मूली की वजह से महिला के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/पुलिस भी सोचने पर मजबूर हो गई/

मर्यादा की दहलीज और नियति का खेल
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में स्थित ‘पटकापुर’ एक शांत सा गाँव है, जहाँ की गलियाँ अक्सर पुरानी परंपराओं और सामाजिक मर्यादाओं की गवाह रही हैं। इसी गाँव के एक छोटे से घर में रहती थी अलका देवी। अलका एक सुंदर और मेहनती महिला थी, लेकिन नियति ने उसके साथ एक क्रूर खेल खेला था। एक साल पहले उसके पति की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उसके जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
अकेलेपन का संघर्ष
अलका के परिवार में उसका 12 साल का बेटा बबलू, जो छठी कक्षा में पढ़ता था, और उसकी सासू माँ मधुमती देवी थे। पति के जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी अलका के नाजुक कंधों पर आ गई थी। वह दिन भर मेहनत-मजदूरी करती ताकि अपने बेटे को अच्छी शिक्षा दे सके और घर का चूल्हा जलता रहे। लेकिन इस मेहनत के बीच वह भीतर ही भीतर एक गहरे अकेलेपन से जूझ रही थी।
उसकी सास, मधुमती देवी, पुराने खयालात की महिला थीं। उन्हें हमेशा डर रहता था कि समाज की बुरी नजरें उनकी विधवा बहू पर न पड़ें, इसलिए वे अलका पर एक पहरेदार की तरह नजर रखती थीं। अलका जहाँ भी जाती, मधुमती उसके साथ साये की तरह रहती। यह ‘सुरक्षा’ धीरे-धीरे अलका के लिए एक दमघोंटू कैद बनती जा रही थी।
विधवा पेंशन और सरपंच का प्रलोभन
अलका की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पति की मृत्यु के बाद उसे सरकारी ‘विधवा पेंशन’ की सख्त जरूरत थी, लेकिन दफ्तरों के चक्कर काटने के बावजूद उसका काम नहीं बन पा रहा था। उसकी सहेली रजनी, जो खुद एक विधवा थी, ने उसे सलाह दी कि गाँव के सरपंच हरकेश से मिलना ही एकमात्र रास्ता है। रजनी ने यह भी संकेत दिया कि सरपंच स्वभाव से थोड़ा ‘चंचल’ है और महिलाओं के प्रति उसकी नीयत हमेशा साफ नहीं रहती, लेकिन अलका के पास और कोई विकल्प नहीं था।
एक शाम, जब उसकी सास घर पर नहीं थी, अलका सरपंच हरकेश के पास जाने का साहस जुटाती है। उसे पता चलता है कि सरपंच अपने खेतों की ओर गया है। अलका जब वहाँ पहुँचती है, तो देखती है कि हरकेश शराब के नशे में धुत है। अलका ने जब अपनी पेंशन की गुहार लगाई, तो हरकेश ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए एक शर्त रख दी। उसने कहा, “पेंशन तो बन जाएगी, लेकिन तुम्हें मुझे ‘प्रसन्न’ करना होगा।”
मजबूरी और गरीबी ने अलका के स्वाभिमान को उस क्षण दबा दिया। उसने सोचा कि अगर पेंशन बन गई तो उसके बेटे का भविष्य सुधर जाएगा। उस शाम खेतों के एकांत में मर्यादा की वह दीवार ढह गई जिसे अलका ने सालों से संजोया था।
षड्यंत्र का जाल
काम आगे बढ़ाने के लिए सरपंच ने उसे गाँव के सीएससी सेंटर चलाने वाले युवक रिंकू के पास भेजा। रिंकू भी सरपंच जैसा ही अवसरवादी निकला। उसने अलका को बताया कि सरपंच का फोन आ गया है, लेकिन उसे भी अपनी ‘सेवा’ चाहिए। अलका एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई थी जहाँ से निकलने का हर रास्ता शर्मिंदगी और समझौतों से होकर गुजरता था। रिंकू के साथ भी उसे वही सब करना पड़ा जो उसने सरपंच के साथ किया था।
एक दिन, जब रिंकू और सरपंच अलका के साथ खेतों में अनैतिक चर्चा और शराब पी रहे थे, तभी गाँव की एक अन्य महिला ‘राधा’ ने उन्हें देख लिया। राधा ने बिना देर किए यह बात अलका की सास मधुमती को बता दी।
घर में क्लेश और भयानक अंत
जब अलका उस दिन घर लौटी, तो मधुमती का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने अलका को अपशब्द कहे और उसे घर से बाहर निकलने की धमकी दी। अलका ने अपनी सफाई में पेंशन की बात कही, लेकिन सास ने उसे ‘चरित्रहीन’ करार दे दिया।
अगले कुछ दिनों तक घर में तनाव का माहौल बना रहा। अलका को घर के अंदर कैद कर दिया गया। ३ जनवरी २०२६ की सुबह, अलका और उसकी पड़ोसन रजनी के बीच हुई एक गुप्त बातचीत ने आग में घी का काम किया। रजनी ने अलका को बताया कि वह अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए कुछ ‘निजी’ साधनों का सहारा लेती है।
अलका ने भी रजनी की सलाह पर सब्जी वाले से कुछ सब्जियां (मूलियाँ) खरीदीं और रसोई से एक मूली लेकर एकांत की तलाश में बाथरूम चली गई। उसकी संदिग्ध हरकतों पर नजर रख रही मधुमती को शक हुआ। उन्होंने जब बाथरूम का दरवाजा खोला और अलका को ‘अमर्यादित’ स्थिति में देखा, तो वे अपनी बहू पर बरस पड़ीं।
सास और बहू के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। गाली-गलौज और अपमान के बीच अलका का मानसिक संतुलन डगमगा गया। उसने गुस्से में अपनी सास को जोर से धक्का दिया। ६० वर्षीय मधुमती का सिर दीवार से जाकर टकराया और वे लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़ीं। मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई।
कानून का शिकंजा
शोर सुनकर पड़ोसी इकट्ठा हो गए। गाँव के ही एक व्यक्ति रामनिवास ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने आकर अलका को हिरासत में ले लिया। जब अलका ने पुलिस स्टेशन में अपनी आपबीती सुनाई, तो सब सन्न रह गए। उसने बताया कि कैसे गरीबी, अकेलेपन और व्यवस्था की खामियों ने उसे एक अपराधी बना दिया।
अलका अब जेल की सलाखों के पीछे है और उसका १२ साल का बेटा बबलू दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है।
निष्कर्ष
यह घटना हमें सिखाती है कि समाज में जब नैतिक मूल्यों का पतन होता है और व्यवस्था गरीबों का शोषण करती है, तो उसका परिणाम केवल विनाश होता है। मर्यादा की दहलीज पार करना कभी सुखद नहीं होता।
नोट: यह कहानी समाज में जागरूकता फैलाने और अपराध के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से लिखी गई है। किसी भी प्रकार की अनैतिकता और हिंसा कानूनन अपराध है।
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