जूते पॉलिश करने वाले ने सुधारी डॉक्टर की गलती! बचाई मरीज की जान, डॉक्टर ने मानी हार

मोची का सपना: इंसानियत की सर्जरी”

भूमिका

दुनिया अक्सर मानती है कि अकल बादाम खाने से आती है, लेकिन असली समझ जीवन की ठोकरों और कठिनाइयों से ही मिलती है। कभी-कभी वह ज्ञान, जो मोटी-मोटी मेडिकल किताबों में नहीं मिलता, सड़क के किनारे बैठे एक मामूली इंसान से मिल जाता है। यह कहानी है 12 साल के केशव की, जिसके हाथ पॉलिश और कालिख से सने रहते थे, लेकिन आंखों में चमक किसी एक्स-रे मशीन से भी तेज थी।

संघर्ष की शुरुआत

शहर के सबसे मशहूर “लाइफ लाइन हॉस्पिटल” के बाहर, दोपहर की चिलचिलाती धूप में, केशव अपनी छोटी सी मोची की दुकान लगाए बैठा था। पिता के गुजर जाने के बाद घर की जिम्मेदारी और बीमार मां की दवा का खर्च उसके नन्हे कंधों पर आ गया था। जूते चमकाने के साथ केशव का सपना था कि एक दिन वह भी सफेद कोट पहनकर अस्पताल के अंदर जाए। वह अक्सर डॉक्टरों और मरीजों को गौर से देखता, उनकी चाल, उनके जूतों से उनके हालात पहचान लेता।

एक अनोखी नजर

अस्पताल के वरिष्ठ सर्जन डॉ. समीर तनाव में बाहर आए। वे अक्सर अपनी सर्जरी से पहले जूते साफ करवाते थे। आज वे बेहद तनाव में थे, फोन पर लगातार अपने जूनियर से मरीज मिस्टर खन्ना के केस के बारे में बात कर रहे थे। केशव ने मिस्टर खन्ना को अस्पताल में आते हुए देखा था, और उसके दिमाग में एक दृश्य कौंध गया। उसने डॉक्टर समीर को रोककर कहा – “साहब, अगर आप उन्हें बेहोश करके पेट का ऑपरेशन करेंगे, तो शायद वह कभी नहीं जागेंगे।”

डॉ. समीर गुस्से में थे, लेकिन केशव ने हिम्मत नहीं हारी। उसने बताया कि मिस्टर खन्ना के पैर में सूजन है, नीले मोजे पर टखने के पास दो लाल निशान हैं, और जूते के सोल के पास से एक बिच्छू निकल कर भागा था। यह अपेंडिक्स नहीं, बिच्छू के जहर का असर है।

सच्चाई की जीत

डॉ. समीर ने ऑपरेशन थिएटर में जाकर मरीज के मोजे उतारे। सचमुच वहां दो गहरे लाल निशान थे। तुरंत सर्जरी रोक दी गई, एंटीवेनम चढ़ाया गया और मिस्टर खन्ना की जान बच गई। करोड़ों की मशीनें और डिग्रियां नहीं, बल्कि बाहर बैठे उस 12 साल के मोची की नजर ने जान बचाई।

डॉ. समीर के अहंकार को झटका लगा। वे केशव के पास आए, उसके सामने घुटनों के बल बैठ गए और कहा – “तुमने आज सिर्फ एक मरीज की जान नहीं बचाई, एक डॉक्टर को भी मरने से बचा लिया। अब तुम्हारी पढ़ाई, घर, मां की बीमारी का सारा खर्च मैं उठाऊंगा। जिस दिन तुम डॉक्टर बनोगे, मैं अपनी कुर्सी तुम्हें दूंगा।”

संघर्ष से सफलता तक

केशव की दुनिया बदल गई। सड़क की धूल की जगह किताबों की खुशबू आ गई। स्कूल में अमीर बच्चों की ताने, अंग्रेजी की कठिनाई, लेकिन मां का आशीर्वाद और डॉ. समीर का विश्वास उसकी ताकत बन गया। 12 साल बाद, केशव मेडिकल कॉलेज का गोल्ड मेडलिस्ट बना। दीक्षांत समारोह में उसने अपना मेडल डॉ. समीर के गले में पहनाया – “यह मेरा नहीं, आपका है सर।”

इंसानियत की परीक्षा

समारोह के बाद, शहर के सबसे अमीर बिल्डर मिस्टर दीनाना अपने बेटे के लिए मदद मांगते आए। वही दीनाना जिसने बरसों पहले केशव की झुग्गी तुड़वाई थी। डॉ. समीर अब सर्जरी नहीं कर सकते थे, और केशव के पास बदला लेने का मौका था। लेकिन डॉ. समीर की खामोश नजर ने उसे याद दिलाया – “माफ करना और जीवन देना वीरों का काम है।”

केशव ने दीनाना के बेटे की जटिल सर्जरी की, उसे बचाया। दीनाना ने मुंह मांगी कीमत देने की पेशकश की, लेकिन केशव ने कहा – “मुझे पैसे नहीं चाहिए। अगर सच में प्रायश्चित करना है, तो कृष्णा नगर की उसी जमीन पर गरीबों के लिए धर्मार्थ अस्पताल बनाइए।”

अंत और संदेश

दीनाना ने वादा किया। डॉ. समीर ने गर्व से कहा – “आज तुमने इंसानियत का गोल्ड मेडल जीता है। एक मोची फटे जूते सिलता है, लेकिन एक महान इंसान टूटे दिलों और समाज को सिलता है।”

अस्पताल के बाहर वही पुराना नीम का पेड़ आज भी खड़ा था, उसकी पत्तियां सरसराती थीं, मानो गवाही दे रही हों – एक कहानी जो जूते पॉलिश करने वाले बॉक्स से शुरू होकर दिलों को रोशन करने वाली मशाल बन गई।

सीख

सच ही कहा गया है, वक्त सबका बदलता है। इंसान अपने जन्म या पेशे से नहीं, अपने कर्मों और संस्कारों से बड़ा होता है।

समाप्त