गरीब लड़की ने एक भिखारी औरत को खाना खिलाया,पता चला वो करोड़पति है.. फिर जो हुआ
कहते हैं ना, जब इंसान बिना किसी लालच के दिल से किसी की मदद करता है, तो ऊपर वाला भी उसकी किस्मत बदल देता है। प्रिया नाम की एक साधारण लड़की थी। पढ़ी-लिखी, मेहनती और दिल की बहुत नेक। उसने अपनी पढ़ाई बड़ी मुश्किल से पूरी की थी। उसके पापा एक छोटी सी दुकान चलाते थे और मां घरों में बर्तन मांझने का काम करती थीं। प्रिया ने बहुत मेहनत से पढ़ाई की थी, और अब उसे एक बड़ी कंपनी में इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। आज उसका सपना पूरा होने वाला था।
सुबह से ही घर में खुशी की लहर थी। मां ने प्यार से कहा, “बेटी, भगवान तेरे साथ है। तूने हमेशा सबकी मदद की है। आज तेरी मेहनत रंग लाएगी।” प्रिया ने मां को गले लगाया और बोली, “मां, मैं सबसे पहले आपको और पापा को इस गरीबी से बाहर निकालूंगी।” पापा की आंखें भर आईं। उन्होंने बेटी के सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटी, तू हमारा गर्व है।”
प्रिया बस से उतरकर उस बड़ी कंपनी के ऑफिस के सामने खड़ी थी। बहुत ऊंची बिल्डिंग, कांच की दीवारें, चमकदार गेट। उसने एक गहरी सांस ली और अंदर जाने लगी। गेट पर ही उसे एक बूढ़ी औरत दिखी, जो फर्श पर बैठकर कुछ खा रही थी। उसके कपड़े मैले थे, बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। शायद वह वहां काम करने वाली सफाई कर्मचारी थी।
प्रिया रुक गई। उसने देखा कि बूढ़ी औरत के हाथ में सिर्फ एक सूखी रोटी थी। प्रिया के मन में कुछ हिला। उसे अपनी मां की याद आ गई, जो रोज सुबह खाली पेट ही काम पर निकल जाती थी। प्रिया के पास ज्यादा कुछ नहीं था। सिर्फ घर से लाया हुआ एक छोटा सा डिब्बा था, जिसमें दो परांठे और आचार था। उसने बिना सोचे उस बूढ़ी औरत के पास जाकर कहा, “आंटी, क्या आप यह लेंगी? मैंने अभी घर से खाया है। आप इसे खा लीजिए।”
बूढ़ी औरत ने ऊपर देखा। उसकी आंखों में हैरानी थी। उसने धीरे से कहा, “बेटी, तुम्हें भूख लगेगी। तुम रख लो।” प्रिया मुस्कुराई और बोली, “नहीं आंटी, मैं मैनेज कर लूंगी। आप खा लीजिए, प्लीज।” बूढ़ी औरत की आंखें भर आईं। उसने डिब्बा लिया और धीरे से बोली, “बेटी, भगवान तुम्हारा भला करे। तुम बहुत अच्छी हो।” प्रिया ने सिर्फ मुस्कुरा कर नमस्ते किया और अंदर चली गई।
रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने उसे रूम नंबर बताया। प्रिया लिफ्ट की तरफ बढ़ी। उसका दिल तेज धड़क रहा था। यह उसके जीवन का सबसे बड़ा मौका था। लिफ्ट में जाते हुए उसे उस बूढ़ी औरत का चेहरा याद आया। उसने सोचा, “काश मेरे पास और कुछ होता तो मैं उसे और भी कुछ दे पाती।”
