18 Saal Ki Yateem Kaniiz Ka Nikah 70 Saal Ke Beemar Boodhe Se 😱 Vasiyat Ne Shehar Hila Diya…

सब्र का फल और अल्लाह का इंसाफ
अध्याय 1: यतीम का आँगन और बेबसी की धूप
एक छोटे से कस्बे की तंग गलियों में एक कच्चा सा मकान था, जहाँ 18 साल की कनीज रहती थी। कनीज की आँखों में वह चमक नहीं थी जो उस उम्र की लड़कियों में होती है, बल्कि वहाँ एक गहरा सन्नाटा और अपनों द्वारा दिए गए जख्मों की परछाई थी। जब वह बहुत छोटी थी, तभी एक हादसे ने उसके सिर से माता-पिता का साया छीन लिया था। वह अपने बड़े भाई राशिद और भाभी सलमा के साथ रहती थी।
राशिद दिल का बुरा नहीं था, लेकिन वह अपनी पत्नी सलमा की कड़वी जुबान और चालाकी के सामने बेबस था। सलमा के लिए कनीज सिर्फ एक “मुफ्त की रोटियाँ तोड़ने वाली बोझ” थी। सुबह की पहली अज़ान के साथ कनीज का काम शुरू होता—सफाई, बर्तन, कपड़े और सबके लिए खाना बनाना। बदले में उसे मिलता तो सिर्फ बासी रूखी रोटियाँ और ताने।
अध्याय 2: लालच की साजिश
कनीज अब जवान हो चुकी थी। मोहल्ले वाले राशिद से उसकी शादी की बात करने लगे। सलमा को चिंता सताने लगी कि अगर किसी जवान लड़के से शादी की, तो दहेज देना पड़ेगा। तभी एक दिन एक रिश्ता आया—शहर के मशहूर और अमीर सेठ जमालुद्दीन साहब का। उनकी उम्र 70 साल थी, वे बीमार थे और उनके आगे-पीछे कोई सेवा करने वाला नहीं था।
बुढ़िया (बिचौलिया) ने सलमा को लालच दिया, “सेठ जी दहेज नहीं मांग रहे, बल्कि मेहर की एक बहुत बड़ी रकम देंगे। बस उन्हें एक सेवा करने वाली बीवी चाहिए।” सलमा की आँखों में चमक आ गई। उसने सोचा, “बूढ़ा बीमार है, कुछ महीनों में मर जाएगा, फिर कनीज विधवा हो जाएगी और मेहर का पैसा हमारा होगा।”
जब कनीज को यह पता चला, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। “भाईजान, क्या मेरा कसूर सिर्फ इतना है कि मैं यतीम हूँ? क्या अब्बू जिंदा होते तो वे मुझे एक बुजुर्ग के हवाले करते?” उसने मिन्नतें कीं, लेकिन सलमा ने धमकी दी, “या तो निकाह कर, वरना घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हैं।”
अध्याय 3: एक खामोश निकाह
निकाह का दिन किसी मातम जैसा था। न ढोल, न शहनाई। कनीज को पुरानी संदूक से निकला एक लाल जोड़ा पहनाया गया। सेठ जमालुद्दीन कार से बड़ी मुश्किल से लाठी के सहारे उतरे। उनके सफेद बाल और झुर्रियों वाला चेहरा देखकर कनीज का कलेजा मुँह को आ गया। उसने भारी मन से “कुबूल है” कहा। यह कुबूलनामा एक बुजुर्ग के लिए नहीं, बल्कि अपनी किस्मत के लिए था।
जैसे ही निकाह हुआ, सेठ जी ने वादे के मुताबिक राशिद के हाथ में नोटों की गड्डियाँ थमा दीं। सलमा ने विदाई के वक्त कनीज को गले तक नहीं लगाया, बस इतना कहा, “अब जा और हमें भूल जा।”
अध्याय 4: हवेली का सन्नाटा और सेवा का सफर
सेठ जी की आलीशान हवेली में सन्नाटा पसरा था। नौकर तो बहुत थे, लेकिन अपनापन कहीं नहीं था। कमरे में दवाइयों की गंध भरी रहती थी। कनीज जब कमरे में दाखिल हुई, तो सेठ जी ने कमजोर आवाज में कहा, “बेटी, मुझे माफ करना। मैंने तुम्हारी जवानी कैद कर ली। मुझे बीवी नहीं, एक सहारा चाहिए था जो मेरी आख़िरी वक्त में खिदमत कर सके। मैं तुम्हें बीवी का हक तो नहीं दे पाऊंगा, लेकिन इज्जत और दौलत में कमी नहीं आने दूंगा।”
कनीज का दिल पसीज गया। उसने अपनी किस्मत से समझौता कर लिया और सेठ जी की सेवा को ही अपनी इबादत बना लिया। वह सुबह फज्र में उठती, नमाज पढ़ती और फिर सेठ जी की तीमारदारी में लग जाती। वह उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाती, वक्त पर दवा देती और रात-रात भर उनके सिरहाने बैठकर कुरान की आयतें पढ़ती।
