथ बढ़ाया, पर लता भाग गई। सामान वहीं छोड़कर गलियों में गुम हो गई। विनय वहीं खड़े रह गए, उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। इतने करीब आकर भी बेटी उनसे दूर भाग गई।
शाम को लता डरी-सहमी कमला काकी के पास पहुंची। कमला गुस्से में थी, “इतनी देर कहां थी? और सामान कहां है?” “काकी, वो एक आदमी मुझे अपने साथ ले जाना चाहता था, मैं डर गई और भाग आई, सामान वहीं रह गया।” कमला का चेहरा तमतमा उठा, “क्या? किसने देखा तुझे? अब वो आदमी यहां तक आ गया तो? नहीं, तुझे कुछ दिन घर में ही रहना पड़ेगा।”
अगले दिन से लता बस अड्डे नहीं गई। विनय रोज वहां जाते, पर उसे नहीं पाते। उन्होंने आसपास पूछताछ शुरू की। चाय वाले, ठेले वाले, सबसे पूछा। एक बूढ़े ने बताया, “साहब, वो लड़की कमला बुढ़िया के यहां रहती है। उसकी झुग्गी पीछे वाली गली में है। वो बड़ी चालाक है, कई बच्चों को रखती है काम करवाने के लिए।” विनय को गुस्सा आया, उनकी बेटी को किसी ने गुलाम बना रखा था।
वह सीधे उस गली में पहुंचे। टूटी-फूटी झुग्गियों के बीच एक जगह लोग इकट्ठे थे। विनय ने पूछा, “कमला कहां रहती है?” एक औरत ने इशारा किया। विनय उस झुग्गी के सामने पहुंचे। अंदर से आवाजें आ रही थीं, “तू काम नहीं करेगी तो खाना भी नहीं मिलेगा, समझी?” कमला लता को डांट रही थी।
विनय ने दरवाजे पर दस्तक दी। कमला बाहर आई, “कौन?” “मुझे लता से मिलना है।” कमला की आंखें सिकुड़ गईं, “कौन लता? यहां कोई नहीं है।” “झूठ मत बोलो, मुझे पता है वो यहीं रहती है।” विनय ने आवाज ऊंची की। तभी अंदर से लता की आवाज आई, “काकी, वही साहब है।” कमला ने दरवाजा बंद करने की कोशिश की, पर विनय ने रोक लिया। “सुनो, मैं पुलिस बुला सकता हूं। तुमने बच्चों को गैरकानूनी तरीके से रखा है। पर मैं झगड़ा नहीं चाहता, बस मुझे लता चाहिए।”
कमला घबरा गई, पर चालाकी से बोली, “साहब, आप समझते नहीं। मैंने इस लड़की को सड़क से उठाया था। तीन साल से पाल रही हूं, खाना-कपड़े सब दिए। अब आप अचानक आकर कहते हो ले जाऊंगा?” “तुमने पाला नहीं, इस्तेमाल किया है उसका। उससे काम करवाकर पैसे लेती हो, यह पालन-पोषण नहीं, शोषण है।” विनय का गुस्सा फूटा।
अंदर से लता धीरे-से निकली, उसकी आंखों में आंसू थे। विनय ने झुककर उसे देखा, “बेटी, तुझे याद है तेरी मां तुझे क्या गाना सुनाती थी?” लता ने सोचते हुए कहा, “चंदा मामा दूर के, पुए पकाए के…” विनय ने आगे गाया, “तेरी मां रोज यही गाती थी। और तेरे माथे पर यह तिल देख, तेरी मां का भी ऐसा ही था। मैं तेरा पापा हूं।”
लता की आंखों में पहचान की चमक आई। धुंधली सी यादें कौंध गईं—मां की गोद, वो गाना, वो घर। “पापा!” उसके मुंह से निकला। विनय ने उसे गले लगा लिया। दोनों फूट-फूट कर रोने लगे। आसपास के लोग इकट्ठे हो गए। कमला परेशान थी, “अगर लता चली गई तो घर का खर्चा कैसे चलेगा? नहीं, तुम इसे नहीं ले जा सकते। तुम्हारे पास क्या सबूत है?” विनय ने जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली, “यह देखो, यह मनीषा है, मेरी बेटी, इसके माथे पर वही तिल है। और अगर तुम्हें और सबूत चाहिए तो डीएनए जांच करवा लेंगे।”
