आग, धोखा और एक अधूरा प्यार

यह कहानी सिर्फ एक डीएसपी की नहीं है।
यह कहानी है एक पति की, जिसने अपनी पत्नी को जलते देखा… उसे खो दिया… और फिर उसे जिंदा पाया—लेकिन किस्मत ने उसे दूसरी बार भी छीन लिया।

यह कहानी है आदित्य, नैना और उस मासूम बच्चे की, जो सच का सबसे बड़ा सबूत था।

1. राख में दबी हुई जिंदगी

डीएसपी आदित्य शेखावत कभी बेहद मजबूत इंसान माना जाता था।
कानून उसके लिए ड्यूटी नहीं, धर्म था।

लेकिन एक साल पहले उसकी दुनिया खत्म हो गई।

उसकी पत्नी नैना की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।
पोस्टमार्टम हुआ। रिपोर्ट आई। अंतिम संस्कार हुआ।

आदित्य ने खुद अपनी पत्नी की चिता को आग दी।
उस दिन उसके साथ उसका दिल भी जल गया।

उसके बाद वह सिर्फ जिंदा था—जी नहीं रहा था।

2. ट्रेन में गूंजती एक आवाज

एक रात वह जयपुर से दिल्ली जा रही ट्रेन में बैठा था।
बाहर अंधेरा दौड़ रहा था, अंदर खामोशी।

तभी एक आवाज गूंजी—
“गरम-गरम चने ले लो…”

आदित्य का दिल रुक गया।
यह आवाज… वही थी।

नैना की।

उसने गर्दन घुमाई।
गलियारे में एक औरत टोकरी लिए चल रही थी।

चेहरा रोशनी में आया—
वह नैना थी।

वही आंखें।
वही चेहरा।
वही चाल।

आदित्य ने कांपती आवाज में कहा—
“नैना…”

औरत ठिठकी।
उसने देखा… मगर पहचान नहीं दिखाई।
सिर्फ डर।

और वह तेजी से आगे बढ़ गई।

जब तक आदित्य पहुंचता—वह गायब।

3. सीसीटीवी का सच

अगले स्टेशन पर आदित्य उतर गया।
सीसीटीवी फुटेज देखी गई।

इस बार वह साफ दिखी—
लेकिन अकेली नहीं।

उसकी गोद में एक बच्चा था।
करीब तीन साल का।

और उस बच्चे की आंखें…
बिल्कुल आदित्य जैसी थीं।

आदित्य समझ गया—
यह संयोग नहीं है।

4. झोपड़ी का दरवाजा

स्टेशन के पीछे की बस्ती में खोजते-खोजते वह एक झोपड़ी तक पहुंचा।
अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आई।

उसने दरवाजा खटखटाया—
“पुलिस! दरवाजा खोलो।”

दरवाजा खुला।

सामने नैना थी।
जिंदा।
गोद में बच्चा।

आदित्य की आंखें भर आईं।
“नैना… मैं आदित्य हूं…”

नैना पीछे हट गई।
“आप गलत समझ रहे हैं साहब… मैं नैना नहीं।”

लेकिन अंदर रखी एक शादी की फोटो ने झूठ तोड़ दिया।

नैना रो पड़ी।

5. साजिश का खुलासा

नैना बोली—
“वह हादसा नहीं था… साजिश थी।”

“किसने?”

“तुम्हारे भाई सुरेंद्र ने।”

जायदाद के लालच में उसने कार के ब्रेक फेल करवाए।
नैना बच गई थी…
लेकिन उसे अगवा कर लिया गया।

किसी और की जली लाश को उसकी लाश बना दिया गया।

और आदित्य ने उसी झूठ का अंतिम संस्कार कर दिया।

6. भागती हुई रात

तभी बाहर कदमों की आहट आई।
सुरेंद्र के लोग।

आदित्य ने नैना और बच्चे को पीछे की खिड़की से निकाला।
अंधेरी गलियों में भागते हुए गोलियां चलीं।

एक गोली आदित्य के कंधे को छू गई।
लेकिन वह रुका नहीं।

रेलवे ट्रैक के पास सुरेंद्र सामने आ गया।
हाथ में पिस्तौल, चेहरे पर ठंडी मुस्कान।

“बहुत दिन बाद मिले छोटे भाई।”

गोलियां चलीं।
अराजकता फैल गई।

और तभी—
एक गोली नैना के सीने में लगी।

वह गिर गई।

7. दूसरी और असली मौत

नैना ने आखिरी सांसों में कहा—
“बच्चे को बचा लेना…”

और उसकी आंखें बंद हो गईं।

इस बार कोई धोखा नहीं था।
इस बार मौत सच थी।

पुलिस पहुंची।
मुठभेड़ में सुरेंद्र मारा गया।

लेकिन आदित्य के लिए जीत का कोई मतलब नहीं था।

उसकी गोद में फिर वही चेहरा था—
जो अब हमेशा के लिए शांत हो चुका था।

8. नई जिम्मेदारी

अब आदित्य अकेला नहीं था।
उसके पास उसका बेटा था।

रातों को वह उठकर उसकी सांसें सुनता।
जैसे यकीन कर रहा हो—
अब कोई धोखा नहीं होगा।

जब बच्चा “पापा” कहता—
उसे जीने की वजह मिलती।

9. दर्द से जन्मी ताकत

आदित्य पहले से ज्यादा सख्त अफसर बन गया।
लेकिन यह सख्ती कानून के लिए नहीं—
औरतों और बच्चों की सुरक्षा के लिए थी।

उसने महिलाओं के मामलों के लिए अलग यूनिट बनाई।
हर पीड़ित औरत में उसे नैना दिखती।

वह जानता था—
इंसाफ जख्म नहीं भरता,
लेकिन किसी और को टूटने से बचा सकता है।

10. एक तारा आसमान में

एक रात उसने आसमान की तरफ देखा।
एक तारे को देखकर मुस्कुराया—

“नैना… तुम यहीं कहीं हो ना?”

कोई जवाब नहीं आया।
मगर उसे जरूरत भी नहीं थी।

क्योंकि वह समझ चुका था—

कुछ लोग मरकर भी नहीं जाते।
वे हमारी हिम्मत में जिंदा रहते हैं।

सीख

जिंदगी कभी-कभी हमें तोड़ती है
ताकि हमें हमारी असली ताकत दिखा सके।

प्यार खत्म नहीं होता—
वह जिम्मेदारी बन जाता है।

और सच…
देर से सही, सामने जरूर आता है।