इंटरव्यू रूम में तीन लोग बैठे थे। दो मर्द और एक औरत। प्रिया ने अपना बेस्ट दिया। अपनी पढ़ाई के बारे में बताया। अपने सपनों के बारे में बताया। लेकिन उनके चेहरों पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं थी। एक सज्जन ने पूछा, “प्रिया, आप इस जॉब से क्या उम्मीद रखती हैं?” प्रिया ने सच्चाई से जवाब दिया, “सर, मैं अपने माता-पिता को अच्छी जिंदगी देना चाहती हूं। उन्होंने मुझे पढ़ाने के लिए बहुत तकलीफ सही है।”
इंटरव्यू खत्म हुआ। उन्होंने कहा, “हम आपको कॉल करेंगे।” प्रिया बाहर आई। उसे लग रहा था कि शायद उसका चयन नहीं हुआ। दिल भारी हो गया। वह धीरे-धीरे बाहर की तरफ चल रही थी। गेट के पास पहुंचकर उसने देखा कि वही बूढ़ी औरत अब फर्श पोंछ रही थी। प्रिया ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा दी। तभी अचानक एक बड़ी गाड़ी तेज रफ्तार में अंदर घुसी। बूढ़ी औरत रास्ते में थी। प्रिया ने जोर से चीखा, “आंटी, हटिए!” और दौड़कर उसे धक्का देकर एक तरफ कर दिया। गाड़ी रुक गई। लेकिन धक्के में प्रिया खुद गिर गई। उसके हाथ में चोट लग गई और घुटने छिल गए।
बूढ़ी औरत डर के मारे कांप रही थी। गाड़ी से एक आदमी उतरा और बोला, “सॉरी, सॉरी। मुझसे गलती हो गई।” प्रिया दर्द में थी लेकिन उसे बूढ़ी औरत की चिंता थी। “आंटी, आप ठीक हैं ना?” बूढ़ी औरत रोने लगी। “बेटी, तूने मेरी जान बचा ली। तुझे तो चोट लग गई।” प्रिया ने हंसते हुए कहा, “आंटी, यह तो कुछ नहीं है। आप सही सलामत हैं। बस यही काफी है।”
सिक्योरिटी गार्ड भाग कर आया। कुछ ऑफिस के लोग भी आ गए। एक लड़की ने फर्स्ट एड बॉक्स लाकर प्रिया के हाथ पर पट्टी बांधी। बूढ़ी औरत प्रिया का हाथ पकड़े खड़ी थी। उसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। “बेटी, तू देवी है। तूने अपनी जान पर खेलकर मुझे बचाया।” प्रिया शर्माई और बोली, “आंटी, ऐसा कुछ नहीं है। आप मेरी मां जैसी हैं। मैं कैसे आपको खतरे में देखती?”

बूढ़ी औरत ने उसे गले लगा लिया। फिर धीरे से पूछा, “बेटी, तेरा नाम क्या है?” प्रिया ने कहा, “मेरा नाम प्रिया है, आंटी। मैं यहां इंटरव्यू देने आई थी।” बूढ़ी औरत ने कुछ सोचा और फिर बोली, “बेटी, तू जा लेकिन याद रख, अच्छे लोगों के साथ हमेशा अच्छा ही होता है।” प्रिया मुस्कुराई और वहां से चली गई।
रास्ते भर उसे दर्द हो रहा था। लेकिन दिल में सुकून था। घर पहुंचकर मां ने जब चोट देखी तो घबरा गई। “बेटी, यह क्या हो गया?” प्रिया ने पूरा किस्सा सुनाया। पापा ने गर्व से कहा, “बेटी, तूने बिल्कुल सही किया। जान से बड़ा कुछ नहीं होता।” मां ने चोट पर हल्दी लगाते हुए कहा, “बेटी, तूने जो नेकी की है, भगवान तुझे जरूर इसका फल देगा।”
प्रिया हंस दी। “मां, मुझे फल की उम्मीद नहीं थी। मुझे बस सही लगा तो मैंने कर दिया।” अगली सुबह प्रिया घर में झाड़ू लगा रही थी। उसका हाथ अभी भी दर्द कर रहा था। लेकिन वह काम कर रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। पापा ने दरवाजा खोला। बाहर एक अच्छे कपड़ों में सज्जन खड़ा था। “क्या प्रिया जी यहीं रहती हैं?” पापा ने पूछा, “जी हां। लेकिन आप कौन?”
