दिल्ली की तपती गर्मी की दोपहर थी। सड़कें तवे की तरह तप रही थीं, हवा में लू के थपेड़े थे और लोग जल्दी-जल्दी अपने काम निपटाकर छांव ढूंढ रहे थे। उसी भीड़ भरी सड़क के किनारे, एक पीपल के पेड़ की छाया तले, 68 साल के रामदीन काका अपना छोटा सा फलों का ठेला लगाए बैठे थे।
झुकी कमर, कांपते हाथ, माथे पर पसीना — लेकिन आंखों में ईमानदारी और मेहनत की चमक।
उनकी दुनिया बड़ी नहीं थी। बस एक ठेला, कुछ फल, और शाम तक दो-तीन सौ रुपये की कमाई। उसी से उनका और उनकी पत्नी सावित्री देवी का गुजारा चलता था। कोई औलाद नहीं, कोई सहारा नहीं — बस मेहनत ही उनका सहारा थी।

रोजमर्रा की जिंदगी
रामदीन काका पिछले 15 साल से उसी जगह ठेला लगाते थे। आसपास के दुकानदार उन्हें जानते थे।
कोई कहता — “काका अच्छे केले देना”
कोई कहता — “संतरे मीठे हों चाहिए”
काका कभी कम तौल नहीं करते। अक्सर कहते —
“गरीब का हक मारना सबसे बड़ा पाप है।”
सावित्री देवी घुटनों के दर्द से परेशान रहतीं, फिर भी काका का हौसला बढ़ातीं।
“कब तक ठेला खींचोगे?”
काका मुस्कुरा देते —
“जब तक सांस है, तब तक काम है।”
दूसरी तरफ…
उसी इलाके की पुलिस चौकी में तैनात था सब-इंस्पेक्टर विक्रम सिंह।
लंबा, मजबूत कद, खाकी वर्दी में रौबदार व्यक्तित्व। लेकिन अंदर से गुस्सैल, चिड़चिड़ा और भ्रष्ट आदतों का शिकार।
घर में रोज झगड़े होते। पत्नी नेहा उसके शराब पीने और गुस्से से तंग आ चुकी थी।
उस दिन सुबह भी बड़ा झगड़ा हुआ।
नेहा बोली —
“तुम बदलोगे नहीं तो सब खो दोगे।”
विक्रम गुस्से में घर से निकल गया।
वह एक पल…
दोपहर में विक्रम की गाड़ी उसी सड़क पर रुकी जहां रामदीन काका ठेला लगाए बैठे थे।
विक्रम का मूड खराब था।
गुस्सा पहले से भरा हुआ।
वह चिल्लाया —
“सड़क तेरे बाप की है क्या? हटाओ ये ठेला!”
काका घबरा गए —
“बाबूजी, मैं किनारे बैठता हूं… किसी को तकलीफ नहीं—”
वाक्य पूरा भी नहीं हुआ।
धक्का!
ठेला पलट गया।
संतरे लुढ़क गए।
केले कुचल गए।
सेब धूल में बिखर गए।
रामदीन काका की आंखों के सामने उनकी पूरी दुनिया टूट गई।
वह विक्रम के पैरों में गिर पड़े —
“बाबूजी, जेल भेज दो… पर ठेला मत तोड़ो… यही मेरी रोजी है।”
लेकिन विक्रम चला गया।
एक बेबस दुआ
काका सड़क पर बैठकर रोते रहे।
आसमान की तरफ देखकर बोले —
“हे भगवान, अगर तू है… तो इंसाफ कर।”
आसपास के लोगों ने मदद की। किसी ने ₹200 दिए, किसी ने फल समेटे।
लेकिन काका का दिल टूट चुका था।
उस रात उन्होंने सूखी रोटी और नमक खाया।
सोते समय फिर कहा —
“मैंने किसी का बुरा नहीं किया… बस इंसाफ दे देना।”
कर्मों का हिसाब
अगले ही दिन विक्रम की मुश्किलें शुरू हुईं।
सीनियर से डांट
पत्नी ने तलाक की बात कर दी
पुराना रिश्वत वाला केस खुल गया
गाड़ी खराब
बैंक अकाउंट फ्रीज
भ्रष्टाचार जांच
और फिर… सस्पेंशन
कुछ ही हफ्तों में उसकी नौकरी चली गई।
तलाक हो गया।
दोस्त दूर हो गए।
रुतबा खत्म।
वर्दी खत्म।
इज्जत खत्म।
फिर मुलाकात
एक दिन वह उसी सड़क से गुजर रहा था।
रामदीन काका फिर ठेला लगाए बैठे थे।
विक्रम उनके पास गया…
और घुटनों पर बैठ गया।
“काका… माफ कर दो… मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई।”
काका ने शांत आवाज में कहा —
“मैंने बद्दुआ नहीं दी बेटा।
मैंने सिर्फ इंसाफ मांगा था।”
फिर बोले —
“जिसकी रोजी छीनोगे, भगवान तुम्हारी रोजी छीन लेगा।”
विक्रम फूट-फूटकर रो पड़ा।
बदलाव
उस दिन के बाद विक्रम बदल गया।
शराब छोड़ी
गुस्सा छोड़ा
गलत कमाई लौटाने की कोशिश की
सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने लगा
हर महीने ₹500 काका को देने लगा।
कहता — “मेरी माफी समझ लो।”
काका मना करते, पर वह जिद करता।
आज
रामदीन काका अब भी ठेला लगाते हैं।
सावित्री देवी साथ देती हैं।
उनके पास धन नहीं,
लेकिन सुकून है।
विक्रम के पास पहले सब था,
पर इंसानियत नहीं थी।
अब उसके पास इंसानियत है,
पर बाकी सब खो चुका है।
कहानी की सीख
ताकत का इस्तेमाल दबाने के लिए नहीं, उठाने के लिए करो
गरीब का दिल मत दुखाओ
मेहनत की कमाई की कीमत समझो
कर्मों का हिसाब जरूर होता है
और सबसे बड़ी बात —
मजलूम की दुआ भी लगती है,
और आह भी।
जो बोओगे, वही काटोगे।
इसलिए हमेशा अच्छाई बोओ।
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