भीड़ में से एक आदमी बोला, “कमला, छोड़ दे लड़की को, बाप मिल गया है उसे, तू पाप मत कर।” कमला को समझ आ गया कि अब जिद करने से काम नहीं चलेगा। पर उसने आखिरी कोशिश की, “ठीक है साहब, ले जाओ, पर तीन साल का खर्चा तो दो, ₹100।” “तुमने इससे तीन साल काम करवाया, वो पैसे काफी नहीं हैं।” विनय ने साफ मना कर दिया।
लता ने कमला की तरफ देखा, “काकी, आपने मुझे खाना दिया, रहने को जगह दी, लेकिन प्यार कभी नहीं दिया। मैं जा रही हूं।” विनय ने लता का हाथ पकड़ा और वहां से चल दिए। रास्ते भर लता चुपचाप रोती रही। “बेटा, अब तुझे कोई काम नहीं करना पड़ेगा। तू स्कूल जाएगी, अच्छे कपड़े पहनेगी, जैसे दूसरे बच्चे रहते हैं वैसे तू रहेगी।” विनय ने समझाया।
“पापा, मां कहां है?” लता ने पूछा। विनय की आंखें फिर भर आईं, “बेटी, तेरी मां अब इस दुनिया में नहीं है। तुझे खोजते-खोजते वो बीमार हो गई थी।” लता जोर से रोने लगी। पर विनय ने उसे संभाला, “रो मत बेटा, तेरी मां ऊपर से हमें देख रही है, वो खुश होगी कि हम फिर मिल गए।”
घर पहुंचकर विनय ने लता को नहलाया, नए कपड़े पहनाए, खाना खिलाया। लता को सब सपना लग रहा था। उस रात लता पापा के पास सोई, तीन साल बाद चैन की नींद आई। विनय उसके सिर पर हाथ फेरते रहे, आंखों में आंसू थे। जिस बेटी को खोजते-खोजते सब कुछ गंवा दिया था, आज वह वापस आ गई थी। अब विनय की जिंदगी में फिर से रोशनी आ गई थी।
घर आने के बाद पहली रात लता चैन से सो नहीं पाई। नरम बिस्तर पर करवटें बदलती रही। तीन साल से फर्श पर सोने की आदत हो गई थी। आधी रात को उठी और चुपके से नीचे फर्श पर लेट गई, वही सो पाई। सुबह जब विनय ने देखा तो दिल टूट गया, पर कुछ बोले नहीं, समझ गए कि वक्त लगेगा।
दो दिन बाद विनय लता को लेकर बाजार गए, नए कपड़े लेने। पर लता हर चीज की कीमत पूछती और मना कर देती, “नहीं पापा, बहुत महंगा है, मत लो।” “बेटा, अब तुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी।” “पर पापा, पैसे कहां से लाओगे?” लता की आंखों में चिंता थी। विनय को एहसास हुआ कि बेटी कितनी जल्दी बड़ी हो गई है, गरीबी देख चुकी है इसलिए।
पड़ोसियों का कहना ही क्या? सामने से मुस्कुराते, पीठ पीछे ताने मारते, “अरे, तीन साल सड़क पर रही, पता नहीं क्या-क्या सीख कर आई होगी। सच में उसकी बेटी है या बस दिखावा कर रहे हैं।” ये बातें लता के कानों तक पहुंचतीं, वो चुपचाप सुन लेती, रात को रोती। विनय को पता चलता तो समझाते, “बेटा, लोग बातें बनाएंगे, हमें अपना काम करना है।”