वो आदमी मुस्कुराया और बोला, “मैं पिनिकल सशंस कंपनी का एचआर मैनेजर हूं। क्या मैं प्रिया जी से मिल सकता हूं?” प्रिया हैरान होकर बाहर आई। “जी, मैं प्रिया हूं।” एचआर मैनेजर ने एक लिफाफा निकाला और प्रिया को दिया। “प्रिया जी, हमारी कंपनी की चेयर पर्सन ने खुद आपको सेलेक्ट किया है। यह आपकी अपॉइंटमेंट लेटर है।”
प्रिया के हाथ से झाड़ू गिर गई। मां और पापा भी हैरान खड़े रहे। “लेकिन मेरा इंटरव्यू तो…” प्रिया की आवाज कांप रही थी। चार मैनेजर मुस्कुराए। “प्रिया जी, आपका असली इंटरव्यू कल गेट पर हो चुका था। जिस बूढ़ी औरत को आपने खाना दिया और जिसकी जान बचाई, वो हमारी चेयर पर्सन थी। वो नए कैंडिडेट को परखने के लिए ऐसा करती हैं। आपने उनकी दो बार मदद की। बिना कुछ सोचे, बिना कुछ मांगे। इसलिए वह आपको अपनी कंपनी में रखना चाहती हैं।”
प्रिया की आंखों से आंसू बहने लगे। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। मां ने उसे संभाला। पापा की आंखें भर आईं। एचआर मैनेजर ने आगे कहा, “उनके कहने पर ही मैं यहां आया हूं। और हां, आपकी सैलरी ₹80,000 प्रति महीने होगी। कल से आप ज्वाइन कर सकती हैं।” यह कहकर वह चला गया। प्रिया लिफाफा हाथ में लिए खड़ी रही। मां ने उसे गले लगा लिया। “बेटी, मैंने कहा था ना अच्छाई का फल जरूर मिलता है।”
पापा रो रहे थे। खुशी के आंसू थे। “बेटी, तूने हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।” प्रिया भी रो रही थी। लेकिन उसके दिल में अब भी एक सवाल था। “क्या वो बूढ़ी औरत सच में चेयर पर्सन थी? और उसने यह सब क्यों किया?” शाम को प्रिया ने फैसला किया कि वह कल ऑफिस जाकर उनसे मिलेगी। उसे धन्यवाद देगी। लेकिन उसे नहीं पता था कि कल उसके लिए और भी बड़े सरप्राइज का इंतजार कर रहे हैं।
अगले दिन सुबह प्रिया अपने नए ऑफिस के लिए तैयार हो रही थी। मां ने उसे दूध का गिलास दिया और बोली, “बेटी, वहां जाकर सबसे अच्छे से बात करना। तू वैसी ही रहना जैसी है।” प्रिया ने मां को गले लगाया। पापा ने आशीर्वाद दिया और वह निकल पड़ी। ऑफिस पहुंचकर रिसेप्शन पर उसने अपना नाम बताया।
लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रिया जी, चेयर पर्सन मैडम आपका इंतजार कर रही हैं। सीधे उनके केबिन में जाइए।” प्रिया घबराई हुई थी। दिल तेज धड़क रहा था। लिफ्ट से ऊपर पहुंची तो सामने एक बड़ा सा केबिन था। दरवाजे पर लिखा था “मिसेज मीरा सिंघानिया, चेयर पर्सन।” प्रिया ने हिम्मत करके दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई, “आओ बेटी।”
जब प्रिया अंदर गई तो देखा कि वही बूढ़ी औरत अब एक शानदार कुर्सी पर बैठी थी। साड़ी सुंदर थी। बाल बंधे हुए थे। चेहरे पर शांति थी। लेकिन आंखों में वही प्यार और ममता झलक रही थी। मीरा जी मुस्कुराई और बोली, “आओ प्रिया, बैठो।” प्रिया धीरे से बैठ गई। मीरा जी ने पूछा, “हाथ कैसा है अब?”
