रेप पर गैर-जिम्मेदार बयान और राजनीति की गिरती संवेदनशीलता: सवाल नेताओं की सोच पर
भारत में यौन हिंसा जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर जब जनप्रतिनिधियों की भाषा और सोच सामने आती है, तो यह केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज, राजनीति और शासन की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर देती है। हाल के दिनों में कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद एस.टी. हसन द्वारा दिए गए बयानों ने देशभर में तीखी प्रतिक्रिया और आक्रोश को जन्म दिया है।
इन बयानों को सुनकर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या देश की राजनीति में महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों को लेकर गंभीरता लगातार कम होती जा रही है?

बयानों की पृष्ठभूमि: क्या कहा गया?
सबसे पहले मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने बलात्कार जैसी जघन्य अपराध की घटना को महिलाओं की सुंदरता, जाति और धर्म से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने यह तक कहा कि कुछ समुदायों की महिलाओं के साथ अपराध होने को धर्मग्रंथों से जोड़कर देखा जाना चाहिए—एक ऐसा तर्क जो न केवल असंवैधानिक है, बल्कि समाज को गहराई से आहत करने वाला भी है।
इसके बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद एस.टी. हसन का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर बढ़ती अश्लीलता और युवाओं में हार्मोनल बदलाव बलात्कार के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। उनके अनुसार, इंटरनेट देखने से युवाओं का “टेस्टोस्टेरोन” बढ़ता है और यदि आसपास कोई महिला हो तो अपराध हो सकता है।
इन दोनों बयानों की सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये अपराध की जिम्मेदारी अपराधी से हटाकर समाज, तकनीक या पीड़िता पर डालने की कोशिश करते हैं।
बयान नहीं, सोच का संकट
बलात्कार कोई “आकस्मिक हार्मोनल प्रतिक्रिया” नहीं, बल्कि सत्ता, नियंत्रण और मानसिक विकृति से जुड़ा अपराध है—यह बात सुप्रीम कोर्ट से लेकर समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों तक बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं। इसके बावजूद जब पढ़े-लिखे, डॉक्टर रह चुके या लंबे समय तक सांसद रहे नेता इस तरह के बयान देते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत अज्ञानता नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक सोच की गंभीर विफलता को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान:
अपराधियों को अप्रत्यक्ष रूप से नैतिक छूट देते हैं
पीड़िताओं को दोषी ठहराने की मानसिकता को बढ़ावा देते हैं
महिलाओं की सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर डर और असुरक्षा बढ़ाते हैं
राजनीतिक दलों की चुप्पी: सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे विवाद में सबसे अधिक आलोचना राजनीतिक दलों की नेतृत्व स्तर पर चुप्पी को लेकर हो रही है।
कांग्रेस ने फूल सिंह बरैया के बयान पर देर से प्रतिक्रिया दी
समाजवादी पार्टी ने एस.टी. हसन के बयान पर कोई त्वरित और कड़ा कदम नहीं उठाया
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब तक शीर्ष नेतृत्व स्पष्ट कार्रवाई नहीं करता, तब तक ऐसे बयान देने वाले नेताओं को एक तरह की राजनीतिक संरक्षण भावना मिलती रहती है।
बीजेपी ने इन बयानों को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला किया और महिला विरोधी मानसिकता का आरोप लगाया। विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए, पुतले जलाए गए और सार्वजनिक माफी व इस्तीफे की मांग की गई।
कानूनी और संवैधानिक दृष्टि
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14, 15 और 21 महिलाओं को समानता, गरिमा और जीवन का अधिकार देता है। बलात्कार जैसे अपराध को लेकर:
पीड़िता को दोषी ठहराना कानूनन और नैतिक रूप से गलत है
किसी भी जनप्रतिनिधि द्वारा ऐसा बयान संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन माना जा सकता है
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे बयान नफरत, भेदभाव या हिंसा को बढ़ावा देते हैं, तो इनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर भी विचार होना चाहिए।
इंटरनेट बनाम अपराधी मानसिकता
एस.टी. हसन के बयान में इंटरनेट को बलात्कार का मुख्य कारण बताना एक अधूरा और भ्रामक विश्लेषण है। इंटरनेट एक माध्यम है—उसका उपयोग या दुरुपयोग व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है।
दुनिया के कई देशों में इंटरनेट की पहुंच भारत से कहीं अधिक है, लेकिन वहां अपराध की दर कम है। इसका अर्थ साफ है कि समस्या तकनीक नहीं, मानसिकता और सामाजिक शिक्षा की है।
महिला सुरक्षा और राजनीति की जिम्मेदारी
महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून और पुलिस तक सीमित विषय नहीं है। यह:
राजनीतिक नेतृत्व की भाषा
सार्वजनिक विमर्श
शिक्षा और सामाजिक संस्कार
इन सब से जुड़ा हुआ है। जब नेता ही गैर-जिम्मेदार बयान देंगे, तो समाज में क्या संदेश जाएगा?
महिला संगठनों का कहना है कि ऐसे बयानों से:
पीड़िताएं सामने आने से डरती हैं
अपराध दर्ज कराने की प्रक्रिया और कठिन हो जाती है
न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ता है
बीजेपी बनाम विपक्ष: राजनीति से आगे का सवाल
हालांकि इस मुद्दे पर बीजेपी और विपक्ष के बीच तीखी राजनीति हो रही है, लेकिन कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह विषय दलगत राजनीति से ऊपर है।
हर राजनीतिक दल में समय-समय पर इस तरह के बयान सामने आए हैं। फर्क केवल इतना है कि:
कौन पार्टी समय पर कार्रवाई करती है
कौन केवल बयानबाज़ी तक सीमित रहती है
मीडिया और सार्वजनिक भूमिका
मीडिया ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया, जिससे सार्वजनिक दबाव बना। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि मीडिया:
सनसनी के बजाय समाधान पर चर्चा करे
महिला सुरक्षा पर विशेषज्ञ राय को सामने लाए
राजनीतिक बयानबाज़ी के बजाय संवैधानिक मूल्यों पर जोर दे
समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के अनुसार कुछ ठोस कदम जरूरी हैं:
राजनीतिक दलों में आंतरिक आचार संहिता
- ऐसे बयानों पर
तुरंत निलंबन या निष्कासन
- जनप्रतिनिधियों के लिए
लैंगिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण
- महिला सुरक्षा पर ठोस नीति और उसके क्रियान्वयन की निगरानी
निष्कर्ष
रेप जैसे अपराध पर गैर-जिम्मेदार बयान केवल शब्द नहीं होते—वे समाज की सोच को दिशा देते हैं। जब ये बयान सत्ता और राजनीति के मंच से आते हैं, तो उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
आज सवाल यह नहीं है कि कौन-सा नेता किस पार्टी से है। सवाल यह है कि क्या भारत की राजनीति महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा को लेकर गंभीर है?
जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे बयान आते रहेंगे और हर बार समाज को शर्मिंदा होना पड़ेगा।
अब समय आ गया है कि राजनीति अपने शब्दों और सोच—दोनों के लिए जिम्मेदारी ले।
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