सीट नंबर 21 – एक सफ़र, जो ज़िंदगी बन गया
दोस्तों, कहते हैं न—कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे रास्तों पर ले आती है जहाँ न हम किसी को जानते हैं, न किसी से कोई उम्मीद रखते हैं।
लेकिन वहीं कोई अजनबी, कुछ ही घंटों में, हमारे दिल पर ऐसी छाप छोड़ जाता है कि उम्र भर मिटती नहीं।
दिल्ली का एक गर्म दिन था।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की भीड़, शोर और भागदौड़ के बीच एक लड़की अकेली खड़ी थी।
उसका नाम था अंशु मिश्रा।
24 साल की होनहार, आत्मविश्वासी और तेज़ दिमाग़ वाली लड़की। दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहकर यूपीएससी की तैयारी कर रही थी। छुट्टियों में अपने गांव दरभंगा लौट रही थी।
दरभंगा स्पेशल ट्रेन, S5 कोच, सीट नंबर 21—सब कुछ तय था।

अंशु ट्रेन में चढ़ी, भारी बैग रखा और राहत की सांस लेकर अपनी सीट पर बैठ गई। ट्रेन चली, और उसने किताब खोल ली—वही किताब जिसमें उसके आईएएस बनने के सपने बसे थे।
करीब आधे घंटे बाद एक लड़का आया।
उम्र लगभग 27–28 साल। सादा पहनावा, शांत चेहरा और आंखों में अजीब-सा आत्मविश्वास।
उसका नाम था अरुण।
वह उसी सीट के पास बैठने लगा।
अंशु झुंझला गई।
“एक्सक्यूज़ मी! यह मेरी रिज़र्व सीट है।”
अरुण हल्का-सा मुस्कुराया।
“मैम, मेरा भी टिकट है। मैं यहीं बैठूंगा।”
अंशु का गुस्सा बढ़ गया।
“मैं किसी अजनबी को अपनी सीट पर नहीं बैठने दूंगी।”
अरुण भी पीछे हटने वालों में से नहीं था।
“अजनबी हूं, लेकिन टिकट लेकर आया हूं। अब आप बैठिए या लेटिए—मैं यहीं रहूंगा।”
आसपास के लोग बोलने लगे—
“लड़की अकेली है।”
“शर्म नहीं आती?”
“घर में बहन नहीं है क्या?”
लेकिन अरुण शांत था।
“मैं किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रहा। बस अपना हक मांग रहा हूं।”
धीरे-धीरे भीड़ चुप हो गई।
अंशु गुस्से में लेट गई—जानबूझकर ऐसे कि उसका पैर बार-बार अरुण से टकराने लगा।
अरुण ने शांति से कहा,
“मैडम, इतना भी मत गिरिए। मैं भी इंसान हूं।”
अंशु तड़प गई।
“सीट मेरी है। मैं जैसे चाहूं बैठूं!”
अरुण मुस्कुरा दिया।
“ठीक है। कीजिए। मैं भी अपना हक लेकर ही जाऊंगा।”
एक घंटे बाद टीटी आया।
टिकट मांगा।
अंशु घबरा गई।
“सर, मेरा पर्स कमरे में छूट गया है… पैसे भी नहीं हैं।”
टीटी सख्त था।
“या तो ₹150 दीजिए या सीट खाली कीजिए।”
अंशु की आंखों में आंसू आ गए।
तभी अरुण उठा।
“सर, टिकट बना दीजिए। पैसे मैं दे दूंगा।”
टीटी चौंका।
“तुम्हारा टिकट दिखाओ।”
अरुण ने फर्स्ट क्लास वेटिंग टिकट दिखाया।
टीटी ने पूछा,
“तो यहां क्यों बैठे हो?”
अरुण बोला,
“क्योंकि इंसानियत क्लास देखकर नहीं आती। अगर मेरे पैसे किसी ज़रूरतमंद की मदद में लग जाएं—तो वही मेरी क्लास है।”
टीटी चुपचाप पैसे लेकर चला गया।
अंशु कांपते हाथों से बोली,
“आपने ₹1800 दे दिए… क्यों?”
अरुण ने कहा,
“कभी-कभी किसी को उसकी गलती का एहसास कराने के लिए उसे बचाना ज़रूरी होता है।”
उस पल अंशु की आंखों में शर्म भी थी, सम्मान भी।
धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई।
पढ़ाई, संघर्ष, ज़िंदगी।
अरुण ने बताया—
वह पहले यूपीएससी की तैयारी करता था।
तीन अटेम्प्ट।
अब बिहार में नायब तहसीलदार था।
अंशु अवाक रह गई।
“आप अफसर हैं?”
अरुण मुस्कुराया।
“हां… और वही इंसान जिसे आपने सबसे ज़्यादा डांटा।”
अंशु ने कान पकड़ लिए।
“मुझे माफ कर दीजिए।”
अरुण बोला,
“अफसर बाद में, इंसान पहले।”
रात गहराती गई।
दोनों आधी-आधी सीट पर बैठे, बातें करते रहे।
थकान ने कब आंखों पर कब्जा कर लिया, पता ही नहीं चला।
अंशु का सिर नींद में अरुण के कंधे पर टिक गया।
अरुण ने कुछ नहीं कहा—बस चुपचाप बैठा रहा।
सुबह हुई।
सोनपुर स्टेशन आया।
अब दोनों अजनबी नहीं थे।
नंबर शेयर हुए।
बातें बढ़ीं।
साल बीतते गए।
अरुण हर परीक्षा में अंशु का सहारा बना।
2023 में अंशु का नाम लिस्ट में था।
पहला फोन—अरुण को।
कुछ समय बाद—
2024 में शादी।
आज भी अंशु नए अफसरों से कहती है—
“कभी किसी अजनबी को छोटा मत समझिए।
क्या पता वही आपकी ज़िंदगी की सबसे मज़बूत सीट बन जाए।”
और हर बार उसकी नज़र
सीट नंबर 21
पर ठहर जाती है।
जहाँ एक बहस से
एक हमसफ़र बना था।
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