एक दिन विनय ने लता को स्कूल ले जाने की बात की। लता घबरा गई, “नहीं पापा, मुझे नहीं जाना, मैं पढ़ाई में बहुत कमजोर हूं, सब बच्चे हंसेंगे।” “बेटा, अभी शुरुआत करेंगे तो धीरे-धीरे सब आ जाएगा।” मजबूरी में लता मान गई। दाखिला हुआ। पहले दिन जब स्कूल पहुंची तो सब घूर-घूर कर देखने लगे। टीचर ने परिचय करवाया तो एक लड़का बोला, “मैडम, यह तो वही है जो बस अड्डे पर काम करती थी।” पूरी क्लास में हंसी फैल गई। लता की आंखें झुक गईं। टीचर ने डांटा, पर नुकसान हो चुका था।
छुट्टी के बाद कुछ बच्चों ने घेर लिया, “अरे जूते पॉलिश वाली, अपना डिब्बा कहां छोड़ आई?” लता भागकर घर आई, रोते-रोते विनय से बोली, “मुझे स्कूल नहीं जाना, सब परेशान करते हैं।” विनय का दिल भर आया, पर क्या करते? उन्होंने गले लगाया, “बेटा, जिंदगी आसान नहीं है, पर हार नहीं माननी।”
अगले दिन भी वही हुआ, लता क्लास में बैठी रहती, कोई उससे बात नहीं करता। पढ़ाई भी समझ नहीं आती, टीचर समझातीं, पर लता के सिर के ऊपर से निकल जाता सब। इम्तिहान में कम नंबर आते, बच्चे और चिढ़ाते। एक दिन विनय को स्कूल बुलाया गया। प्रिंसिपल ने कहा, “देखिए विनय जी, लता बहुत पिछड़ रही है, शायद उसे नीचे की क्लास में डालना पड़े।” विनय शर्मिंदा होकर घर आए, लता से कुछ नहीं कहा, पर लता समझ गई।
रात को लता विनय के पास आई, “पापा, मैं आपके लिए शर्मिंदगी बन गई हूं ना?” “नहीं बेटा, ऐसा मत बोल।” विनय ने कसकर गले लगाया। “पापा, मुझे मां की बहुत याद आती है, काश वो होती तो मुझे सब सिखाती, मुझे अच्छी बेटी बनाती।” लता फूट-फूट कर रोने लगी, विनय भी रो पड़े, दोनों देर तक ऐसे ही रोते रहे।
महीने बीतते गए, लता की पढ़ाई नहीं सुधरी, पर घर का काम करने लगी। खाना बनाना सीखा, कपड़े धोना सीखा, छोटी उम्र में जिम्मेदार बन गई। एक शाम विनय थके-हारे काम से लौटे, लता ने चाय बनाकर दी। विनय ने प्यार से उसका सिर सहलाया, “बेटा, तू भले ही पढ़ाई में कमजोर हो, पर दिल की बहुत अच्छी है।” लता मुस्कुराई, “पापा, मुझे पढ़ाई नहीं आती, पर मैं घर का काम कर सकती हूं, आपकी देखभाल कर सकती हूं। बस आप मुझे छोड़ना मत।” “कभी नहीं बेटा, हम दोनों साथ हैं, बाकी सब ठीक हो जाएगा।” विनय ने उसे गले लगा लिया।
जिंदगी मुश्किल थी—पैसों की तंगी थी, समाज के ताने थे, पढ़ाई का दबाव था, पर दोनों ने एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। कभी-कभी लता रात को छत पर जाती और आसमान देखती, “मां, मैं कोशिश कर रही हूं, पापा को अकेला नहीं छोड़ूंगी, भले ही मैं कुछ बड़ा नहीं कर पाऊं, पर उनके साथ रहूंगी।”
भले ही बिछड़े बाप-बेटी का मिलन हो गया था, लेकिन जो साल एक-दूसरे से दूर होकर काटे और जिस हालत में बीते, उनकी भरपाई करना मुश्किल था। विनय इसलिए खुश था कि उसने अपनी बेटी को पा लिया है, और बेटी इसलिए खुश थी कि उसे पिता मिल गए हैं।
कभी-कभी इंसान जीवन में अपनों से इस तरह दूर हो जाता है, कुछ ही पलों में उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाती है और उसके सामने सिर्फ जीने के लिए संघर्ष होता है।
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