अध्याय 5: इंसान नहीं, फरिश्ता
कनीज की सेवा का ऐसा असर हुआ कि डॉक्टर हैरान रह गए। जो सेठ जी 6 महीने के मेहमान बताए गए थे, वे कनीज की दुआओं और सेवा से 2 साल तक जीवित रहे। हवेली के नौकर भी कनीज की सादगी और नेकदिली के कायल हो गए। उसने कभी नए कपड़े या गहने नहीं माँगे।
एक बार सलमा और राशिद हवेली आए यह देखने कि कनीज ने कितनी दौलत बटोरी है। जब उन्होंने कनीज को सादे कपड़ों में सेठ जी के पैर दबाते देखा, तो सलमा बोली, “तू तो यहाँ भी नौकरानी ही बनी रही।” कनीज ने शांति से जवाब दिया, “भाभी, यहाँ मेरी जन्नत है।”
अध्याय 6: आख़िरी वक्त और गिद्धों का जमावड़ा
आखिरकार वह रात आ गई जब सेठ जी की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्होंने कनीज का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “कनीज, तुमने मेरी रूह को सुकून दिया है। अल्लाह तुम्हें इसका अजर देगा।” कलमा पढ़ते हुए उन्होंने आख़िरी सांस ली।
सेठ जी के मरते ही वे तमाम रिश्तेदार जो कभी हाल पूछने नहीं आए थे, गिद्धों की तरह हवेली में जमा हो गए। सबकी नजर तिजोरी और जायदाद पर थी। सलमा और राशिद भी “हक” मांगने पहुँच गए। कनीज कोने में बैठी खामोश आँसू बहा रही थी।
अध्याय 7: वसीयतनामा—एक बड़ा धमाका
वकील साहब ने सबको हॉल में बुलाया। सबकी निगाहें उनकी फाइल पर थीं। वकील ने पढ़ना शुरू किया: “मैं, जमालुद्दीन, अपनी पूरी होशो-हवास में यह वसीयत लिख रहा हूँ। जब मैं तड़प रहा था, तब मेरे किसी रिश्तेदार ने मुझे पानी नहीं पिलाया। इसलिए, मैं अपने किसी भी रिश्तेदार को एक फूटी कौड़ी भी नहीं दे रहा।”
रिश्तेदारों के चेहरों का रंग उड़ गया। वकील ने आगे पढ़ा: “मेरी तमाम जायदाद—यह हवेली, शहर की 50 दुकानें, फैक्ट्रियां और बैंक का सारा पैसा—मैं अपनी बीवी कनीज के नाम करता हूँ। वह इस शहर की सबसे अमीर औरत है।”
सन्नाटा छा गया। सलमा का मुँह खुला का खुला रह गया। जो कनीज कल तक यतीम और बेबस थी, आज वह करोड़ों की मालकिन थी।
अध्याय 8: इंसाफ की घड़ी
सलमा तुरंत दौड़कर कनीज के पैरों में गिर गई, “कनीज मेरी बच्ची, मुझे माफ कर दे। हम तेरे अपने हैं, खून का रिश्ता है। चल घर चल, हम सब साथ रहेंगे।”
कनीज ने धीरे से अपना पैर पीछे खींचा। उसकी आँखों में अब वह पुराना डर नहीं था। उसने कहा, “भाभी, जब मुझे एक रोटी की जरूरत थी, तब आपने ताने दिए। जब मुझे सहारे की जरूरत थी, तब आपने मेरा सौदा किया। खून का रिश्ता तो उसी दिन खत्म हो गया था भाईजान, जिस दिन आपने चंद रुपयों के लिए मुझे मौत के मुँह में धकेला था।”
उसने राशिद और सलमा को हवेली से निकाल दिया। यह बदला नहीं था, बल्कि उन जहरीले रिश्तों से खुद को आजाद करना था।
अध्याय 9: फर्श से अर्श तक
कनीज ने उस दौलत का इस्तेमाल ऐशो-आराम के लिए नहीं किया। उसने सेठ जमालुद्दीन के नाम पर एक बड़ा यतीमखाना और मुफ्त अस्पताल खोला। वह खुद उन बच्चियों की शादी करवाती जिनके माता-पिता नहीं थे। शहर के लोग उसे अब “कनीज मां” कहने लगे थे।
निष्कर्ष: इंसान चाहे जितनी भी चालाकी कर ले, तकदीर का कलम अल्लाह के हाथ में है। कनीज का सब्र और उसकी निस्वार्थ सेवा ने उसे उस मुकाम पर पहुँचा दिया, जहाँ दुनिया की कोई ताकत उसे नहीं पहुँचा सकती थी। जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं, वे खुद उसमें गिरते हैं।
शिक्षा: सब्र का फल हमेशा मीठा होता है और अल्लाह यतीमों का सबसे बड़ा वाली और मददगार है।
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