प्रिया ने झिझकते हुए कहा, “मैडम, अब बिल्कुल ठीक है। लेकिन मैडम, आपने मुझे इतना बड़ा मौका क्यों दिया? मैंने तो बस…”
मीरा जी ने बीच में ही टोका। “बेटी, तुमने बस क्या? तुमने मुझे खाना खिलाया जब तुम्हारे पास खुद के लिए कुछ नहीं था। तुमने मेरी जान बचाई अपनी परवाह किए बिना। यह छोटी बातें नहीं हैं बेटी। यह तुम्हारे दिल की सच्चाई है।”
प्रिया की आंखें भर आईं। मीरा जी ने आगे कहा, “बेटी, मेरे पास सब कुछ है। पैसा, नाम, यह कंपनी लेकिन मेरा कोई अपना नहीं है। मेरे बेटे की एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। पति भी नहीं रहे। मैं बिल्कुल अकेली हूं।” उनकी आवाज भर आई। “इसलिए मैं हर नए कैंडिडेट को परखती हूं। मैं देखना चाहती हूं कि कौन सच्चा है। कौन पैसों के पीछे भागता है और कौन इंसानियत के पीछे। बेटी, तुम में मुझे अपनी बेटी की छवि दिखी। वह भी तुम्हारी तरह दयालु थी। लेकिन किस्मत ने उसे मुझसे छीन लिया।”
मीरा जी रो पड़ीं। प्रिया उठकर उनके पास गई और उनका हाथ पकड़ लिया। “मैडम, रोइए मत। अब मैं हूं ना। अगर आप चाहें तो मुझे अपनी बेटी समझ लीजिए।” मीरा जी ने प्रिया को गले लगा लिया। दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे। एक को बेटी मिल गई थी। दूसरी को मां।
कुछ देर बाद मीरा जी ने कहा, “बेटी, आज से तुम सिर्फ मेरी कर्मचारी नहीं हो। तुम मेरी बेटी हो। तुम्हारे मां-बाप से मिलना चाहती हूं मैं।” प्रिया हैरान रह गई। “मैडम, लेकिन…” मीरा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई लेकिन वेकिन नहीं। शाम को तुम्हारे घर आ रही हूं।”
शाम को जब मीरा जी प्रिया के घर पहुंचीं तो मां-बाप दोनों घबरा गए। इतनी बड़ी महिला उनके छोटे से घर में। लेकिन मीरा जी ने बड़े प्यार से उन्हें गले लगाया। “आप दोनों बहुत भाग्यशाली हैं। आपने इतनी अच्छी बेटी पाली है।” पापा की आंखें भर आईं। मां रो पड़ीं। मीरा जी ने कहा, “मैं प्रिया को अपनी बेटी बनाना चाहती हूं। कानूनी तौर पर गोद लेना चाहती हूं। लेकिन आपकी इजाजत के बिना नहीं।”
मां-बाप दोनों हैरान थे। पापा ने कहा, “मैडम, हमें कोई ऐतराज नहीं। लेकिन प्रिया की मर्जी सबसे जरूरी है।” प्रिया ने मीरा जी की तरफ देखा। फिर अपने मां-बाप की तरफ। उसने धीरे से कहा, “मैडम, अगर मैं आपकी बेटी बनती हूं तो क्या मेरे मां-बाप ही मेरे साथ रहेंगे?”
मीरा जी मुस्कुराई। “बिल्कुल बेटी। अब हम सब एक परिवार हैं।” उस दिन के बाद प्रिया की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। मीरा जी ने उन्हें अपने बंगले में बुला लिया। प्रिया को कंपनी में अच्छी पोस्ट दी। लेकिन प्रिया अब भी वैसी ही रही। सीधी, सरल और दयालु। वो हर महीने गरीब बच्चों को किताबें बांटती। जरूरतमंदों की मदद करती।
मीरा जी को अब अपना परिवार मिल गया था। प्रिया को एक मां मिल गई जो उसे हर खुशी देना चाहती थी। और सबसे बड़ी बात, प्रिया ने सीखा कि अच्छाई कभी बेकार नहीं जाती। भगवान देर से देता है लेकिन देता जरूर है। भलाई का मोल पैसे में नहीं होता। भलाई का मोल सिर्फ इंसानियत में होता है।
अब आप बताइए, अगर आप प्रिया की जगह होते तो क्या आप भी अपनी जिंदगी में बिना किसी लालच के किसी अनजान जरूरतमंद की मदद करते? क्या आपके भीतर वो इंसान अब भी जिंदा है जो बिना स्वार्थ के किसी भूखे को खाना, किसी रोते को सहारा दे सके? नीचे कमेंट में जरूर लिखिए और अगर कहानी पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें, शेयर करें और हमारे चैनल “आओ सुनाओ” को सब्सक्राइब जरूर करें। मिलते हैं अगले वीडियो में। तब तक खुश रहिए, अपनों के साथ रहिए और रिश्तों की कीमत समझिए। जय हिंद।
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